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भारतीय दंपतियों में द्वितीयक बांझपन (Secondary Infertility)

संदर्भ 

भारतीय समाज में जब किसी दंपती के घर पहला बच्चा जन्म ले लेता है, तो आमतौर पर यह मान लिया जाता है कि उनकी प्रजनन यात्रा पूरी तरह सफल रही है। यदि बाद में वे दूसरे बच्चे की इच्छा व्यक्त करें और उसमें कठिनाई आए, तो अक्सर उन्हें यह कहकर समझा दिया जाता है- कम-से-कम एक बच्चा तो है, उसी में संतोष करो। सुनने में यह वाक्य सांत्वना जैसा प्रतीत होता है, किंतु जिन दंपतियों के लिए दूसरा बच्चा केवल एक इच्छा नहीं, बल्कि परिवार का अधूरा सपना होता है, उनके लिए यही शब्द गहरे मानसिक आघात का कारण बन जाते हैं।

द्वितीयक बांझपन (Secondary Infertility) क्या है?

  • पहले बच्चे के जन्म के बाद दोबारा गर्भधारण करने या गर्भावस्था को पूर्ण अवधि तक बनाए रखने में आने वाली कठिनाई को द्वितीयक बांझपन (Secondary Infertility) कहा जाता है। लंबे समय तक इसे गंभीर चिकित्सकीय समस्या नहीं माना गया, क्योंकि समाज की धारणा थी कि एक बार माता-पिता बन जाने के बाद प्रजनन क्षमता पर प्रश्न नहीं उठता। 
  • किंतु वर्तमान आंकड़े इस धारणा को गलत साबित करते हैं। भारत के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के आंकड़े बताते हैं कि द्वितीयक बांझपन का ग्राफ 1990 के दशक की शुरुआत में लगभग 19.5% था, जो अब बढ़कर करीब 28.6% हो चुका है। यानी महज एक पीढ़ी में यह समस्या लगभग दोगुनी हो गई है।

द्वितीयक बांझपन (Secondary Infertility) के कारक 

1. बढ़ती उम्र और बदलती जीवनशैली

  • एक पीढ़ी पहले तक लोग 20 से 30 साल की उम्र के बीच अपना परिवार पूरा कर लेते थे। आधुनिक समय में पढ़ाई, करियर, ईएमआई और सेटल होने की जद्दोजहद में पहला बच्चा ही 31 या 32 साल की उम्र में प्लान किया जाता है। जब तक लाइफ दूसरे बच्चे के लिए तैयार होती है, तब तक महिला की उम्र 35 पार हो चुकी होती है। उम्र के साथ अंडों की संख्या और गुणवत्ता दोनों तेजी से घटने लगती हैं।  

2. शारीरिक और हार्मोनल बदलाव

पहले और दूसरे बच्चे के बीच के सालों में शरीर काफी बदल जाता है:

  • PCOS और थायराइड: आज हर पांच में से एक भारतीय महिला PCOS (पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम) के साथ जी रही है।
  • सिजेरियन (C-Section) के प्रभाव: पहले बच्चे की डिलीवरी के समय हुआ सिजेरियन सेक्शन कभी-कभी गर्भाशय या फेलोपियन ट्यूब में रुकावट (Adhesions) का कारण बन सकता है।

बांझपन से जुड़े तथ्य और आंकड़े (विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार):

  • बांझपन लाखों लोगों को प्रभावित करता है और उनके परिवारों और समुदायों पर इसका असर पड़ता है। अनुमानों के अनुसार, लगभग 17.5% वयस्क आबादी - यानी दुनिया भर में प्रजनन आयु के प्रत्येक छह लोगों में से लगभग एक व्यक्ति - अपने जीवनकाल में बांझपन का अनुभव करता है।
  • पुरुषों के प्रजनन तंत्र में, बांझपन का सबसे आम कारण वीर्य के निष्कासन में समस्या, शुक्राणुओं की अनुपस्थिति या कम मात्रा, या शुक्राणुओं के असामान्य आकार (आकृति विज्ञान) और गति (गतिशीलता) है।
  • महिलाओं के प्रजनन तंत्र में, बांझपन अंडाशय, गर्भाशय, फैलोपियन ट्यूब और अंतःस्रावी तंत्र सहित कई प्रकार की असामान्यताओं के कारण हो सकता है।
  • अधिकांश देशों में, विशेष रूप से निम्न और मध्यम आय वाले देशों में, प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं तक समान और न्यायसंगत पहुंच एक चुनौती बनी हुई है। राष्ट्रीय सार्वभौमिक स्वास्थ्य बीमा योजनाओं में प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं को शायद ही कभी प्राथमिकता दी जाती है।

3. पुरुष बांझपन (Male Infertility)

  • भारतीय समाज में आज भी बांझपन को प्रायः महिलाओं की समस्या मान लिया जाता है, जबकि चिकित्सा विज्ञान स्पष्ट रूप से बताता है कि पुरुष भी उतने ही जिम्मेदार हो सकते हैं। बढ़ता मोटापा, मानसिक तनाव, धूम्रपान, शराब का सेवन और प्रदूषण जैसे कारक शुक्राणुओं की गुणवत्ता एवं संख्या को प्रभावित करते हैं। दुर्भाग्य से अधिकांश पुरुष यह मानने को तैयार नहीं होते कि समस्या उनकी ओर भी हो सकती है। उनका तर्क होता है कि यदि पहले बच्चा हो चुका है, तो जांच कराने की आवश्यकता नहीं है। 

सोशल मीडिया का दोहरा प्रभाव 

  • डिजिटल युग ने प्रजनन संबंधी जागरूकता बढ़ाने में सकारात्मक भूमिका निभाई है। आज लोग आईवीएफ (IVF) और अन्य आधुनिक उपचारों के बारे में पहले से अधिक जानकारी रखते हैं तथा इन विषयों पर खुलकर चर्चा भी होने लगी है। इससे समाज में व्याप्त संकोच धीरे-धीरे कम हो रहा है।
  • किन्तु सोशल मीडिया का दूसरा पक्ष भी उतना ही प्रभावशाली है। लगातार दिखाई देने वाली बेबी नंबर-2 की घोषणाएं, आदर्श परिवारों की तस्वीरें और सुखद पारिवारिक क्षण उन महिलाओं के लिए भावनात्मक दबाव उत्पन्न करते हैं जो स्वयं गर्भधारण के लिए संघर्ष कर रही होती हैं। 

समय पर जांच और उपचार आवश्यक 

  • द्वितीयक बांझपन की स्थिति में सबसे महत्वपूर्ण बात समय पर चिकित्सकीय परामर्श लेना है। यदि 35 वर्ष से कम आयु की महिला एक वर्ष तक नियमित प्रयासों के बाद भी गर्भधारण नहीं कर पाती, अथवा 35 वर्ष से अधिक आयु की महिला छह माह के प्रयास के बाद भी सफल नहीं होती, तो दोनों पति-पत्नी की संयुक्त चिकित्सकीय जांच करानी चाहिए। केवल महिला की जांच पर्याप्त नहीं होती, क्योंकि समस्या किसी एक या दोनों में हो सकती है।
  • आज आधुनिक प्रजनन चिकित्सा ने उपचार के अनेक प्रभावी विकल्प उपलब्ध कराए हैं। आईवीएफ सहित विभिन्न तकनीकों के माध्यम से बड़ी संख्या में दंपतियों को सफलतापूर्वक संतान प्राप्ति हुई है। फिर भी किसी भी उपचार की सफलता अनेक जैविक एवं चिकित्सकीय कारकों पर निर्भर करती है। इसलिए किसी भी संस्थान द्वारा शत-प्रतिशत सफलता का दावा किए जाने पर सतर्क रहना आवश्यक है।

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) की 2025 विश्व जनसंख्या रिपोर्ट के अनुसार 

  • हर तीन में से एक भारतीय वयस्क (36%) अनचाही गर्भावस्था का सामना करता है, जबकि 30% लोग अपनी इच्छानुसार संतान संख्या प्राप्त नहीं कर पाते।
  • भारत में 15–19 वर्ष की किशोरियों की प्रजनन दर 14.1 प्रति 1,000 है, जो चीन (6.6), श्रीलंका (7.3) और थाईलैंड (8.3) की तुलना में अधिक है। किशोरावस्था में गर्भधारण मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के साथ-साथ शिक्षा और रोजगार पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है।
  • देश के 31 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में कुल प्रजनन दर (TFR) प्रतिस्थापन स्तर (2.1) से नीचे आ चुकी है, लेकिन बिहार (3.0), मेघालय (2.9) और उत्तर प्रदेश (2.7) में यह अब भी अधिक है। वहीं, कई राज्यों के ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी प्रतिस्थापन स्तर हासिल नहीं हो पाया है।
  • राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (2019–21) के अनुसार बिहार और मेघालय जैसे उच्च प्रजनन दर वाले राज्यों में वास्तविक और वांछित प्रजनन दर के बीच उल्लेखनीय अंतर है, जबकि सिक्किम जैसे निम्न प्रजनन दर वाले राज्यों में यह अंतर बहुत कम है। 

कुल मिलाकर, बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में उच्च प्रजनन दर तथा दिल्ली, केरल और तमिलनाडु में निम्न प्रजनन दर आर्थिक अवसरों, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक-लैंगिक असमानताओं के अंतर को दर्शाती है।

समाज की भूमिका 

  • द्वितीयक बांझपन केवल चिकित्सा का विषय नहीं, बल्कि संवेदनशील सामाजिक मुद्दा भी है। ऐसे दंपतियों को सहानुभूति, समझ और भावनात्मक सहयोग की आवश्यकता होती है, न कि अनचाही सलाह या तुलना की।
  • यह समझना आवश्यक है कि पहले से एक बच्चे का होना दूसरे बच्चे की इच्छा या उससे जुड़ी पीड़ा को कम नहीं कर देता। किसी दंपती के लिए परिवार का अर्थ वही होता है, जैसा वे स्वयं महसूस करते हैं, न कि जैसा समाज उनके लिए तय करता है। 

निष्कर्ष

द्वितीयक बांझपन एक वास्तविक और बढ़ती हुई स्वास्थ्य चुनौती है, जिसे केवल चिकित्सकीय ही नहीं, सामाजिक संवेदनशीलता के साथ भी देखने की आवश्यकता है। समय पर जांच, वैज्ञानिक उपचार, सही जानकारी और परिवार का सहयोग इस समस्या से जूझ रहे दंपतियों के लिए सबसे बड़ा सहारा बन सकते हैं। 

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