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संवैधानिक उपचारों के लिए रिट याचिका और ‘फोरम नॉन कन्वीनियंस’ सिद्धांत

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि जब कोई व्यक्ति संविधान के अनुच्छेद 226(1) के तहत उपलब्ध संवैधानिक उपचार (Constitutional Remedy) प्राप्त करने के लिए उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता का उपयोग करता है, तब ‘डॉक्ट्रिन ऑफ फोरम नॉन कन्वीनियंस’ (Doctrine of Forum Non Conveniens) का प्रयोग बहुत ही दुर्लभ परिस्थितियों में किया जाना चाहिए। न्यायालय ने यह टिप्पणी एक बर्खास्त बीएसएफ अधिकारी की अपील पर सुनवाई करते हुए की।

क्या है ‘डॉक्ट्रिन ऑफ फोरम नॉन कन्वीनियंस’ ?

  • ‘फोरम नॉन कन्वीनियंस’ एक सामान्य विधि (Common Law) का सिद्धांत है, जिसके अनुसार कोई न्यायालय किसी मामले की सुनवाई से इनकार कर सकता है या उसे स्थगित कर सकता है, यदि उसे लगता है कि किसी अन्य न्यायालय या क्षेत्राधिकार में उस मामले की सुनवाई अधिक उपयुक्त और सुविधाजनक ढंग से हो सकती है, भले ही वर्तमान न्यायालय के पास मामले की सुनवाई का अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) मौजूद हो।
  • ‘Forum Non Conveniens’ एक लैटिन शब्द है, जिसका अर्थ है “असुविधाजनक न्यायिक मंच” (Inconvenient Forum)। यह सिद्धांत विशेष रूप से अंतरराष्ट्रीय निजी कानून (Private International Law) और बहु-क्षेत्राधिकार (Multi-Jurisdictional) विवादों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

इस सिद्धांत के प्रमुख आधार

  • न्यायालय पक्षकारों की सुविधा और असुविधा का आकलन करता है। 
  • साक्ष्यों और गवाहों की उपलब्धता को ध्यान में रखा जाता है। 
  • यह देखा जाता है कि किस क्षेत्र का कानून विवाद पर लागू होगा। 
  • वैकल्पिक मंच पर निष्पक्ष सुनवाई की संभावना का मूल्यांकन किया जाता है। 
  • न्याय के हित (Interest of Justice) को सर्वोपरि माना जाता है। 
  • सामान्यतः प्रतिवादी (Defendant) यह तर्क देता है कि वर्तमान मंच उपयुक्त नहीं है और कोई अन्य मंच अधिक उचित है। 
  • प्रतिवादी को यह साबित करना होता है कि वैकल्पिक मंच उपलब्ध है तथा वहां मामले की प्रभावी सुनवाई संभव है। 

मामला क्या था ?

मामला -बक्शीश अहमद बनाम भारत संघ (Neutral Citation: 2026 INSC 630)

  • अपीलकर्ता बक्शीश अहमद 31 दिसंबर 2010 को सीमा सुरक्षा बल (BSF) में भर्ती हुए थे और 44वीं बटालियन में तैनात थे। 
  • पश्चिम बंगाल के मालदा जिले के नारायणपुर में उनकी तैनाती के दौरान एक महिला के लापता होने की शिकायत दर्ज हुई। जांच के दौरान अपीलकर्ता और एक अन्य कांस्टेबल पर महिला के अपहरण में संलिप्त होने का संदेह व्यक्त किया गया।
  • इसी बीच अपीलकर्ता की पत्नी ने भी शिकायत दर्ज कराते हुए आरोप लगाया कि उन्होंने उसकी इच्छा के विरुद्ध दूसरी शादी कर ली है तथा उसके साथ आपराधिक बल का प्रयोग किया है। इन आरोपों की जांच के लिए बीएसएफ ने स्टाफ कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी गठित की।
  • जांच के बाद अपीलकर्ता को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया, जिसमें उन पर बीएसएफ नियमों तथा केंद्रीय सिविल सेवा (आचरण) नियमों का उल्लंघन कर दूसरी शादी करने का आरोप लगाया गया। 
  • नोटिस का उत्तर न देने पर कमांडेंट ने उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया और सभी पेंशन संबंधी लाभों से वंचित कर दिया।
  • इसके विरुद्ध अपीलकर्ता ने बीएसएफ नियमों के तहत वैधानिक याचिका दायर की, जिसे खारिज कर दिया गया। बाद में उन्होंने दिल्ली उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर कर बर्खास्तगी आदेश को चुनौती दी, लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट ने ‘फोरम नॉन कन्वीनियंस’ का हवाला देते हुए याचिका खारिज कर दी।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

  • न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के निर्णय को पलटते हुए कहा कि अनुच्छेद 226 के तहत उपलब्ध संवैधानिक उपचारों के मामलों में ‘फोरम नॉन कन्वीनियंस’ सिद्धांत का अत्यधिक सावधानी से उपयोग किया जाना चाहिए।
  • पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दो आधारों पर दायर की जा सकती है—
    • प्रतिवादी कार्यालय का स्थान (Situs of Office) – अनुच्छेद 226(1) 
    • कारण-ए-कार्यवाही (Cause of Action) – अनुच्छेद 226(2) 
  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि रिट याचिका अनुच्छेद 226(1) के तहत दायर की गई है और प्रतिवादी संस्थाओं के कार्यालय संबंधित क्षेत्राधिकार में स्थित हैं, तो केवल ‘फोरम नॉन कन्वीनियंस’ के आधार पर याचिका खारिज नहीं की जानी चाहिए।

दिल्ली हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र को क्यों माना गया वैध ?

  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक (Director General, BSF) तथा भारत संघ के कार्यालय नई दिल्ली में स्थित हैं और वे इस मामले में आवश्यक पक्षकार (Necessary Parties) थे। 
  • इसलिए दिल्ली हाईकोर्ट के पास मामले की सुनवाई का अधिकार क्षेत्र मौजूद था।
  • न्यायालय ने यह भी कहा कि बीएसएफ नियमों के अनुसार बर्खास्तगी का प्रत्येक आदेश महानिदेशक को सूचित किया जाता है। ऐसे में यह मानना उचित है कि संबंधित अभिलेख और प्रशासनिक नियंत्रण नई दिल्ली से जुड़े हुए हैं।

‘फोरम नॉन कन्वीनियंस’ के दुरुपयोग पर टिप्पणी

  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह सिद्धांत तभी लागू होता है जब किसी व्यक्ति के पास समान राहत प्राप्त करने के लिए एक से अधिक उपयुक्त मंच उपलब्ध हों। 
  • ऐसी स्थिति में न्यायालय यह तय कर सकता है कि कोई दूसरा मंच अधिक सुविधाजनक है या नहीं।
  • हालांकि, रिट याचिकाओं के मामलों में विशेष रूप से तब, जब संवैधानिक अधिकारों की रक्षा का प्रश्न हो, इस सिद्धांत का प्रयोग न्याय तक पहुंच (Access to Justice) को बाधित कर सकता है। 
  • न्यायालय ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता ने स्वयं ऐसा मंच चुना है जहां प्रतिवादियों के कार्यालय स्थित हैं, तो ‘फोरम नॉन कन्वीनियंस’ का प्रयोग न्याय के हितों के विपरीत हो सकता है।

निर्णय का महत्व

  • यह फैसला स्पष्ट करता है कि संविधान द्वारा प्रदत्त रिट अधिकारिता को तकनीकी आधारों पर सीमित नहीं किया जा सकता। 
  • यदि किसी उच्च न्यायालय के पास अनुच्छेद 226(1) के तहत अधिकार क्षेत्र उपलब्ध है, तो केवल सुविधा के आधार पर याचिका खारिज करना उचित नहीं होगा। 
  • यह निर्णय नागरिकों की न्याय तक पहुंच को मजबूत करने तथा संवैधानिक उपचारों की प्रभावशीलता सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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