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विश्व व्यापार संगठन (WTO) की 14वीं मंत्री स्तरीय बैठक (MC14)

संदर्भ 

  • विश्व व्यापार संगठन (WTO) की 14वीं मंत्री स्तरीय बैठक (MC14) 26–29 मार्च को याउंदे, कैमरून में आयोजित की जाएगी। यह बैठक डब्ल्यूटीओ का सर्वोच्च निर्णय-निर्माण निकाय है और आमतौर पर हर दो साल में एक बार आयोजित होती है। इसका उद्देश्य संगठन के नियमों पर निर्णय लेना और भविष्य के कार्यों के लिए मार्गदर्शन तय करना है। 

14वीं मंत्री स्तरीय बैठक (MC14) की पृष्ठभूमि 

  • MC14 उस समय आयोजित हो रही है जब अमेरिका और चीन के बीच भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, साथ ही वैश्विक संघर्ष जारी हैं और अंतरराष्ट्रीय व्यापार अधिक सुरक्षा-केंद्रित होता जा रहा है। इन्ही चुनौतियों के बीच बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली कमजोर पड़ रही है और एकतरफा नीतियाँ बढ़ रही हैं। 
  • पिछले वर्ष अमेरिका ने टैरिफ का प्रयोग कर बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था पर बड़ा दबाव डाला है। वस्तुतः अमेरिकी टैरिफ नीतियाँ डब्ल्यूटीओ के दो मुख्य सिद्धांतों का उल्लंघन करती हैं:
    • सबसे अधिक लाभार्थी राष्ट्र (MFN) नियम  — जो सभी व्यापारिक भागीदारों के साथ समान व्यवहार सुनिश्चित करता है। 
    • बाउंड रेट दायित्व  — जो तय सीमा से अधिक टैरिफ लगाने से रोकता है। 
  • साथ ही साथ, अमेरिका ने टैरिफ के दबाव से एकतरफा व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर करना शुरू कर दिया है। 

बहुपक्षीय व्यापार संकट के कारण 

  • वाशिंगटन में यह विश्वास बढ़ा है कि वर्ष 1995 अमेरिका द्वारा स्थापित डब्ल्यूटीओ अमेरिकी हितों की पूर्ति नहीं कर रहा।  
    • चीन का उदय  — पिछले दो दशकों में चीन की तीव्र आर्थिक संवृद्धि एवं विकास ने अमेरिका और चीन के बीच शक्ति अंतर घटा दिया। 
    • विफल अपेक्षाएँ  — चीन का डब्ल्यूटीओ में प्रवेश अमेरिकी उम्मीदों के अनुरूप चीन की राज्य-केन्द्रित औद्योगिक नीतियों को नियंत्रित नहीं कर सका।  
  • वस्तुतः अमेरिका अब डब्ल्यूटीओ नियमों जैसी कानूनी सीमाओं को दरकिनार कर चीन का मुकाबला स्वतंत्र रूप से करना चाहता है। इसके लिए उसने डब्ल्यूटीओ के विवाद समाधान तंत्र को प्रभावित किया और अपीलीय संस्था (Appellate Body) के सदस्यों की नियुक्ति लगातार नियंत्रण लगाया है। 
  • इसके अलावा, डब्ल्यूटीओ की निर्णय-निर्माण प्रक्रिया सहमति-आधारित होने के कारण नए व्यापार नियम बनाने में धीमी है। पिछले तीन दशकों में केवल दो नए समझौते हुए हैं:  
    1. व्यापार सुगमता समझौता (Trade Facilitation Agreement
    2. मत्स्य पालन सब्सिडी पर समझौता (Agreement on Fisheries Subsidies)  
  • यद्यपि नई नियमावली बनाने में इस धीमी प्रक्रिया ने देशों को मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) की ओर प्रवृत्त किया है। 

MC14 में मुख्य मुद्दे 

  1. बहुपक्षीय समझौते (Plurilateral Agreements) 
    • निवेश सुगमता (Investment Facilitation for Development) और इलेक्ट्रॉनिक वाणिज्य (E-Commerce) समझौते चर्चा में हैं। 
    • ये समझौते Annex 4 में शामिल किए जा सकते हैं, लेकिन इसके लिए सभी सदस्यों की सहमति जरूरी है। 
    • कई देशों के अनुसार यह डब्ल्यूटीओ के नियम निर्माण को पुनर्जीवित कर सकता है, जबकि भारत चेतावनी देता है कि इससे प्रणाली का विभाजन हो सकता है।  
  2. ई-कॉमर्स मोरेटोरियम 
    • 1998 में शुरू हुआ यह मोरेटोरियम यह डिजिटल ट्रांसमिशन पर टैरिफ लगाने से रोकता है। 
    • विकसित देश इसे स्थायी बनाना चाहते हैं; भारत और अन्य विकासशील देशों के लिए राजस्व हानि की संभावना चिंता का विषय है। 
  3. विशेष और भिन्न व्यवहार (SDT) 
    • यह विकासशील और सबसे कम विकसित देशों को विशेष अधिकार देता है। 
    • अमेरिका बड़े विकासशील देशों जैसे चीन, भारत, ब्राजील और इंडोनेशिया को इससे बाहर करना चाहता है। 
  4. अपील संस्था की बहाली 
    • डब्ल्यूटीओ के विवाद समाधान तंत्र को फिर से प्रभावी बनाने के लिए अपीलीय संस्था को बहाल करना आवश्यक है। 
  5. डब्ल्यूटीओ के मूल सिद्धांतों की रक्षा  
    • अमेरिका सबसे अधिक लाभार्थी राष्ट्र (MFN) नियम को चुनौती दे सकता है; विकासशील देशों को इसका विरोध करना चाहिए। 

भारत की भूमिका 

  • भारत, जो हमेशा व्यापार बहुपक्षवाद का समर्थक रहा है, उसे अब नेतृत्व की भूमिका निभानी चाहिए: 
    • नेतृत्व : भारत को विकासशील देशों (तीसरी दुनिया) के 'मानक नेता' (normative leader) के रूप में उभरना चाहिए।
    • लचीलापन : भारत को बहुपक्षीय (plurilateral) समझौतों के विरोध जैसी अपनी पुरानी स्थितियों पर पुनर्विचार करना चाहिए।
    • नवाचार : अपीलीय निकाय के सदस्यों को चुनने के लिए 'मतदान' जैसे नवाचारों का समर्थन करना चाहिए। 
  • यद्यपि इसके लिए भारत को पुराने रुखों पर पुनर्विचार करना होगा और नए समाधान अपनाने होंगे, जैसे अपीलीय संस्था के सदस्यों का मतदान द्वारा चयन। 
  • मंत्रिस्तरीय बैठक (MC14) का असफल होना अमेरिका के एकतरफा नीतियों और जबरदस्ती आधारित वैश्विक व्यापार व्यवस्था को जीत दिलाएगा, जो विकासशील देशों के लिए गंभीर नुकसानदायक होगा।
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