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सी. राजगोपालाचारी: मंदिर प्रवेश सुधारक को राष्ट्रपति भवन में सम्मान

चर्चा में क्यों ?

हाल ही में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा राष्ट्रपति भवन के केंद्रीय प्रांगण में सी. राजगोपालाचारी (राजाजी) की प्रतिमा का अनावरण किया गया। यह प्रतिमा ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियंस की प्रतिमा के स्थान पर स्थापित की गई है।


प्रारंभिक जीवन और राष्ट्रीय चेतना

  • राजाजी का जन्म 10 दिसंबर 1878 को तमिलनाडु के थोरापल्ली गाँव में हुआ। वे प्रारंभ से ही मेधावी छात्र थे और आगे चलकर सफल वकील बने। परंतु राष्ट्रीय आंदोलन की लहर ने उन्हें सार्वजनिक जीवन की ओर प्रेरित किया।
  • 1919 में उनकी मुलाकात महात्मा गांधी से हुई, जिसने उनके राजनीतिक जीवन को निर्णायक दिशा दी।
  • उन्होंने रॉलेट एक्ट के विरोध, असहयोग आंदोलन और विदेशी वस्त्र बहिष्कार जैसे अभियानों में सक्रिय भाग लिया।
  • उन्होंने अपनी वकालत छोड़कर पूर्णकालिक रूप से स्वतंत्रता संग्राम को समर्पित कर दिया। 
  • 1930 में नमक सत्याग्रह के दौरान उन्होंने दक्षिण भारत में त्रिची से वेदारण्यम तक ऐतिहासिक पदयात्रा का नेतृत्व किया, जो दांडी मार्च की तर्ज पर आयोजित की गई थी।

प्रशासनिक भूमिका और राजनीतिक दृष्टिकोण

  • 1937 में वे मद्रास प्रांत के प्रधानमंत्री बने। अपने कार्यकाल में उन्होंने शिक्षा, प्रशासन और सामाजिक सुधार के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कदम उठाए। वे अनुशासन, सादगी और नैतिक मूल्यों के लिए प्रसिद्ध थे।
  • 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय उनका दृष्टिकोण कुछ अलग था। वे मानते थे कि हिंदू-मुस्लिम समस्या का समाधान किए बिना स्वतंत्रता अधूरी रहेगी। 
  • इसी सोच के तहत उन्होंने कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच समझौते का प्रस्ताव रखा, जिसे “राजाजी फॉर्मूला” कहा गया। 
  • 1944 में यह प्रस्ताव मुहम्मद अली जिन्ना के समक्ष रखा गया, परंतु इसे स्वीकृति नहीं मिली। यद्यपि यह प्रयास सफल नहीं हुआ, पर इससे उनकी दूरदर्शिता और व्यावहारिक सोच स्पष्ट होती है।

सामाजिक सुधार: मंदिर प्रवेश आंदोलन

  • राजाजी सामाजिक समानता के समर्थक थे। 1939 में मदुरै के मीनाक्षी मंदिर में दलितों के प्रवेश को वैधता दिलाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। 
  • उन्होंने “मंदिर प्रवेश प्राधिकरण और क्षतिपूर्ति अधिनियम” पारित कराकर उन अधिकारियों को कानूनी सुरक्षा प्रदान की जिन्होंने मंदिरों के द्वार सभी जातियों के लिए खोले।
  • उनका दृष्टिकोण उग्र नहीं, बल्कि सुधारवादी था। वे सामाजिक परिवर्तन को परंपरा के भीतर रहकर आगे बढ़ाने में विश्वास करते थे। 
  • यही कारण है कि उन्हें दक्षिण भारत में सामाजिक सुधार के अग्रदूतों में गिना जाता है।

भाषा नीति पर संतुलन

  • मद्रास प्रांत के प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने हिंदी को विद्यालयों में अनिवार्य किया, परंतु बाद में उन्होंने यह स्पष्ट किया कि किसी भी भाषा को थोपना उचित नहीं है। 
  • 1965 के हिंदी-विरोधी आंदोलनों के दौरान उन्होंने हिंदी को एकमात्र राजभाषा बनाने के प्रयासों का विरोध किया और अंग्रेजी को संपर्क भाषा बनाए रखने का समर्थन किया। 
  • उनका तर्क था कि राष्ट्रीय एकता के लिए भाषाई संतुलन आवश्यक है।

स्वतंत्र भारत में भूमिका

  • 1947 के बाद राजाजी ने विभिन्न संवैधानिक पदों पर कार्य किया। 
  • 1948 में वे भारत के गवर्नर-जनरल बने-यह पद संभालने वाले वे एकमात्र भारतीय थे। बाद में वे केंद्रीय गृह मंत्री भी रहे और 1952 से 1954 तक पुनः मद्रास के मुख्यमंत्री बने।
  • 1954 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया। वे प्रशासनिक ईमानदारी और सादगी के लिए जाने जाते थे।

स्वतंत्र पार्टी और आर्थिक विचार

  • 1959 में उन्होंने स्वतंत्र पार्टी की स्थापना की। उस समय देश में समाजवादी नीतियों और राज्य नियंत्रण की प्रवृत्ति बढ़ रही थी। 
  • राजाजी ने मुक्त बाजार, निजी उद्यम और सीमित सरकार की वकालत की। 
  • उनका मानना था कि अत्यधिक सरकारी नियंत्रण आर्थिक प्रगति में बाधा बन सकता है।
  • हालाँकि उनकी पार्टी को व्यापक जनसमर्थन नहीं मिला, फिर भी उसने भारतीय राजनीति में वैकल्पिक आर्थिक विमर्श को जन्म दिया। 
  • आज के उदारीकरण के दौर में उनके विचारों की प्रासंगिकता अधिक स्पष्ट दिखाई देती है।

साहित्यिक और बौद्धिक योगदान

  • राजाजी एक कुशल लेखक भी थे। उन्होंने रामायण और महाभारत के सरल और लोकप्रिय संस्करण लिखे, जिससे नई पीढ़ी भारतीय संस्कृति से जुड़ सकी। 
  • उनके लेखन में नैतिक शिक्षा और व्यावहारिक बुद्धिमत्ता का समन्वय दिखाई देता है।

समकालीन महत्व

  • हाल के वर्षों में राष्ट्रपति भवन में उनकी प्रतिमा की स्थापना उनके योगदान की औपचारिक मान्यता है। यह केवल एक मूर्ति का अनावरण नहीं, बल्कि उस नैतिक और सादगीपूर्ण राजनीति को स्मरण करने का प्रयास है जिसका प्रतिनिधित्व राजाजी करते थे।
  • राजगोपालाचारी का जीवन हमें यह सिखाता है कि राष्ट्रनिर्माण केवल संघर्ष से नहीं, बल्कि संवाद, संतुलन और नैतिक प्रतिबद्धता से भी होता है। वे स्वतंत्रता सेनानी, प्रशासक, समाज सुधारक और चिंतक-इन सभी भूमिकाओं में समान रूप से सफल रहे।
  • आज जब राजनीति में वैचारिक ध्रुवीकरण बढ़ रहा है, राजाजी की विरासत हमें सहिष्णुता, व्यावहारिकता और लोकतांत्रिक संवाद की याद दिलाती है। वे भारतीय लोकतंत्र के ऐसे पुरोधा थे जिन्होंने सत्ता को साधन माना, साध्य नहीं।

निष्कर्ष

सी. राजगोपालाचारी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख नेता, समाज सुधारक और प्रखर चिंतक थे। उन्होंने मंदिर प्रवेश जैसे सामाजिक सुधारों को आगे बढ़ाया, भाषा नीति पर संतुलित दृष्टिकोण अपनाया और स्वतंत्र भारत में उदार आर्थिक विचारों का समर्थन किया। गवर्नर-जनरल के रूप में उनकी भूमिका ऐतिहासिक रही। उनका जीवन नैतिक राजनीति, संवाद और लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित राष्ट्रनिर्माण की प्रेरणा देता है।

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