संदर्भ
लिथियम-आयन बैटरियों से जुड़ी महत्वपूर्ण खनिजों पर अत्यधिक निर्भरता, आयात-आधारित आपूर्ति शृंखला और आपूर्ति-सुरक्षा से जुड़ी आशंकाओं के बीच भारत अपनी बैटरी नीति पर पुनर्विचार कर रहा है। ऐसे परिदृश्य में सोडियम-आयन बैटरी तकनीक एक व्यवहारिक evm वैकल्पिक समाधान के रूप में उभरकर सामने आ रही है।
सोडियम-आयन बैटरी तकनीक के बारे में
- सोडियम-आयन बैटरियाँ (Sodium-ion Batteries: SiBs) ऐसी रिचार्जेबल बैटरियाँ हैं जिनमें ऊर्जा के संग्रहण एवं विमोचन के लिए लिथियम आयनों की जगह सोडियम आयनों (Na⁺) का उपयोग किया जाता है।
- संरचनात्मक रूप से ये भी लिथियम-आयन बैटरियों की तरह रॉकिंग-चेयर बैटरी प्रणाली का हिस्सा हैं किंतु इनमें इस्तेमाल होने वाले कच्चे पदार्थ अपेक्षाकृत अधिक सुलभ एवं प्रचुर हैं।
कार्य-प्रणाली
- चार्जिंग की अवस्था में : सोडियम आयन इलेक्ट्रोलाइट के माध्यम से कैथोड से एनोड की ओर गति करते हैं जबकि इलेक्ट्रॉन बाहरी सर्किट से प्रवाहित होते हैं।
- डिस्चार्जिंग की अवस्था में : सोडियम आयन एनोड से वापस कैथोड की ओर लौटते हैं जिससे संग्रहीत विद्युत ऊर्जा मुक्त होती है।
- लिथियम-आयन बैटरियों के विपरीत, जहाँ एनोड पर तांबे (कॉपर) का उपयोग होता है, सोडियम-आयन बैटरियों में दोनों इलेक्ट्रोड पर एल्युमिनियम करंट कलेक्टर के रूप में प्रयुक्त होता है।
प्रमुख विशेषताएँ और लाभ
- कम कच्चा-माल जोखिम : नमक और सोडा ऐश जैसे स्रोतों से आसानी से प्राप्त होने वाला सोडियम व्यापक रूप से उपलब्ध है। इससे लिथियम, कोबाल्ट एवं निकल जैसे दुर्लभ महत्वपूर्ण खनिजों पर निर्भरता घटती है।
- उन्नत सुरक्षा : इन बैटरियों में थर्मल रनअवे की संभावना कम होती है और इन्हें 0% चार्ज अवस्था में भी सुरक्षित रूप से संग्रहित व परिवहन किया जा सकता है।
- निर्माण के अनुकूल : मौजूदा लिथियम-आयन बैटरी उत्पादन लाइनों में मामूली तकनीकी संशोधन कर सोडियम-आयन बैटरियों का निर्माण किया जा सकता है।
- लागत में दीर्घकालिक लाभ : कच्चे माल की प्रचुरता और सरल आपूर्ति-शृंखला के कारण भविष्य में ये बैटरियाँ लिथियम-आयन विकल्पों की तुलना में अधिक किफायती हो सकती हैं।
- भारत के लिए रणनीतिक महत्व : यह तकनीक ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करती है तथा घरेलू विनिर्माण, ग्रिड-स्तरीय ऊर्जा भंडारण और आत्मनिर्भरता के लक्ष्यों के अनुरूप है।
सीमाएँ और चुनौतियाँ
- निम्न ऊर्जा घनत्व : विशिष्ट एवं आयतनात्मक ऊर्जा घनत्व अभी उच्च-प्रदर्शन लिथियम-आयन बैटरियों से कम है जिससे लंबी दूरी के इलेक्ट्रिक वाहनों में इनका उपयोग सीमित रहता है।
- तकनीकी परिपक्वता का अभाव : लिथियम-आयन तकनीक की तुलना में सोडियम-आयन बैटरियाँ अभी प्रारंभिक व्यावसायिक चरण में हैं और इनके प्रदर्शन में सुधार की प्रक्रिया जारी है।
- नमी के प्रति संवेदनशीलता : निर्माण के दौरान अधिक सख्त सुखाने व वैक्यूम स्थितियों की आवश्यकता होती है जिससे उत्पादन प्रक्रिया थोड़ी जटिल हो जाती है।
- उपयोग की सीमित परिधि : वर्तमान परिस्थितियों में यह तकनीक मुख्यतः स्थिर ऊर्जा भंडारण, दो-पहिया व तीन-पहिया वाहनों तथा कम दूरी की गतिशीलता के लिए उपयुक्त है जबकि प्रीमियम इलेक्ट्रिक वाहनों में इसका उपयोग सीमित है।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर, सोडियम-आयन बैटरियाँ भारत के लिए एक रणनीतिक व दीर्घकालिक विकल्प प्रस्तुत करती हैं। यह तकनीक आयात निर्भरता को कम करने, ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करने और स्वदेशी बैटरी पारिस्थितिकी तंत्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।