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भारत के संघवाद की चुनौतियाँ और सहमति निर्माण की आवश्यकता

  • स्वतंत्रता के बाद से भारतीय संघवाद (Federalism) भारत के राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया का एक अत्यंत महत्वपूर्ण साधन रहा है। भारत जैसे विशाल, विविधतापूर्ण और बहुभाषी देश में संघीय व्यवस्था ने राष्ट्रीय एकता बनाए रखते हुए राज्यों को स्वायत्तता प्रदान करने का कार्य किया है। हालांकि, भारतीय संघवाद का विकास कभी भी स्थिर या निर्विवाद नहीं रहा, बल्कि यह निरंतर परिवर्तनशील और बहसों से घिरा हुआ रहा है।
  • हाल ही में पास नहीं हुए संवैधानिक संशोधन विधेयक के संदर्भ में संघवाद पर फिर से तीखी चर्चाएँ देखने को मिलीं, किंतु वास्तव में यह स्थिति नई नहीं है। स्वतंत्रता के बाद से ही संघवाद अनेक विवादों और चुनौतियों के बीच विकसित हुआ है।
  • इन चुनौतियों में विभाजन के बाद संविधान में केंद्रीयकरण की प्रवृत्ति, वित्तीय संघवाद में ऊर्ध्वाधर और क्षैतिज संसाधन वितरण पर बहस, योजना आयोग के केंद्रीकरणकारी प्रभाव, अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग और राज्यों की सरकारों को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लागू करना, राज्यपालों की पक्षपातपूर्ण भूमिका, भाषा विवाद, परिसीमन (Delimitation) और संसद में सीटों के वितरण से जुड़ी समस्याएँ शामिल रही हैं।
  • लेख भारतीय संघवाद के समक्ष उपस्थित दो निकटस्थ (Proximate) चुनौतियों और दो गहरे संरचनात्मक कारणों (Deeper Causes) की पहचान करता है तथा यह तर्क देता है कि इन समस्याओं का समाधान केवल व्यापक परामर्श, समायोजन, समझौते और लोकतांत्रिक संवेदनशीलता से ही संभव है।

I. भारतीय संघवाद की निकटस्थ चुनौतियाँ

1. बढ़ता हुआ लोकतांत्रिक घाटा (Rising Democratic Deficit)

  • लोकतांत्रिक व्यवस्था में समान नागरिकता का अर्थ है कि प्रत्येक नागरिक के मत का समान महत्व होना चाहिए। इसलिए जनसंख्या परिवर्तन के अनुसार समय-समय पर राजनीतिक प्रतिनिधित्व में संशोधन आवश्यक माना जाता है, ताकि प्रत्येक नागरिक की राजनीतिक भागीदारी समान बनी रहे।
  • किन्तु भारत में 1976 तथा पुनः 2002 के संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से संसद में सीटों के वितरण को 1971 की जनगणना के आधार पर स्थिर (Freeze) कर दिया गया और यह व्यवस्था 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक लागू रखी गई।
  • इस निर्णय का उद्देश्य उन राज्यों को दंडित होने से बचाना था जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता प्राप्त की थी, लेकिन समय के साथ इसने राजनीतिक प्रतिनिधित्व में असंतुलन उत्पन्न कर दिया।
  • दक्षिणी राज्यों जैसे आंध्र प्रदेश, केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना ने जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने और प्रजनन दर घटाने में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। इन राज्यों में प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर (Replacement Level) के बराबर या उससे नीचे पहुँच चुकी है।
  • इसके विपरीत हिंदी हृदयस्थल (Hindi Heartland) के राज्यों जैसे बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान तथा मध्य प्रदेश में अपेक्षाकृत अधिक जनसंख्या वृद्धि दर्ज की गई।
  • यदि 2024 के लोकसभा चुनावों में सीटों का निर्धारण वर्तमान जनसंख्या के आधार पर किया जाता, तो दक्षिणी राज्यों को लगभग 23 सीटों का नुकसान होता जबकि उत्तरी राज्यों को 31 अतिरिक्त सीटें प्राप्त होतीं।
  • इस प्रकार राज्यों की जनसंख्या हिस्सेदारी और संसद में सीट हिस्सेदारी के बीच बढ़ता अंतर लोकतांत्रिक घाटे का रूप ले चुका है।
  • क्षेत्रीय दृष्टि से देखा जाए तो दक्षिण भारत की कुल जनसंख्या हिस्सेदारी घट रही है, जबकि हिंदी पट्टी की हिस्सेदारी बढ़ रही है। पश्चिम और उत्तर भारत की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत स्थिर बनी हुई है।

2. बढ़ते वित्तीय हस्तांतरण (Rising Fiscal Transfers)

  • संघीय व्यवस्था में सामान्यतः आर्थिक योगदान और प्रदर्शन के आधार पर संसाधनों का वितरण होना चाहिए। हालांकि व्यवहार में ऐसा पूर्णतः संभव नहीं है, क्योंकि राज्यों के बीच असमानताओं को कम करने और सभी नागरिकों को सार्वजनिक सेवाओं की समान उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए संसाधनों का पुनर्वितरण आवश्यक होता है।
  • समृद्ध राज्यों से अपेक्षाकृत कमजोर राज्यों की ओर वित्तीय हस्तांतरण राष्ट्र-निर्माण का महत्वपूर्ण साधन रहा है। लेकिन यदि यह पुनर्वितरण निरंतर बढ़ता जाए और उसका कोई संतुलन न हो, तो इससे योगदान देने वाले राज्यों में असंतोष उत्पन्न हो सकता है।
  • 1960 के दशक के प्रारंभ में योगदानकर्ताओं और लाभार्थी राज्यों के बीच अंतर अपेक्षाकृत सीमित था। उस समय हिंदी हृदयस्थल के राज्यों को उनकी आर्थिक हिस्सेदारी से लगभग 20 प्रतिशत अधिक संसाधन प्राप्त हो रहे थे, जबकि दक्षिण और पश्चिम के राज्यों को लगभग 20 प्रतिशत कम संसाधन मिल रहे थे।
  • किन्तु आर्थिक असमानता और अत्यधिक पुनर्वितरणकारी नीतियों के कारण यह अंतर समय के साथ काफी बढ़ गया।
  • 2023 तक स्थिति यह हो गई कि हिंदी पट्टी के राज्यों को उनकी आर्थिक हिस्सेदारी की तुलना में लगभग 90 प्रतिशत अधिक वित्त आयोग संसाधन प्राप्त हो रहे थे, जबकि दक्षिण को लगभग 44 प्रतिशत कम और पश्चिम को 58 प्रतिशत कम संसाधन मिल रहे थे।
  • महत्वपूर्ण बात यह है कि सबसे बड़े योगदानकर्ता केवल दक्षिणी राज्य नहीं हैं बल्कि गुजरात, महाराष्ट्र और हरियाणा भी प्रमुख योगदानकर्ता हैं। वहीं ओडिशा तथा पश्चिम बंगाल महत्वपूर्ण लाभार्थी राज्यों में शामिल हैं।
  • इससे यह धारणा मजबूत हुई है कि बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को दंडित किया जा रहा है जबकि कमजोर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को लाभ मिल रहा है।

II. संघवाद की गहरी संरचनात्मक चुनौतियाँ

1. राज्यों का असमान प्रदर्शन (Divergent Performance)

  • संघवाद के समक्ष उपस्थित उपर्युक्त समस्याओं का मूल कारण राज्यों के बीच जनसांख्यिकीय और आर्थिक प्रदर्शन में बढ़ती असमानता है।
  • दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों ने शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तीकरण तथा सामाजिक विकास के माध्यम से जनसंख्या नियंत्रण में सफलता प्राप्त की है। साथ ही इन राज्यों ने आर्थिक विकास और जीवन स्तर में भी उल्लेखनीय प्रगति की है।
  • 1980 के बाद से दक्षिण, पश्चिम और हरियाणा में प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (Per Capita GDP) की वृद्धि दर लगभग उतनी ही तेज रही है जितनी लंबे समय तक चीन में देखी गई।
  • इसके परिणामस्वरूप ये राज्य हिंदी हृदयस्थल और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से आगे निकल गए हैं।
  • यह असमानता संघीय व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती उत्पन्न करती है क्योंकि इसका सीधा संबंध राजनीतिक प्रतिनिधित्व, वित्तीय पुनर्वितरण और संसाधन आवंटन से है।
  • योगदान देने वाले राज्यों में यह धारणा बढ़ रही है कि उनकी जनसांख्यिकीय और आर्थिक सफलता उनके लिए नुकसान का कारण बन रही है, जबकि कम प्रदर्शन करने वाले राज्यों को लाभ मिल रहा है।

2. लोकतांत्रिक संवेदनशीलता का क्षरण (Erosion of Democratic Sensibility)

  • लेख के अनुसार भारतीय संघवाद की सबसे गंभीर चुनौती लोकतांत्रिक संवेदनशीलता में गिरावट है।
  • भारतीय राजनीति में बढ़ती ध्रुवीकरण की प्रवृत्ति के कारण राजनीति अब केवल चुनावी प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं रह गई है बल्कि विरोधियों को पराजित करने के अस्तित्वगत संघर्ष के रूप में देखा जाने लगा है।
  • लेख में विमुद्रीकरण, कृषि कानून, नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019, भारतीय दंड संहिता के स्थान पर भारतीय न्याय संहिता लागू करना, चुनावी संशोधन तथा हालिया संवैधानिक पहलों का उल्लेख किया गया है।
  • आलोचना यह है कि इन निर्णयों में व्यापक परामर्श, समायोजन और समझौते की प्रक्रिया सीमित रही।
  • परिणामस्वरूप सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism), जो राष्ट्र-निर्माण की आधारशिला है, अब विवादात्मक और टकरावपूर्ण संघवाद में परिवर्तित होता दिखाई दे रहा है।
  • इससे जम्मू और कश्मीर, लद्दाख, मणिपुर, दक्षिण भारत और धार्मिक अल्पसंख्यकों के बीच असंतोष बढ़ा है।
  • इस पूरी प्रक्रिया का सबसे बड़ा नुकसान विश्वास (Trust) का क्षरण है—नागरिकों के बीच, राज्य और नागरिकों के बीच, केंद्र और राज्यों के बीच तथा राज्यों के बीच।

III. लोकतांत्रिक संवेदनशीलता का उदाहरण : जीएसटी परिषद

  • लेख एक महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है जो सहकारी संघवाद और लोकतांत्रिक संवेदनशीलता को स्पष्ट करता है।
  • वर्ष 2018 के आसपास जीएसटी परिषद की बैठक में जुए पर कराधान के प्रश्न पर टी. एम. थॉमस आइजैक स्वयं को अल्पमत में पाए और बैठक छोड़ने की इच्छा व्यक्त की।
  • उस समय स्थिति यह थी कि केंद्र और 28 राज्य एक ओर थे जबकि केरल अकेला था।
  • इसके बावजूद तत्कालीन केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बहुमत का प्रयोग करने के बजाय केरल को साथ बनाए रखने का प्रयास किया और उसकी चिंताओं को समायोजित किया।
  • अंततः सर्वसम्मति बनी रही और सहकारी संघवाद की भावना मजबूत हुई।
  • यह उदाहरण दर्शाता है कि लोकतांत्रिक संवेदनशीलता केवल बहुमत नहीं बल्कि परामर्श, धैर्य, समायोजन और सहमति निर्माण पर आधारित होती है।

IV. आगे की राह : सहमति निर्माण ही समाधान

  • भारतीय संघवाद की चुनौतियों के समाधान के लिए कई सुझाव सामने आए हैं, जिनमें नए संघीय समझौते, वित्तीय हस्तांतरण व्यवस्था में सुधार, मतदान सिद्धांतों में बदलाव तथा नए संस्थागत ढाँचों की स्थापना शामिल है।
  • किन्तु लेख का तर्क है कि केवल संस्थागत सुधार पर्याप्त नहीं होंगे।
  • केंद्र सरकार, जिसके पास अधिक शक्ति और संसाधन हैं, को राज्यों के साथ व्यापक परामर्श और संवाद की प्रक्रिया अपनानी होगी।
  • क्षेत्रीय चिंताओं को समायोजित करना आवश्यक होगा ताकि जनसांख्यिकीय और आर्थिक अंतर राजनीतिक संघर्ष में परिवर्तित न हों।
  • समझौता, आत्मसंयम और विश्वास निर्माण को शासन की प्राथमिकता बनाना होगा।

निष्कर्ष

  • भारतीय संघवाद की चुनौतियाँ केवल जनसंख्या परिवर्तन और वित्तीय असंतुलन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे राज्यों के असमान विकास और लोकतांत्रिक संवेदनशीलता के क्षरण से भी जुड़ी हुई हैं।
  • संघीय व्यवस्था में अधिक शक्तिशाली पक्ष होने के कारण केंद्र सरकार पर सहकारी संघवाद को मजबूत करने की विशेष जिम्मेदारी है।
  • व्यापक परामर्श, समायोजन, समझौता और विश्वास निर्माण के माध्यम से ही भारत अपने संघीय ढाँचे को मजबूत बना सकता है।
  • अंततः लोकतांत्रिक संवेदनशीलता ही उस सीमा को निर्धारित करती है जहाँ शक्ति प्रभुत्व में परिवर्तित होने से रुक जाती है।
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