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चीन-पाकिस्तान अंतरिक्ष सहयोग और भारत के सुरक्षा निहितार्थ

संदर्भ 

  • पिछले पांच दशकों में चीन ने शून्य से शिखर तक का सफर तय करते हुए खुद को एक वैश्विक अंतरिक्ष महाशक्ति के रूप में स्थापित किया है। 1970 में अपने पहले उपग्रह के प्रक्षेपण से शुरू हुआ यह सफर आज तियांगोंग अंतरिक्ष स्टेशन के संचालन और 2030 तक मानवयुक्त चंद्र मिशन की महत्वाकांक्षी योजनाओं तक पहुँच गया है। चीन की इस सफलता का एक बड़ा हिस्सा उसके स्पेस सिल्क रोड (Space Silk Road) विजन से जुड़ा है, जिसका सबसे प्रमुख लाभार्थी उसका सदाबहार दोस्त पाकिस्तान उभर कर सामने आया है। 

अंतरिक्ष सहयोग: 1990 से 2026 तक का सफर 

  • चीन और पाकिस्तान के बीच अंतरिक्ष कूटनीति की नींव 1990 में बदर-I उपग्रह के प्रक्षेपण के साथ पड़ी थी। हालांकि शुरुआती दौर में इसकी गति धीमी रही, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इस साझेदारी ने अभूतपूर्व रफ़्तार पकड़ी है। 
  • अप्रैल 2026 तक के घटनाक्रम बताते हैं कि पाकिस्तान अब अपनी अंतरिक्ष जरूरतों के लिए पूरी तरह से बीजिंग पर निर्भर है। 

1. मानवयुक्त मिशन और तियांगोंग स्टेशन

  • चीन ने पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों को एक नए स्तर पर ले जाते हुए घोषणा की है कि वह एक पाकिस्तानी अंतरिक्ष यात्री को अपने तियांगोंग अंतरिक्ष स्टेशन पर भेजेगा। मोहम्मद जीशान अली और खुर्रम दाउद को इस ऐतिहासिक मिशन के लिए चुना गया है। दोनों उम्मीदवारों को चीन में प्रशिक्षण दिया जाएगा, जिनमें से एक पेलोड विशेषज्ञ के रूप में अंतरिक्ष की यात्रा करेगा। 
  • यह कदम 2025 में चीन मानव अंतरिक्ष इंजीनियरिंग कार्यालय (सीएमएसईओ) और पाकिस्तान अंतरिक्ष और ऊपरी वायुमंडल अनुसंधान आयोग (एसयूपीएआरसीओ) के बीच हुए समझौते का परिणाम है, जो पाकिस्तान को अंतरिक्ष इंजीनियरिंग की सूक्ष्म तकनीकें सीखने में मदद करेगा। 

2. चंद्र अन्वेषण: ICUBE-Q की सफलता 

  • 2024 में चीन के चांग ई 6 मिशन के साथ पाकिस्तान का ICUBE-Q क्यूबसैट चंद्रमा की कक्षा में पहुँचा। वस्तुतः शंघाई जियाओ टोंग विश्वविद्यालय और पाकिस्तान के इंस्टीट्यूट ऑफ स्पेस टेक्नोलॉजी के सहयोग से बने इस उपग्रह ने चंद्रमा के दूरस्थ हिस्से (Far Side) की तस्वीरें भेजकर पाकिस्तान के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान के नए द्वार खोले। 

चीन-पाकिस्तान उपग्रह सहयोग: निगरानी और संचार का बढ़ता नेटवर्क

  • बीते दो दशकों के आंकड़े गवाह हैं कि चीन, पाकिस्तान के अंतरिक्ष सपनों का एकमात्र और सबसे बड़ा सारथी बनकर उभरा है। इस निरंतर सहयोग ने इस्लामाबाद को न केवल उन्नत संचार क्षमताएं प्रदान की हैं, बल्कि उसे जासूसी और रिमोट सेंसिंग उपग्रहों का एक ऐसा सुदृढ़ जाल बुनने में मदद की है, जो सामरिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है।  

हालिया मिशन और तकनीकी प्रगति 

  • अंतरिक्ष कूटनीति की इस कड़ी में अप्रैल 2026 का मिशन मील का पत्थर साबित हुआ, जब चीन के ताइयुआन प्रक्षेपण केंद्र से पाकिस्तान के स्वदेशी विद्युत-प्रकाशिक (Electro-Optical) उपग्रह, EO-3 को सफलतापूर्वक कक्षा में स्थापित किया गया। इससे पहले वर्ष 2025 पाकिस्तान के लिए उपलब्धियों भरा रहा, जिसमें चीन ने तीन महत्वपूर्ण उपग्रहों का प्रक्षेपण किया: 
    • PRSC-EO1 (जनवरी 2025)
    • PRSS-1 (जुलाई 2025 - रिमोट सेंसिंग)
    • PRSS-2 (अक्टूबर 2025 - रिमोट सेंसिंग)  

संचार और कनेक्टिविटी की मजबूती  

  • पाकिस्तान की दूरसंचार और डेटा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए चीन ने 2024 में PakSat MM1 लॉन्च किया। 
  • यह 2011 में लॉन्च किए गए PAKSAT-IR (30 ट्रांसपोंडर युक्त) के बाद दूसरा बड़ा संचार उपग्रह था। इन दोनों ही भारी-भरकम उपग्रहों को चीन के विश्वसनीय लॉन्ग मार्च 3B वाहक रॉकेट के जरिए अंतरिक्ष भेजा गया। 

निगरानी और सामरिक क्षमता 

  • सहयोग की यह जड़ें 2018 के उन प्रक्षेपणों में भी दिखती हैं, जब लॉन्ग मार्च 2C रॉकेट ने PRSS-1 (चीन निर्मित) और PakTES-1A (पाकिस्तान निर्मित) को जियुकुआन केंद्र से अंतरिक्ष की कक्षा में पहुँचाया। 

नौवहन सहयोग 

  • चीन की स्वदेशी नेविगेशन प्रणाली बेईडू (BDS) आज अमेरिकी जीपीएस (GPS) के एक सशक्त और सटीक विकल्प के रूप में उभरी है। 2014 में पाकिस्तान इस प्रणाली को अपनाने वाला विश्व का पहला विदेशी देश बना। इसकी सटीकता का स्तर असाधारण है-यह 2 सेंटीमीटर तक की सटीक जानकारी देती है, जिसे इमेज प्रोसेसिंग के माध्यम से 5 मिलीमीटर तक सूक्ष्म किया जा सकता है। 

सहयोग के मुख्य बिंदु:

  • बहुआयामी उपयोग : यह तकनीक आपदा प्रबंधन, शहरी नियोजन और यातायात मार्गदर्शन जैसे नागरिक कार्यों के साथ-साथ रक्षा क्षेत्र के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
  • सैन्य एकीकरण : रक्षा सहयोग के तहत पाकिस्तानी सेना अब बेईडू प्रणाली का उपयोग करने के लिए तकनीकी रूप से पूरी तरह सक्षम है। 
  • बुनियादी ढांचा : वर्ष 2020 में चीन ने पाकिस्तान में एक सतत परिचालन रडार स्टेशन (CORS) नेटवर्क स्थापित करने की पहल की, जिससे इस क्षेत्र में बेईडू की कार्यक्षमता और निगरानी शक्ति को और अधिक मजबूती मिली है।  

भारत की सुरक्षा के निहितार्थ  

  • चीन–पाकिस्तान अंतरिक्ष सहयोग का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका द्वि-उपयोग (dual-use) स्वरूप है। जिन उपग्रहों को नागरिक उद्देश्यों- जैसे मौसम पूर्वानुमान, आपदा प्रबंधन और संचार के लिए विकसित किया जाता है, वही तकनीक सैन्य निगरानी और खुफिया गतिविधियों में भी इस्तेमाल की जा सकती है। 
  • रिमोट सेंसिंग उपग्रहों और उच्च-रिज़ॉल्यूशन इमेजिंग तकनीकों के माध्यम से पाकिस्तान अब सीमा क्षेत्रों की अधिक सटीक निगरानी कर सकता है। यह भारत के लिए विशेष रूप से संवेदनशील है, क्योंकि इससे सामरिक ठिकानों, सैन्य गतिविधियों और बुनियादी ढांचे की निगरानी संभव हो जाती है। 
  • बेईडू नेविगेशन प्रणाली का पाकिस्तान द्वारा उपयोग भी एक महत्वपूर्ण चिंता का विषय है। यह प्रणाली न केवल सटीक लोकेशन डेटा प्रदान करती है, बल्कि सैन्य अभियानों में बेहतर समन्वय और मिसाइल मार्गदर्शन में भी सहायक हो सकती है। इस प्रकार, चीन का तकनीकी समर्थन पाकिस्तान की सैन्य क्षमताओं को अप्रत्यक्ष रूप से मजबूत करता है। 

दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन 

  • चीन और पाकिस्तान के बीच यह सहयोग दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है। जहां भारत अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम के माध्यम से आत्मनिर्भरता और वैश्विक साझेदारी को बढ़ावा दे रहा है, वहीं चीन–पाकिस्तान गठजोड़ क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा को और तीव्र बना सकता है। 
  • चीन के लिए यह सहयोग केवल तकनीकी या आर्थिक नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक भी है। पाकिस्तान के माध्यम से चीन को दक्षिण एशिया में रणनीतिक पहुंच मिलती है, जिससे वह क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों को प्रभावित कर सकता है। साथ ही, बेईडू प्रणाली के विस्तार से चीन क्षेत्रीय नेविगेशन डेटा पर भी प्रभाव स्थापित कर रहा है। 

निष्कर्ष 

  • यह साझेदारी स्पष्ट करती है कि पाकिस्तान अब केवल चीनी हथियारों का खरीदार नहीं, बल्कि उसके अंतरिक्ष नेटवर्क का एक सक्रिय हिस्सा है। जहाँ पाकिस्तान को इससे आधुनिक संचार और मारक क्षमता मिल रही है, वहीं बीजिंग को भारत के पड़ोस में एक स्थायी सैन्य और तकनीकी आधार मिल गया है।
  • भारत के लिए यह समय अपनी मिशन शक्ति (ASAT) और NavIC जैसी प्रणालियों को और अधिक उन्नत करने तथा वैश्विक अंतरिक्ष कूटनीति में अपनी स्थिति मजबूत करने का है, ताकि इस स्पेस सिल्क रोड से उत्पन्न होने वाले खतरों को संतुलित किया जा सके। 
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