संदर्भ
भारत में अगस्त 2026 के दौरान चीनी की खुदरा कीमतों में तेज वृद्धि देखने को मिली है। 20 जुलाई को जहां खुदरा चीनी की कीमत लगभग ₹48.18 प्रति किलोग्राम थी, वहीं 20 अगस्त तक यह बढ़कर ₹55.70 प्रति किलोग्राम हो गई। अगस्त के अंत तक कुछ बाजारों में अखिल भारतीय मोडल कीमत लगभग ₹65 प्रति किलोग्राम तक पहुंचने की खबर है। यह वृद्धि केवल उपभोक्ताओं के घरेलू बजट को प्रभावित नहीं करती, बल्कि खाद्य मुद्रास्फीति, गन्ना किसानों, चीनी मिलों और भारत की एथेनॉल नीति के बीच संतुलन की चुनौती को भी सामने लाती है।
कीमतों में वृद्धि के प्रमुख कारण
- चीनी की कीमतों में मौजूदा वृद्धि का सबसे महत्वपूर्ण कारण घरेलू उत्पादन में कमी है। 2025-26 सीजन में चीनी का सकल उत्पादन लगभग 309–306 लाख टन रहने का अनुमान है, जबकि शुरुआती अनुमान लगभग 343–343.5 लाख टन था। महाराष्ट्र, कर्नाटक और गुजरात में अत्यधिक बारिश एवं जलभराव ने गन्ने की वृद्धि और उसमें सुक्रोज की मात्रा को प्रभावित किया। वहीं उत्तर प्रदेश में Co-0238 जैसी प्रमुख गन्ना किस्म रेड रॉट और टॉप शूट बोरर से प्रभावित हुई।
- दूसरा महत्वपूर्ण कारण त्योहारी मांग में वृद्धि है। दशहरा और दीपावली जैसे प्रमुख त्योहारों से पहले मिठाई, बेकरी, पेय पदार्थ और कन्फेक्शनरी उद्योग में चीनी की मांग बढ़ जाती है। इससे सीमित उपलब्धता के बीच कीमतों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।
- तीसरा कारण वैश्विक बाजार में आपूर्ति की स्थिति है। अंतरराष्ट्रीय चीनी कीमतों में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। वैश्विक स्तर पर 2026-27 में चीनी के संभावित घाटे ने घरेलू बाजार की कीमतों को प्रभावित किया है।
- इसके अतिरिक्त, जमाखोरी, सट्टेबाजी और मिलों द्वारा स्टॉक रोककर रखने जैसी बाजार संबंधी गतिविधियों ने भी कीमतों में कृत्रिम दबाव पैदा किया है।
क्या एथेनॉल नीति कीमतों में वृद्धि के लिए जिम्मेदार है?
- चीनी कीमतों में वृद्धि के बीच एथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी के डायवर्जन को लेकर बहस तेज हुई है। हालांकि, सरकार ने इस तर्क को खारिज किया है। उसके अनुसार, एथेनॉल के लिए डायवर्ट की जाने वाली चीनी का हिस्सा 2022-23 के लगभग 12% से घटकर 2025-26 में करीब 9% रह गया है। साथ ही, भारत के एथेनॉल उत्पादन का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा अब अनाज, विशेषकर मक्का, से आता है।
- एथेनॉल कार्यक्रम का एक सकारात्मक पक्ष यह है कि इसने भारत के संरचनात्मक चीनी अधिशेष को कम करने में मदद की है। भारत में सामान्यतः चीनी उत्पादन घरेलू खपत से अधिक रहता है। ऐसे में अतिरिक्त चीनी को एथेनॉल में बदलने से मिलों की कार्यशील पूंजी पर दबाव कम होता है और चीनी के अत्यधिक भंडारण की समस्या भी घटती है।
स्टॉक में कमी और आपूर्ति की चुनौती
- उत्पादन में कमी का सीधा असर चीनी के अंतिम स्टॉक पर पड़ा है। एथेनॉल के लिए लगभग 30 लाख टन डायवर्जन, लगभग 280 लाख टन घरेलू खपत और 8 लाख टन निर्यात को ध्यान में रखने के बाद सीजन के अंत में स्टॉक करीब 41 लाख टन रहने का अनुमान है। यह 2016-17 के बाद सबसे निचला स्तर हो सकता है।
- इससे स्पष्ट होता है कि वर्तमान संकट को केवल एथेनॉल नीति से जोड़ना उचित नहीं होगा। जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा, फसल रोग, कीट प्रकोप और कमजोर कृषि उत्पादकता ने चीनी की उपलब्धता को अधिक प्रभावित किया है।
भारत का चीनी उद्योग: एक नज़र में
- भारत का चीनी उद्योग कृषि, उद्योग और ग्रामीण आजीविका का एक बड़ा इकोसिस्टम है। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गन्ना उत्पादक देश है। गन्ना सेक्टर लगभग 5 करोड़ किसानों और चीनी मिलों व उनसे जुड़े उद्योगों में काम करने वाले करीब 5 लाख श्रमिकों को आजीविका प्रदान करता है।
- कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी उत्पादन के तीसरे अग्रिम अनुमान के अनुसार, वर्ष 2025-26 में भारत का गन्ना उत्पादन 500 एमएमटी तक पहुँच गया है। वर्ष 2015-16 में 348.44 एमएमटी उत्पादन की तुलना में, यह पिछले 10 वर्षों में लगभग 43.5 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाता है।
- गन्ने की खेती के अंतर्गत आने वाला क्षेत्रफल भी 2015-16 के 49.27 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 2025-26 में 58.87 लाख हेक्टेयर हो गया है।
- उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र भारत के शीर्ष गन्ना उत्पादक राज्य हैं।
- भारत ने 2016-17 के 0.47 लाख एमटी की तुलना में, 2025-26 में 8 लाख एमटी चीनी का निर्यात किया।
सरकार के प्रमुख कदम
- कीमतों को नियंत्रित करने और घरेलू आपूर्ति बढ़ाने के लिए सरकार ने कई कदम उठाए हैं। इनमें चीनी डीलरों के लिए 400 टन की स्टॉक सीमा, थोक उपभोक्ताओं के लिए 15 दिनों की खपत तक स्टॉक रखने की सीमा तथा स्टॉक का भौतिक सत्यापन शामिल है।
- सरकार ने 10 लाख टन तक कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात को भी मंजूरी दी है। इसके अलावा, घरेलू उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए 30 सितंबर 2026 तक चीनी निर्यात पर रोक लगाई गई है। बड़े खरीदारों और औद्योगिक उपभोक्ताओं की खरीद पर भी निगरानी बढ़ाई गई है।
- सरकार ने मिलों को 15 अक्टूबर से गन्ने की पेराई शुरू करने की सलाह दी है, ताकि नए सीजन में बाजार में चीनी की आपूर्ति शीघ्र बढ़ाई जा सके।
व्यापक प्रभाव
- चीनी की कीमतों में वृद्धि का प्रभाव केवल घरेलू उपभोक्ताओं तक सीमित नहीं है। मिठाई, बेकरी, शीतल पेय और कन्फेक्शनरी उद्योगों की लागत बढ़ सकती है, जिससे खाद्य मुद्रास्फीति पर दबाव बढ़ने की संभावना रहती है। दूसरी ओर, ऊंची कीमतें गन्ना किसानों और चीनी मिलों के लिए बेहतर आय का अवसर पैदा कर सकती हैं, बशर्ते बाजार में संतुलन बना रहे।
- यह स्थिति सरकार के सामने एक महत्वपूर्ण नीतिगत चुनौती भी रखती है - एक तरफ एथेनॉल ब्लेंडिंग और ऊर्जा सुरक्षा के लक्ष्यों को आगे बढ़ाना तथा दूसरी तरफ घरेलू उपभोक्ताओं के लिए चीनी की पर्याप्त और सस्ती उपलब्धता सुनिश्चित करना।
आगे की राह
- दीर्घकाल में केवल आयात, स्टॉक सीमा या निर्यात प्रतिबंध जैसे तात्कालिक उपाय पर्याप्त नहीं होंगे। भारत को जलवायु-लचीली गन्ना किस्मों, बेहतर सिंचाई एवं जल प्रबंधन, रोग एवं कीट नियंत्रण, उत्पादकता बढ़ाने और चीनी उद्योग में बेहतर स्टॉक प्रबंधन पर ध्यान देना होगा।
- साथ ही, चीनी और एथेनॉल के बीच संतुलित नीति आवश्यक है। एथेनॉल भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आयातित पेट्रोलियम पर निर्भरता कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, लेकिन इसके साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि खाद्य वस्तु के रूप में चीनी की घरेलू उपलब्धता प्रभावित न हो।
निष्कर्ष
- भारत में चीनी की मौजूदा कीमत वृद्धि बहु-आयामी संकट का परिणाम है। उत्पादन में कमी, प्रतिकूल मौसम, फसल रोग, त्योहारी मांग, वैश्विक बाजार की परिस्थितियां और बाजार में जमाखोरी इसके प्रमुख कारण हैं। उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर एथेनॉल डायवर्जन को अकेले कीमत वृद्धि का कारण मानना उचित नहीं है।
- वास्तविक चुनौती खाद्य सुरक्षा, किसान हित, चीनी उद्योग की वित्तीय स्थिरता और ऊर्जा सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करने की है। इसलिए भारत को अल्पकालिक बाजार हस्तक्षेपों के साथ-साथ कृषि उत्पादकता और जलवायु-लचीली कृषि पर दीर्घकालिक रणनीति विकसित करनी होगी। यही दृष्टिकोण चीनी बाजार को स्थिर और भारतीय उपभोक्ताओं के लिए अधिक सुरक्षित बना सकता है।