भारत अपने विकास क्रम के एक अहम मोड़ पर खड़ा है। वर्ष 2040 तक उपलब्ध उसका जनसांख्यिकीय लाभांश देश को युवा आबादी को उत्पादक मानव पूंजी में परिवर्तित करने का एक अनोखा अवसर देता है। हालाँकि, इस अवसर को वास्तविक उपलब्धि में बदलने के लिए व्यावसायिक शिक्षा और कौशल विकास तंत्र में गहन व व्यापक सुधार अनिवार्य हैं।
यद्यपि 2020 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति जैसी महत्वाकांक्षी नीतियाँ लागू की गईं, फिर भी वित्तीय ढाँचे, प्रशासनिक क्षमता और उद्योग की भागीदारी से जुड़ी संरचनात्मक कमियाँ अपेक्षित परिणामों में बाधा बनी हुई हैं।
यदि व्यवस्था को मांग-आधारित, उत्तरदायी और नियोक्ता-स्वामित्व वाले मॉडल में परिवर्तित नहीं किया गया, तो यही जनसांख्यिकीय लाभ भविष्य में चुनौती बन सकता है।
व्यावसायिक शिक्षा की दीर्घकालिक उपेक्षा
वैश्विक परिप्रेक्ष्य
यूरोपीय संघ के कई देशों तथा चीन ने मजबूत व्यावसायिक शिक्षा प्रणालियाँ विकसित की हैं जहाँ माध्यमिक शिक्षा के लगभग आधे छात्र व्यावसायिक धाराओं को अपनाते हैं।
विकसित देशों में औसतन शिक्षा बजट का लगभग 2% व्यावसायिक शिक्षा पर खर्च होता है जबकि चीन व जर्मनी में यह हिस्सा 11% तक पहुँचता है। इसके विपरीत भारत में माध्यमिक स्तर पर मात्र 1.3% छात्र व्यावसायिक शिक्षा से जुड़े हैं।
यह स्थिति वर्षों की नीतिगत अनदेखी, विद्यालयी शिक्षा पर विलंबित ध्यान और कौशल आधारित मार्गों को पर्याप्त महत्व न देने को दर्शाती है। साथ ही, सार्वजनिक आँकड़ों की कमी और विभिन्न मंत्रालयों में बंटी योजनाओं के कारण पारदर्शिता व समन्वय भी कमजोर पड़ते हैं।
विखंडित वित्त व्यवस्था और नीतिगत अस्थिरता
कौशल विकास कार्यक्रम अक्सर वार्षिक बजट घोषणाओं पर आधारित रहते हैं, जिससे निरंतरता का अभाव उत्पन्न होता है और योजनाएँ अल्पकालिक बनकर रह जाती हैं।
कई बार योजनाएँ एक वर्ष में प्रमुखता प्राप्त करती हैं और अगले वर्ष हाशिये पर चली जाती हैं। आवंटित संसाधनों का पूरा उपयोग न होना और क्रियान्वयन की कमजोरी, प्रणालीगत अक्षमताओं की ओर संकेत करती है।
इस प्रकार की अस्थिरता दीर्घकालिक रणनीति निर्माण में बाधा डालती है और एक सुदृढ़ कौशल पारिस्थितिकी तंत्र विकसित नहीं हो पाता है।
नीतिगत लक्ष्य और वास्तविकता
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (2020)
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का उद्देश्य 2025 तक 50% विद्यार्थियों को व्यावसायिक शिक्षा से परिचित कराना है।
हालाँकि केवल परिचय कराना पर्याप्त नहीं है; इससे न तो समुचित एकीकरण सुनिश्चित होता है और न ही रोजगार की गारंटी मिलती है।
सार्थक बदलाव के लिए आवश्यक है कि व्यावसायिक शिक्षा को औपचारिक शिक्षा ढाँचे का अभिन्न अंग बनाया जाए और उसकी सामाजिक तथा आर्थिक प्रतिष्ठा बढ़ाई जाए।
जवाबदेही से जुड़ी समस्याएँ और CAG के निष्कर्ष
भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) द्वारा प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के ऑडिट में बार-बार प्रशासनिक कमियाँ सामने आई हैं।
वित्तीय रिपोर्ट्स में विलंब, अमान्य बैंक खातों का उपयोग और सीमित रोजगार परिणाम गंभीर वित्तीय अनियमितताओं तथा जवाबदेही की कमी को उजागर करते हैं।
अल्पकालिक प्रशिक्षण लेने वाले केवल लगभग 41% अभ्यर्थियों को ही रोजगार मिल सका है जिससे स्पष्ट होता है कि केवल नामांकन संख्या बढ़ाने पर आधारित मॉडल टिकाऊ रोजगार नहीं दे पा रहा है।
गुणवत्ता नियंत्रण, निगरानी और श्रम बाजार की वास्तविक मांग से तालमेल के अभाव में अल्पकालिक प्रशिक्षण कार्यक्रम अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ पाए हैं। वस्तुतः नीतिगत महत्वाकांक्षाओं की तुलना में संस्थागत सुधार और सीखने की प्रक्रिया पीछे रह गई है।
कौशल वित्तपोषण की नई सोच: तीन प्रमुख प्रस्ताव
1. स्किल लोन: छात्रों को निर्णय का अधिकार
कौशल विकास पर खर्च होने वाली सार्वजनिक राशि का बड़ा हिस्सा संस्थानों के परिचालन खर्च की बजाय विद्यार्थियों को कौशल ऋण के रूप में दिया जा सकता है। इससे-
विद्यार्थियों को सूचित चयन का अवसर मिलेगा
प्रशिक्षण संस्थानों में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी
बाज़ार-आधारित अनुशासन से गुणवत्ता सुधरेगी
मांग-आधारित कौशल विकास को बल मिलेगा
2. स्किल वाउचर: निरंतर कौशल उन्नयन की दिशा
स्किल वाउचर प्रणाली में शिक्षार्थियों को सीधे वित्तीय अधिकार दिए जाते हैं। जब धन प्रशिक्षु के साथ चलता है, तो प्रशिक्षण प्रदाता बेहतर परिणाम देने के लिए प्रेरित होते हैं। यह प्रणाली:
आजीवन सीखने की संस्कृति को बढ़ावा देती है
कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल और हरित क्षेत्रों में लक्षित कौशल विकास को प्रोत्साहित करती है
महिलाओं की श्रम भागीदारी बढ़ाने में सहायक होती है
डिग्री-आधारित प्रवृत्ति के बजाय व्यावसायिक विकल्पों को आकर्षक बनाती है
वैश्विक अनुभव दर्शाता है कि वाउचर आधारित मॉडल प्रतिस्पर्धी और मांग-उन्मुख कौशल बाज़ार विकसित करता है।
3. स्किल लेवी: नियोक्ताओं की जिम्मेदारी सुनिश्चित करना
रिइम्बर्सेबल इंडस्ट्री कंट्रीब्यूशन (RIC) मॉडल के तहत कंपनियाँ वेतन-आधारित अंशदान देती हैं और प्रशिक्षण उपलब्ध कराने पर उन्हें प्रतिपूर्ति प्राप्त होती है। यह ढाँचा:
उद्योग की स्वामित्व भावना को मजबूत करता है
राजनीतिक परिवर्तनों से परे स्थिर वित्तपोषण सुनिश्चित करता है
वास्तविक श्रम मांग के अनुरूप कौशल विकास को बढ़ावा देता है
नियोक्ता-भागीदारी से नियोक्ता-स्वामित्व की ओर परिवर्तन निजी क्षेत्र की भूमिका को सुदृढ़ करेगा और सरकारी निर्भरता कम करेगा।
आगे की दिशा: वास्तविक समय श्रम बाजार सूचना प्रणाली
सफल कौशल योजना के लिए अद्यतन और सतत श्रम बाजार डाटा अनिवार्य है। तेजी से बदलती अर्थव्यवस्था में केवल समय-समय पर किए गए कौशल अंतर अध्ययन पर्याप्त नहीं हैं।
एक आधुनिक श्रम बाजार सूचना प्रणाली को-
ऑनलाइन रोजगार मंचों से गुमनाम डेटा एकत्र करना चाहिए
डेटा विश्लेषण और एआई आधारित मॉडलिंग का उपयोग करना चाहिए
समेकित जानकारी को राष्ट्रीय कैरियर सेवा (National Career Service) पोर्टल पर उपलब्ध कराना चाहिए
ऐसी वास्तविक समय सूचना प्रशिक्षण आपूर्ति को बाजार की मांग से जोड़ने, पारदर्शिता बढ़ाने और साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण को सुदृढ़ करने में सहायक होगी।
निष्कर्ष
भारत की जनसांख्यिकीय अवधि सीमित है। इसे आर्थिक शक्ति में बदलने के लिए व्यावसायिक शिक्षा और कौशल विकास में गहन व साहसिक सुधार आवश्यक हैं।
दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता, मजबूत जवाबदेही तंत्र, उद्योग का स्वामित्व और वास्तविक समय श्रम बाजार सूचना इस परिवर्तन के प्रमुख आधार हैं।
यदि ठोस व समयबद्ध कदम उठाए गए, तो भारत अपने जनसांख्यिकीय लाभ को स्थायी आर्थिक सामर्थ्य और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता में परिवर्तित कर सकता है; अन्यथा यह अवसर व्यर्थ हो सकता है।