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एनटीए की शून्य त्रुटि प्रणाली का परीक्षण

संदर्भ 

  • भारत की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा, नीट-यूजी, एक बार फिर विवादों के घेरे में है। 12 मई 2026 को नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) ने पेपर लीक की बात स्वीकार करते हुए लगभग 22.79 लाख छात्रों के लिए दोबारा परीक्षा (Re-exam) आयोजित करने का फैसला किया। वस्तुतः एनटीए का यह निर्णय न केवल प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है, बल्कि लाखों युवाओं के भविष्य और मानसिक स्वास्थ्य पर भी सवाल खड़े करता है। 

बार-बार क्यों टूट रहा है 'शून्य त्रुटि' का भरोसा ? 

  • एनटीए ने इस साल शून्य त्रुटि और शून्य सहनशीलता (Zero Error, Zero Tolerance) की नीति का वादा किया था। परीक्षा के संचालन के लिए भारी-भरकम इंतजाम किए गए थे :  
    • 5,432 केंद्रों पर 2 लाख से ज्यादा कर्मचारियों की तैनाती।
    • जीपीएस युक्त वाहनों और पुलिस सुरक्षा में प्रश्नपत्रों की आवाजाही।
    • डेढ़ लाख से ज्यादा सीसीटीवी कैमरों से सीधी निगरानी।
    • फर्जीवाड़ा रोकने के लिए आधार-आधारित बायोमेट्रिक सिस्टम। 
  • यद्यपि इन सुरक्षा चक्रों के बावजूद, राजस्थान पुलिस की जांच में सामने आया कि परीक्षा से एक महीने पहले ही लगभग 120 संभावित प्रश्न टेलीग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर घूम रहे थे। यह साबित करता है कि केवल तकनीक और सुरक्षा गार्ड बढ़ाना काफी नहीं है, जब तक कि सिस्टम के भीतर की कमियों को दूर न किया जाए। 

राधाकृष्णन पैनल की सिफारिशें 

2024 के विवाद के बाद पूर्व इसरो प्रमुख के. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में एक समिति बनी थी। समिति ने दो प्रमुख सुझाव दिए थे:

  1. सीबीटी मॉडल (कंप्यूटर आधारित परीक्षा) : पेन-पेपर मॉडल को सुरक्षा जोखिम बताते हुए इसे जेईई की तरह कंप्यूटर पर कराने की सलाह दी गई थी।  
  2. डिजिटल पेपर वितरण : प्रश्नपत्रों को केंद्रों तक भौतिक रूप से भेजने के बजाय एन्क्रिप्टेड डिजिटल फाइल के रूप में भेजने का सुझाव दिया गया था, ताकि प्रिंटिंग और परिवहन के दौरान लीक होने का खतरा खत्म हो जाए। 
    • विफलता : एनटीए और शिक्षा मंत्रालय इन सिफारिशों को लागू करने में विफल रहे। एनटीए का कहना है कि उनके पास एक दिन में केवल 1.5 लाख छात्रों का ऑनलाइन टेस्ट लेने की क्षमता है, जबकि उम्मीदवार 22 लाख से ज्यादा हैं। बुनियादी ढांचे (Infrastructure) की कमी सुधार के आड़े आ रही है।  

2024 बनाम 2026 

वर्ष 2024 में भी इसी तरह के आरोप लगे थे जब 67 छात्रों ने पूरे अंक प्राप्त किए थे। उस समय भी जांच सीबीआई को सौंपी गई थी, लेकिन परिणाम केवल कागजों पर दिखाई दिए: 

  • अपूर्ण जांच : 2024 मामले में सीबीआई ने 45 लोगों पर आरोपपत्र दाखिल किए, लेकिन गिरफ्तारियों और सजा की वर्तमान स्थिति स्पष्ट नहीं है। 
  • नेतृत्व का संकट : एनटीए लंबे समय तक बिना पूर्णकालिक प्रमुख के रहा। अधिकारियों के तबादले तो हुए, लेकिन संस्थागत सुधार (Institutional Reform) नहीं दिखे। 

इस संकट की मानवीय कीमत 

परीक्षा रद्द होने का सबसे बुरा असर छात्रों के मनोबल पर पड़ता है।

  • थकान और तनाव : दिल्ली की छात्रा वामिका जैसी लाखों उम्मीदवारों का कहना है कि दो साल से लगातार पढ़ाई और अनिश्चितता ने उन्हें मानसिक रूप से थका दिया है।
  • अनिश्चित भविष्य : दोबारा परीक्षा की घोषणा ने उन छात्रों को भी संकट में डाल दिया है जिन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया था। क्या वे दोबारा वही मानसिक स्थिति और एकाग्रता बना पाएंगे? 

निष्कर्ष 

  • नीट-यूजी 2026 का पेपर लीक होना केवल एक परीक्षा की विफलता नहीं है, बल्कि यह देश की चयन प्रणाली पर एक बड़ा धब्बा है। जब तक सरकार राधाकृष्णन समिति की सिफारिशों को गंभीरता से लागू नहीं करती और बुनियादी ढाँचे में निवेश नहीं बढ़ाया जाता, तब तक शून्य त्रुटि का दावा खोखला ही रहेगा। अब समय आ गया है कि जांच के साथ-साथ परीक्षा के स्वरूप (Format) को बदलने के लिए कड़े और ठोस कदम उठाए जाएं।
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