जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे के बीच वैज्ञानिक अब बड़े पैमाने पर भू-इंजीनियरिंग समाधान तलाश रहे हैं। इसी संदर्भ में यूट्रेक्ट विश्वविद्यालय के एक नए शोध ने एक रोचक संभावना पेश की है-क्या बेरिंग जलडमरूमध्य पर बांध बनाकर अटलांटिक मेरिडियनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन (AMOC) को स्थिर किया जा सकता है ?

अटलांटिक मेरिडियनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन (AMOC) क्या है और क्यों महत्वपूर्ण है ?
- अटलांटिक मेरिडियनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन (AMOC) समुद्री धाराओं की एक विशाल प्रणाली है, जो अटलांटिक महासागर में पानी का परिसंचरण करती है। इसमें गर्म पानी उत्तर की ओर और ठंडा पानी दक्षिण की ओर बहता है।

कार्यप्रणाली
- AMOC की प्रक्रिया एक “कन्वेयर बेल्ट” की तरह काम करती है :
- सतह का गर्म पानी (जैसे गल्फ स्ट्रीम) ध्रुवों की ओर बढ़ता है
- वहां ठंडा होकर बर्फ बनने लगती है
- बर्फ बनने पर नमक पानी में रह जाता है - पानी अधिक खारा और घना हो जाता है
- यह भारी पानी नीचे डूब जाता है और गहराई में दक्षिण की ओर बहता है
- अंततः यह पानी फिर सतह पर ऊपर आता है, गर्म होता है और चक्र पूरा करता है.
एएमओसी का महत्व
- वैश्विक ऊष्मा संतुलन (Heat Budget) बनाए रखता है।
- पश्चिमी यूरोप की सर्दियों को अपेक्षाकृत कम कठोर बनाता है।
- वायुमंडलीय CO₂ को अवशोषित कर कार्बन सिंक के रूप में कार्य करता है।
एएमओसी का कमजोर होना
- एक जल अणु को पूरा चक्र पूरा करने में लगभग 1000 वर्ष लग सकते हैं।
- जलवायु मॉडल बताते हैं कि ग्रीनहाउस गैसों में वृद्धि से 21वीं सदी में AMOC कमजोर हो सकता है।
कारण:
- महासागर की सतह का अधिक गर्म होना
- बर्फ पिघलने और वर्षा बढ़ने से पानी का कम खारा (fresh) होना
- पानी का हल्का होना → डूबने की प्रक्रिया कम होना
- इससे “कन्वेयर बेल्ट” धीमी हो जाती है।
कमजोर AMOC के परिणाम
- महासागर पर प्रभाव :
- उत्तरी अटलांटिक में समुद्री उत्पादकता में कमी
- जलवायु पर प्रभाव :
- उत्तरी यूरोप में अधिक तूफान
- साहेल क्षेत्र में कम वर्षा
- दक्षिण एशिया में मानसून कमजोर होना
- अन्य प्रभाव :
- अटलांटिक में उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की संख्या में कम
- उत्तर-पूर्वी उत्तरी अमेरिका के तट पर समुद्र स्तर में वृद्धि
शोध क्या कहता है ?
- पीएचडी शोधकर्ता जेले सून्स ने जलवायु मॉडलों का उपयोग कर यह अध्ययन किया कि यदि बेरिंग जलडमरूमध्य को बंद कर दिया जाए, तो AMOC पर क्या असर पड़ेगा?
मुख्य निष्कर्ष:
- कुछ परिस्थितियों में AMOC अधिक स्थिर रहता है।
- अन्य परिस्थितियों में यह और कमजोर हो सकता है।
- परिणाम काफी हद तक प्रारंभिक स्थितियों और समय पर निर्भर करते हैं।
- शोध अभी केवल “concept proof” है, व्यावहारिक समाधान नहीं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: सोवियत योजना
- 1960 के दशक में सोवियत इंजीनियर पेट्र मिखाइलोविच बोरिसोव ने आर्कटिक सागर की बर्फ पिघलाने की एक महत्वाकांक्षी योजना प्रस्तावित की।
- उनका मानना था कि इससे सोवियत संघ के बड़े हिस्सों को कृषि और बसावट के लिए उपयोग किया जा सकेगा।
- साथ ही, इससे सहारा रेगिस्तान हरा-भरा हो सकता है और वैश्विक जलवायु में नरमी आएगी।
प्रस्तावित योजना
- बेरिंग जलडमरूमध्य में बांध बनाने का सुझाव
- इसका उद्देश्य आर्कटिक के ठंडे पानी और प्रशांत महासागर के गर्म पानी के बीच आदान-प्रदान को नियंत्रित करना
- संभावित परिणाम गर्म पानी आर्कटिक की ओर प्रवाहित होगा और समुद्र की अधिकांश बर्फ पिघल जाएगी।
क्या यह वास्तव में संभव है ?
- तकनीकी चुनौतियाँ :
- जलडमरूमध्य लगभग 80 किमी चौड़ा है
- क्षेत्र अत्यंत दूरस्थ और अविकसित है
- निर्माण लागत और लॉजिस्टिक्स बेहद जटिल
पर्यावरणीय प्रभाव:
- समुद्री जीवों के प्रवास मार्ग प्रभावित होंगे
- पारिस्थितिकी तंत्र में बड़े बदलाव आ सकते हैं।
भू-इंजीनियरिंग की बहस
- यह परियोजना भू-इंजीनियरिंग का उदाहरण है, जिसमें जलवायु को कृत्रिम रूप से नियंत्रित करने की कोशिश होती है
- लेकिन सवाल उठते हैं ऐसा निर्णय कौन लेगा?
- इसके जोखिम कौन उठाएगा?
- क्या यह उत्सर्जन कम करने के प्रयासों को कमजोर करेगा ?
निष्कर्ष:
यह अध्ययन दर्शाता है कि बड़े पैमाने के तकनीकी हस्तक्षेप संभावित समाधान हो सकते हैं, लेकिन वे जोखिम और अनिश्चितताओं से भरे हैं; इसलिए भू-इंजीनियरिंग को जलवायु परिवर्तन के मुख्य समाधान के बजाय अंतिम विकल्प के रूप में देखा जाना चाहिए।