भारत ने वर्ष 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन प्राप्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस लक्ष्य की प्राप्ति में इस्पात क्षेत्र की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह देश के औद्योगिक कार्बन उत्सर्जन के प्रमुख स्रोतों में शामिल है। इसलिए हरित इस्पात (ग्रीन स्टील) के उत्पादन और उपभोग को बढ़ाना अनिवार्य माना जा रहा है।
इसी उद्देश्य से स्टील मंत्रालय ने उद्योग विशेषज्ञों और तकनीकी पेशेवरों के साथ मिलकर 14 टास्क फोर्स गठित किए हैं। इनका लक्ष्य डीकार्बोनाइजेशन की स्पष्ट रणनीति तैयार करना और निम्न-कार्बन इस्पात उत्पादन को गति देने के लिए एक ठोस कार्ययोजना बनाना है।
फिर भी, इस परिवर्तन की राह में एक प्रमुख बाधा ‘ग्रीन प्रीमियम’ है अर्थात पारंपरिक इस्पात की तुलना में हरित इस्पात के उत्पादन की शुरुआती लागत अधिक होना। स्वच्छ तकनीकों को अपनाने में कंपनियों को वित्तीय दबाव का सामना करना पड़ रहा है।
इस स्थिति को देखते हुए रोडमैप में शुरुआती वर्षों के लिए लक्षित वित्तीय सहायता की सिफारिश की गई है। इसमें जी.एस.टी. का युक्तिकरण और सीमित अवधि के प्रोत्साहन शामिल हैं ताकि उद्योग पर अतिरिक्त बोझ कम हो और टिकाऊ उत्पादन को बढ़ावा मिल सके।
ग्रीन प्रीमियम: सीमित लागत, दीर्घकालिक लाभ
अवसंरचना व्यय पर प्रभाव
यद्यपि हरित इस्पात की कीमत अधिक है किंतु इसका कुल अवसंरचना लागत पर प्रभाव अपेक्षाकृत कम है।
बड़ी सार्वजनिक परियोजनाओं में इस्पात की हिस्सेदारी लगभग 18% रहती है। यदि 30% अतिरिक्त लागत के साथ सार्वजनिक परियोजनाओं में पूर्ण रूप से हरित इस्पात का उपयोग किया जाए तो कुल परियोजना व्यय में लगभग 5.5% की वृद्धि होगी।
यदि अपनाने का स्तर 20% तक सीमित रहे तो राजमार्ग जैसे सार्वजनिक कार्यों के बजट में लगभग 1.1% की ही वृद्धि होगी।
रणनीतिक और आर्थिक दृष्टिकोण
इस अतिरिक्त खर्च को दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों की दृष्टि से स्वीकार्य माना जा रहा है।
यूरोपीय संघ के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज़्म के कारण भारत पर संभावित कार्बन शुल्क का दबाव है। साथ ही, देश कुकिंग कोल के आयात पर निर्भर है जिससे वैश्विक मूल्य अस्थिरता का जोखिम बना रहता है।
हरित इस्पात को अपनाने से कार्बन टैक्स के प्रभाव को कम किया जा सकता है और जीवाश्म ईंधन आधारित जोखिमों से सुरक्षा मिल सकती है।
वैश्विक अनुभवों से प्रेरणा
दुनिया के कुछ मॉडल इस दिशा में महत्वपूर्ण मार्गदर्शन देते हैं।
जापान की ‘ग्रीन परचेज़िंग’ नीति सरकारी खरीद को अनिवार्य दिशानिर्देशों और वित्तीय प्रोत्साहनों के साथ जोड़ती है जिससे उद्योग संक्रमण में सहायता मिलती है।
इसी प्रकार, कैलिफ़ोर्निया का ‘बाय क्लीन’ मॉडल सख्त कार्बन मानकों और प्रमाणित खुलासों के माध्यम से पारदर्शिता एवं जवाबदेही सुनिश्चित करता है।
भारत की ग्रीन स्टील रूपरेखा
भारत ने ग्रीन स्टील टैक्सोनॉमी लागू की है जिसमें उत्सर्जन तीव्रता के आधार पर 3-स्टार, 4-स्टार और 5-स्टार रेटिंग प्रणाली निर्धारित की गई है। इसे कार्बन ‘न्यूट्रिशन लेबल’ की तरह पारदर्शिता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से विकसित किया गया है।
स्टील मंत्रालय ने सरकारी खरीद में हरित इस्पात को प्राथमिकता देने के लिए पहल की है किंतु लागत और सत्यापन से जुड़ी चिंताओं के कारण अंतिम निर्णय अभी लंबित है।
भरोसे की कमी को दूर करना
पारदर्शी सत्यापन व्यवस्था
हरित इस्पात को अपनाने में सबसे बड़ी समस्या विश्वसनीय प्रमाणन प्रणाली का अभाव है। वर्तमान में खरीद अधिकारी प्रमाणित हरित इस्पात और सामान्य इस्पात में स्पष्ट अंतर नहीं कर पाते हैं।
ग्रीन स्टार रेटिंग को ‘मेड इन इंडिया’ क्यूआर कोड प्रणाली से जोड़कर तथा भारतीय गुणवत्ता परिषद् (Quality Council of India) की मान्यता के साथ एकीकृत करके कार्बन प्रमाण-पत्रों का त्वरित व भरोसेमंद सत्यापन संभव बनाया जा सकता है।
खरीद नीति में सुधार
खरीद प्रक्रिया को केवल न्यूनतम लागत तक सीमित रखने के बजाय ‘समग्र मूल्य’ के दृष्टिकोण को अपनाना चाहिए जिसमें पर्यावरणीय स्थिरता और राष्ट्रीय हितों को भी महत्व दिया जाए।
दर अनुसूची (Schedule of Rates) में प्रमाणित निम्न-कार्बन इस्पात को मानक गुणवत्ता के रूप में शामिल करना आवश्यक है ताकि अधिकारियों को निर्णय लेने में प्रशासनिक जोखिम न हो। साथ ही, राज्यों के साथ तालमेल और क्षमता निर्माण भी जरूरी है।
प्रोत्साहन और मांग का संतुलन
उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं और ग्रीन हाइड्रोजन मिशन को सरकारी खरीद नीतियों के साथ समन्वित करना चाहिए।
यदि सरकार उत्पादन को प्रोत्साहन देती है तो उसे स्वयं प्रमुख खरीदार की भूमिका निभानी चाहिए, ताकि बाजार में स्थिरता बनी रहे और निजी व सार्वजनिक हितों में संतुलन स्थापित हो।
चरणबद्ध मानक और पायलट पहल
3-स्टार मानक शुरुआती कदम के रूप में उपयुक्त है किंतु वर्ष 2030 के बाद नीति को धीरे-धीरे 4-स्टार और 5-स्टार मानकों की ओर अग्रसर होना चाहिए, ताकि गहन डीकार्बोनाइजेशन को बढ़ावा मिले।
भारतीय रेलवे जैसे बड़े सार्वजनिक संस्थानों के माध्यम से पायलट परियोजनाएँ शुरू करना व्यवहारिक अनुभव और परीक्षण का अवसर प्रदान कर सकता है।
अंततः, इस्पात, वित्त एवं पर्यावरण मंत्रालयों के बीच समन्वित प्रयास आवश्यक होंगे ताकि जलवायु लक्ष्यों को राजकोषीय व खरीद नीतियों के साथ प्रभावी ढंग से जोड़ा जा सके।