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भारत में पर्यावरणीय न्यायशास्त्र का क्षरण

संदर्भ

अरावली की प्राचीन पर्वतमालाओं से लेकर सुंदरवन के तटीय मैंग्रोव तक भारत में विकास की आकांक्षाएँ और पर्यावरण संरक्षण के सिद्धांत आपस में टकरा रहे हैं। अमिताव घोष ने अपनी कृति ‘द हंग्री टाइड’ में एक शाश्वत सत्य की ओर इशारा किया है: ‘प्रकृति उन घावों को याद रखती है जिन्हें कानून और सत्ता के गलियारे मिटाने की चेष्टा करते हैं’। ‘विकास’ के शोर में पर्यावरण सुरक्षा के संवैधानिक कवच में कमजोरी देखी जा सकती है। पारिस्थितिक पतन से बचाव के लिए संविधान का सहारा। 

नीतिगत विचलन और न्यायिक दृष्टिकोण में बदलाव

हाल के वर्षों में पर्यावरण संरक्षण की ठोस नीतियों में स्पष्ट बिखराव देखा गया है।

  • नियामकीय ढील: दिसंबर 2025 में गैर-कोयला खनन परियोजनाओं को बिना किसी भौगोलिक स्पष्टता के ‘पर्यावरण प्रभाव आकलन’ (EIA) की छूट देना ‘पूर्व-जांच’ के बुनियादी सिद्धांत पर प्रहार है।
  • न्यायिक नरमी: हालांकि, वनशक्ति बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2025) में सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप ने संस्थागत साख को कुछ समय के लिए बचाया है किंतु व्यापक स्तर पर न्यायपालिका का रुख अब संरक्षणवादी होने के बजाय प्रक्रियात्मक अधिक होता जा रहा है। अब पर्यावरण कानून को सुरक्षा कवच के बजाय एक ‘प्रक्रियात्मक औपचारिकता’ माना जाने लगा है। 

अरावली विवाद: पारिस्थितिकी का गणितीय सरलीकरण

  • उत्तर-पश्चिम भारत के लिए मरुस्थलीकरण के विरुद्ध एक प्राकृतिक दीवार के रूप में अरावली आज परिभाषाओं के जाल में फंसी है। 
  • ऐतिहासिक संदर्भ: 2004 के एमसी मेहता बनाम भारत संघ मामले में न्यायालय ने माना था कि खनन से होने वाली क्षति अपरिवर्तनीय है।
  • वर्तमान संकट: 2025 के हालिया विवादों में पारिस्थितिक निरंतरता और भू-आकृति विज्ञान को दरकिनार कर केवल ‘100 मीटर की ऊंचाई’ को पहाड़ी मानने का मानदंड अपनाया गया। यह सरलीकृत दृष्टिकोण वेल्लोर सिटिजन्स वेलफेयर फोरम (1996) के ‘एहतियाती सिद्धांत’ के पूर्णतः विपरीत है। 

संवैधानिक ढांचे पर आघात: अनुच्छेद 21, 48A एवं 14

पर्यावरण के प्रति यह उदासीनता सीधे तौर पर हमारे संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है- 

  1. जीवन का अधिकार (अनुच्छेद 21): स्वच्छ व स्वस्थ पर्यावरण इस अनुच्छेद का अभिन्न हिस्सा है।
  2. राज्य एवं नागरिक के कर्तव्य: अनुच्छेद 48A (राज्य का कर्तव्य) और 51A(g) (नागरिकों का कर्तव्य) इन घटनाक्रमों से अर्थहीन हो जाते हैं।
  3. समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14): केवल ऊंचाई के आधार पर संरक्षण का निर्धारण एक ‘मनमाना वर्गीकरण’ है जिसका पारिस्थितिक लक्ष्यों से कोई तर्कसंगत संबंध नहीं है। 

विकासात्मक परियोजनाएँ और 'क्षतिपूर्ति' का भ्रम

मैंग्रोव और हिमालयी क्षेत्रों में किए जा रहे हस्तक्षेप इसके ज्वलंत उदाहरण हैं-

  • मैंग्रोव की महत्ता: तटीय क्षेत्रों में ‘ब्लू कार्बन’ के भंडार और प्राकृतिक आपदाओं के अवरोधक मैंग्रोव को बुनियादी ढांचे के लिए काटना एक अपूरणीय क्षति है। ‘क्षतिपूर्ति वनीकरण’ (Compensatory Afforestation) एक छलावा है क्योंकि दशकों पुराने पारिस्थितिकी तंत्र को कहीं अन्य स्थान पर और रातों-रात पैदा नहीं किया जा सकता।
  • चार धाम परियोजना: हिमालय की संवेदनशीलता को जानते हुए भी सड़कों को चौड़ा करने की अनुमति दी गई जिसके परिणामस्वरूप 2025 तक 811 भूस्खलन-संभावित क्षेत्र बन चुके हैं। रणनीतिक लाभ और पर्यावरणीय सुरक्षा के बीच का संतुलन अब असंतुलित होता दिख रहा है।

संस्थागत सुधार की तात्कालिकता

  • भारतीय न्यायपालिका ‘सार्वजनिक न्यास सिद्धांत’ (Public Trust Doctrine) की रक्षक रही है जहाँ प्राकृतिक संसाधन जनता की अमानत माने जाते हैं। इस विरासत को बचाने के लिए निम्नलिखित सुधार अनिवार्य हैं:
  • ग्रीन बेंच की सक्रियता: सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में पर्यावरण समर्पित बेंचों की नियमित सुनवाई।
  • कॉर्पोरेट जवाबदेही: प्रक्रियात्मक निष्पक्षता सुनिश्चित करना ताकि जनसुनवाई केवल एक कागजी खानापूर्ति न रहे। 

निष्कर्ष

‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ का अर्थ ‘ईज ऑफ डिस्ट्रॉयिंग एनवायरनमेंट’ नहीं होना चाहिए। यदि कानून प्रकृति की स्मृति को नकारता है तो इसके परिणाम भयावह और निर्दयी होंगे। पर्यावरणीय न्याय की पुनर्स्थापना के लिए हमें यह स्वीकार करना होगा कि विकास की गति पृथ्वी की पारिस्थितिक सीमाओं के भीतर ही संभव है, उसके विनाश की कीमत पर नहीं। 

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