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रूस-भारत-चीन त्रिकोण: भारत के लिये बढ़ता महत्त्व

(प्रारम्भिक परीक्षा: राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाएँ)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-2: भारत के हितों पर विकसित तथा विकासशील देशों की नीतियों तथा राजनीति का प्रभाव)

चर्चा में क्यों?

भारत द्वारा जून 2020 के अंतिम सप्ताह में रूस, भारत और चीन (Russia, India and China-RIC) के विदेश मंत्रियों की एक आभासी बैठक (वर्चुअल मीटिंग) में भाग लिया गया।

बैठक के महत्त्वपूर्ण बिंदु

  • इस बैठक में कोई सयुंक्त बयान जारी नहीं किया गया हालाँकि दोनों देशों (चीन और रूस) द्वारा अलग-अलग बयान जारी किये गए।
  • चीन द्वारा उस पर लगे आधिपत्यवादी गतिविधियों के आरोपों का विरोध किया गया तथा सत्ता की राजनीति से सम्बंधित आरोपों का खंडन भी किया गया और अंतर्राष्ट्रीय सम्बंधों में कानून के शासन (रूल ऑफ़ लॉ) का समर्थन किया।
  • रूस द्वारा अमेरिका के भू-राजनीतिक प्रतिद्वंदियों से सम्बंधित विवादों के निपटान हेतु एक तरफ़ा उपायों की आलोचना की गई।
  • भारत ने एक टिकाऊ वैश्विक व्यवस्था के लिये प्रमुख शक्तियों को कानून का सम्मान करने और साझेदारों के वैध हित को समझने पर बल दिया।
  • चीन के साथ सीमा पर तनाव के चलते भारत ने यह निष्कर्ष निकाला गया है कि अब भारत को अपनी विदेश नीति को पश्चिम की ओर (अमेरिका और यूरोप की तरफ) संरेखित करनी चाहिये।

आर.आई.सी. (Russia-India-China-RIC)

  • आर.आई.सी. एक रणनीतिक समूह है, जो 1990 के दशक के अंत में रूस के तत्कालीन विदेश मंत्री के प्रयासों से अस्तित्त्व में आया था।इस समूह की स्थापना, अमेरिका द्वारा निर्देशित अधीनस्थ विदेश नीति को समाप्त करने तथा भारत के साथ पुराने सम्बंधों को नवीनीकृत करने एवं चीन के साथ नए सिरे से दोस्ती को बढ़ावा देने के आधार पर की गई थी।
  • ये तीनों देश एक ध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था से बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था में परिवर्तन हेतु सहमत हुए थे।हालाँकि इन तीनों देशों ने अमेरिका के साथ अपने सम्बंधों को अपनी वैश्विक महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति हेतु आवश्यक माना।
  • आर.आई.सी. देश वैश्विक क्षेत्रफल का 19% हिस्सा साझा करते हैं तथा वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में इनका 33 %का योगदान है।
  • आर.आई.सी.संवादके प्रारम्भिक वर्षों में रूस और चीन के साथ भारत के सम्बंधों में तेज़ी आई है।
  • आर.आई.सी. की वैश्विक आर्थिक और वित्तीय संरचना के लोकतांत्रि करण का समर्थन बाद में ब्रिक देशों (ब्राज़ील के शामिल होने के पश्चात) के एजेंडे में शामिल किया गया।

भारत-अमेरिका सम्बंधों में मज़बूती के कारण

  • अमेरिका के साथ एक ऐतिहासिक नागरिक परमाणु समझौते और रक्षा सम्बंध भारत की रूस पर सैन्य अधिग्रहण की निर्भरता को कम करने तथा रक्षा खरीद में विविधता लाने के भारत की विदेश नीति के उद्देश्य से मेल खाती है।
  • पूर्व में चीन के तेज़ी सेबढ़ते प्रभाव के कारण अमेरिका ने एशिया में अपनी स्थिति को मज़बूत करने के लिये भारत को लोकतान्त्रिक मूल्य में समानता के आधार पर अपना साझीदार बनाया है।
  • भारत द्वारा आर.आई.सी. से अपनी दूरी बनाने और अमेरिका एवं यूरोपीय संघ की तरफ़ केंद्रित होने का मुख्य कारण चीन द्वारा चीन-पकिस्तान आर्थिक गलियारे का निर्माण और हिन्द महासागर में अपनी सैन्य और आर्थिक उपस्थिति का विस्तार है।
  • वर्ष 2014 में रूस द्वारा क्रीमिया को अपने क्षेत्र में शामिल किये जाने से रूस-अमेरिका सम्बंधों में तनाव के चलते अमेरिका ने भारत को एशिया में अधिक महत्त्व देना शुरू किया।
  • रूसको अलग-थलग करने के पश्चिमी अभियान, रूस और चीन की निकटता का मुख्य कारण है विशेषकर रक्षा क्षेत्र में बढ़ता सहयोग।
  • रूस और चीन के मध्य एक अनौपचारिक समझ है कि रूस यूरेशियाई क्षेत्र में राजनैतिक सुरक्षा मुद्दों को सम्भालता है और चीन इसके लिये आर्थिक सहायता प्रदान करता है।

आर.आई.सी. की चुनौतियाँ

  • भारत-अमेरिका धुरी और रूस-चीन-पकिस्तान धुरी आर.आई.सी. समूह के हितों के अनुरूप नहीं है तथा इंडो-पैसिफ़िक क्षेत्र के सम्बंध में सभी सदस्यों की एक राय न होने से इस समूह का महत्त्व कम हो रहा है।
  • चीन, भारत-अमेरिका की हिन्द-प्रशांत पहल को अमेरिकी नेतृत्व नीति के रूप में देखता है।
  • रूस का विदेश मंत्रालय भी हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में भारत तथा अमेरिका के सहयोग को भारत-जापान को चीन और रूस के विरुद्ध एक सैन्य गठबंधन बनाने के लिये अमेरिकी चाल के रूप में देखता है।

भारत की रणनीति

  • चेन्नई-व्लादिवोस्तोक समुद्री गलियारे की सक्रियता, रूस को यह समझाने में सहायता कर सकती है कि एशियाई-प्रशांत क्षेत्र में हम दोनों के हित समान हैं, जिससे चीनी प्रभुत्व को इस क्षेत्र में कमज़ोर करने के साथ-साथ रूस-चीन धुरी को भी कमज़ोर किया जा सकता है।
  • भारत को चीन के साथ हाल के घटनाक्रमों से द्विपक्षीय विषमताओं को पाटने में अपने प्रयासों में तेज़ी लानी चाहिये। क्योंकि चीन के साथ तनाव एक अच्छा विकल्प नहीं है।
  • भारत को अमेरिका के साथ तीव्र गति से बढ़ती साझेदारी से भी सतर्क रहने की आवश्यकता है क्योंकि राष्ट्रीय सुरक्षा के विषय को पूरी तरह से किसी भी अन्य देश को नहीं सौंपा जा सकता है।
  • रक्षा और उर्जा के क्षेत्र,भारत और रूस की साझेदारी के महत्त्वपूर्ण स्तम्भ हैं| रूस के प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों तक पहुँच भारत की उर्जा सुरक्षा में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है।इसलिये भारत को रूस और अमेरिका का एकतरफा पक्ष लेने से बचना चाहिये।
  • भारत को अपनी सामरिक स्वायत्तता को बनाए रखना चाहिये तथा प्रयास करना चाहिये कि शीतयुद्ध जैसी परिघटना की पुनरावृत्ति न होने पाए।
  • भारत के लिये इंडो-पैसिफ़िक क्षेत्र आर्थिक और सुरक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण स्थान है| इसमें किसी बाहरी शक्ति के प्रभाव को रोका जाना चाहिये।

निष्कर्ष

रूस भारत का पुराना साथी है लेकिन भारत को इस बात का भी आभास है कि रूस चीन के इशारों पर कार्य करने को लेकर तनाव में है।इस वर्ष जनवरी में रायसीना डायलॉग के दौरान रूस के विदेश मंत्री द्वारा इंडो-पैसिफिक अवधारणा का खुले तौर विरोध किया गया था। इसलिये भारत द्वारा अपनी विदेश नीति में एक व्यापक दृष्टिकोण का अनुसरण करते हुए एशिया और पश्चिमी शक्तियों के मध्य एक संतुलित रास्ता अपनाए जाने की आवश्यकता है।

स्रोत: द हिंदू, ORF

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