वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में पीएम-कुसुम (PM-KUSUM) योजना के लिए आवंटन को लगभग दोगुना कर ₹5,000 करोड़ कर दिया गया है। इसके साथ ही सरकार 10 गीगावाट क्षमता के लक्ष्य के साथ एक राष्ट्रीय एग्री-फोटोवोल्टिक्स मिशन शुरू करने पर विचार कर रही है। यह पहल ऐसे समय में सामने आई है जब भारत को एक ओर खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करनी है और दूसरी ओर 2030 तक 300 गीगावाट सौर ऊर्जा क्षमता प्राप्त करनी है।
इस संदर्भ में एग्री-फोटोवोल्टिक्स (AgriPV) एक अभिनव समाधान के रूप में उभर रहा है जो भूमि उपयोग के पारंपरिक टकराव को समाप्त कर समन्वित उपयोग की दिशा में मार्ग प्रशस्त करता है।
एग्री-फोटोवोल्टिक्स की अवधारणा
एग्री-फोटोवोल्टिक्स ऐसी तकनीक है जिसमें एक ही भूमि पर सौर ऊर्जा उत्पादन और कृषि गतिविधियां एक साथ संचालित की जाती हैं। इसके अंतर्गत सोलर पैनलों को इस प्रकार ऊंचाई पर या उचित अंतराल में स्थापित किया जाता है कि उनके नीचे या बीच में फसलें उगाई जा सकें।
इस मॉडल के माध्यम से एक खेत न केवल खाद्य उत्पादन करता है बल्कि ऊर्जा उत्पादन का भी केंद्र बन जाता है।
प्रमुख विशेषताएँ
एग्रीपीवी प्रणाली की एक महत्वपूर्ण विशेषता पैनलों का ऊंचाई पर स्थापित होना है जिससे खेती के कार्य, जैसे- जुताई, सिंचाई एवं कटाई सुगमता से जारी रह सकें।
इसके डिजाइन में विविधता भी देखी जाती है, जैसे- पंक्ति आधारित व्यवस्था, वर्टिकल पैनल प्रणाली और ग्रीनहाउस के साथ एकीकृत मॉडल।
इसके अतिरिक्त, सोलर पैनलों द्वारा उत्पन्न आंशिक छाया खेत में एक सूक्ष्म जलवायु (Micro-climate) बनाती है जिससे मृदा का तापमान कम रहता है और फसलें चरम मौसमीय परिस्थितियों से सुरक्षित रहती हैं।
तकनीकी दृष्टि से पैनलों की दूरी और झुकाव को इस प्रकार अनुकूलित किया जाता है कि फसलों को पर्याप्त प्रकाश प्राप्त हो और ऊर्जा उत्पादन भी अधिकतम हो सके।
भारत के लिए संभावनाएँ
भारत जैसे कृषि-प्रधान देश के लिए एग्रीपीवी अनेक अवसर प्रस्तुत करता है। सबसे पहले यह किसानों की आय के स्रोतों को विविध बनाता है। किसान अतिरिक्त बिजली बेचकर या अपनी भूमि लीज पर देकर स्थिर आय अर्जित कर सकते हैं।
दूसरा, यह जल संरक्षण में सहायक है। आंशिक छाया के कारण वाष्पीकरण कम होता है जिससे मृदा में नमी बनी रहती है और सिंचाई की आवश्यकता घटती है।
तीसरा, यह भूमि के समुचित उपयोग को सुनिश्चित करता है जिससे ‘खाद्य बनाम ऊर्जा’ का द्वंद्व समाप्त होता है।
इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलता है (जैसे- सौर ऊर्जा से संचालित कोल्ड स्टोरेज) जिससे फसल का भंडारण बेहतर होता है और नुकसान कम होता है।
अंततः, यह जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने में भी मदद करता है क्योंकि पैनल फसलों को अत्यधिक गर्मी एवं अनियमित वर्षा से बचाते हैं।
नीतिगत पहल
पीएम-कुसुम योजना के तहत विकेंद्रीकृत सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए बजट में उल्लेखनीय वृद्धि की गई है।
इसके साथ ही, प्रस्तावित राष्ट्रीय एग्री-फोटोवोल्टिक्स मिशन इस तकनीक को व्यापक स्तर पर लागू करने का प्रयास है।
व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण (Viability Gap Funding: VGF) के माध्यम से उच्च प्रारंभिक लागत को कम करने की योजना भी बनाई गई है।
इसके अतिरिक्त, देशभर में विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में लगभग 50 पायलट परियोजनाएँ चलाई जा रही हैं जिनमें अलग-अलग फसलों और सोलर डिजाइनों का परीक्षण किया जा रहा है।
प्रमुख चुनौतियाँ
सबसे बड़ी चुनौती इसकी उच्च लागत है क्योंकि ऊंचे ढांचे के लिए अधिक संसाधनों और विशेष तकनीक की आवश्यकता होती है।
दूसरी समस्या फसल उत्पादन में अनिश्चितता की है क्योंकि गलत डिजाइन से प्रकाश की कमी हो सकती है जिससे पैदावार प्रभावित होती है।
विशेषकर भूमि के वर्गीकरण जैसे मुद्दों को लेकर नियामकीय स्तर पर भी अस्पष्टता बनी हुई है जिससे किसानों में असमंजस रहता है।
तकनीकी कौशल की कमी भी एक बड़ी समस्या है क्योंकि इस प्रणाली को संचालित करने के लिए कृषि एवं तकनीकी दोनों का ज्ञान आवश्यक है।
इसके अलावा, कई ग्रामीण क्षेत्रों में ग्रिड कनेक्टिविटी की कमी के कारण अतिरिक्त बिजली को बाजार तक पहुंचाना मुश्किल होता है।
आगे की रणनीति
राज्य-विशिष्ट योजनाओं के माध्यम से फसल और सोलर पैनलों के उपयुक्त संयोजन विकसित किए जाने चाहिए।
साथ ही, स्पष्ट एवं एकरूप नीतिगत ढांचा तैयार करना जरूरी है जिससे भूमि उपयोग और किसानों के अधिकार सुरक्षित रहें।
वित्तीय सहायता को सुलभ बनाने के लिए कम ब्याज दर पर ऋण एवं किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) की भागीदारी बढ़ाई जानी चाहिए।
तकनीकी मानकीकरण के लिए सोलर संरचनाओं के लिए निर्धारित दिशा-निर्देश तैयार किए जाने चाहिए।
अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में अधिक ‘लाइव लैब’ स्थापित करना भी आवश्यक है।
निष्कर्ष
एग्री-फोटोवोल्टिक्स एक ऐसी अभिनव अवधारणा है जो भूमि उपयोग के प्रतिस्पर्धात्मक दृष्टिकोण को सहयोगात्मक मॉडल में बदलती है। यह न केवल ऊर्जा और खाद्य उत्पादन के बीच संतुलन स्थापित करती है बल्कि किसानों को आर्थिक रूप से सशक्त भी बनाती है।
पीएम-कुसुम योजना के साथ इसके एकीकरण से किसान ‘अन्नदाता’ के साथ-साथ ‘ऊर्जादाता’ की भूमिका भी निभा सकते हैं।
दीर्घकाल में यह मॉडल भारत को वर्ष 2070 तक एक टिकाऊ, लचीली एवं नेट-ज़ीरो ग्रामीण अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।