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शालीमार गेहूँ   

हाल ही में, शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (SKUAST-K) के वैज्ञानिकों ने कश्मीर में धान–गेहूँ फसल चक्र को मजबूत करने के लिए दो नई शीघ्र पकने वाली गेहूँ की किस्में विकसित की हैं। 

शालीमार गेहूँ के बारे में

  • ‘शालीमार गेहूँ’ उन नई शीघ्र परिपक्व गेहूँ की किस्मों को दर्शाता है जिन्हें SKUAST-K ने पारंपरिक प्रजनन तकनीकों के माध्यम से कश्मीर की जलवायु के अनुकूल बनाया है।
  • इन किस्मों को विशेष रूप से धान–गेहूँ फसल चक्र में शामिल करने के लिए तैयार किया गया है ताकि गेहूँ समय पर कटाई के लिए तैयार हो और धान की रोपाई में कोई देरी न हो। 

किस्मों के नाम

  • शालीमार गेहूँ-4 (SW-4)– मई के अंतिम सप्ताह तक पकती है।
  • शालीमार गेहूँ-3 (SW-3)– जून के प्रथम सप्ताह तक तैयार हो जाती है। 

प्रमुख विशेषताएँ

  • शीघ्र परिपक्वता: ये किस्में पारंपरिक गेहूँ की तुलना में जल्दी पकती हैं जिससे धान की खेती के लिए खेत समय पर तैयार हो सकें।
  • कश्मीर की जलवायु के अनुकूल: इनका विकास लगभग 1,850 मीटर तक की मध्यम ऊँचाई वाले क्षेत्रों के लिए किया गया है जबकि पहले प्रयुक्त किस्में प्राय: उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों से लायी जाती थीं। 
  • धान–गेहूँ चक्र के अनुकूल: ये किस्में फसल क्रम को व्यवस्थित रखने में मदद करती हैं और धान की रोपाई में देरी को रोकती हैं।
  • रोग प्रतिरोधक क्षमता: इनमें पीली रतुआ (Yellow Rust) जैसी फफूंदजनित बीमारी के प्रति प्रतिरोधकता है जो कश्मीर में गेहूँ के लिए एक गंभीर समस्या है।
  • उच्च उपज क्षमता: SW-3 लगभग 38 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन देती है जिससे शीघ्र परिपक्वता और बेहतर उपज के बीच संतुलन बनता है।
  • पोषण संवर्धन (Biofortification): SW-3 में आयरन व जिंक की मात्रा 40 पीपीएम से अधिक है और प्रोटीन लगभग 12% है जिससे इसकी पोषण गुणवत्ता बढ़ जाती है।
  • पारंपरिक प्रजनन तकनीक से विकास: इन किस्मों को क्रॉस-ब्रीडिंग, वंशानुक्रम चयन (Pedigree Selection) और लगभग दस वर्षों तक किए गए बहुवर्षीय फील्ड परीक्षणों के माध्यम से विकसित किया गया है।

महत्व

  • कश्मीर में धान–गेहूँ फसल प्रणाली को स्थिर बनाए रखकर खाद्य सुरक्षा को मजबूत करता है।
  • गेहूँ की देर से कटाई के कारण धान की रोपाई में होने वाली देरी को रोककर किसानों को समय पर लाभ दिलाता है। 
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