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जलवायु-अनुकूल कृषि (CRA): भारत की खाद्य सुरक्षा और भविष्य की रणनीति

संदर्भ 

  • जलवायु परिवर्तन आज एक कठोर वास्तविकता है। भारत के लिए अपनी विशाल जनसंख्या की खाद्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कृषि को मौसम की अनिश्चितता, गिरते मृदा स्वास्थ्य और वायु प्रदूषण जैसी चुनौतियों के अनुरूप ढालना और जलवायु अनुकूल कृषि को अपनाना अनिवार्य हो गया है। 

जलवायु-अनुकूल कृषि (Climate-Resilient Agriculture) के बारे में  

जलवायु-अनुकूल कृषि क्या है ? 

  • जलवायु-अनुकूल कृषि (CRA) एक ऐसा आधुनिक दृष्टिकोण है जो जैव प्रौद्योगिकी (Biotechnology) और डिजिटल उपकरणों के समन्वय से खेती को लचीला बनाता है। 
  • इसमें जैव उर्वरक, जैव कीटनाशक और मृदा-सूक्ष्मजीव विश्लेषण जैसी पद्धतियों का उपयोग कर रासायनिक निर्भरता कम की जाती है। 
  • इसके अंतर्गत फसलों को सूखा, गर्मी, लवणता और कीटों के प्रति सहनशील बनाने के लिए उन्नत बीज विकसित किए जाते हैं। 
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) स्थानीय पर्यावरणीय कारकों का विश्लेषण कर सटीक कृषि रणनीतियाँ तैयार करने में मदद करती है। 

भारत को जलवायु-अनुकूल कृषि की आवश्यकता क्यों? 

  • भारत एक कृषि प्रधान देश है, जिसकी जनसंख्या लगातार बढ़ रही है। इससे उच्च और भरोसेमंद कृषि उत्पादकता की आवश्यकता पर दबाव बढ़ रहा है। 
  • देश की कुल बोए गई कृषि भूमि का लगभग 51% हिस्सा वर्षा-निर्भर है, जो देश के लगभग 40% खाद्य उत्पादन के लिए जिम्मेदार है। इसका मतलब है कि यह क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। 
  • पारंपरिक कृषि पद्धतियां अकेले बढ़ते जलवायु दबाव का सामना नहीं कर सकतीं। उदाहरण के लिए, हाल की मॉडलिंग के अनुसार, सदी के अंत तक चावल जैसी मुख्य फसलों की पैदावार 3-22% तक घट सकती है और सबसे खराब परिस्थितियों में यह 30% से अधिक भी गिर सकती है। 
  • इन चुनौतियों के संदर्भ में जलवायु अनुकूल कृषि (Climate-Resilient Agriculture) एक महत्वपूर्ण समाधान है। वस्तुतः यह तकनीकों का एक समूह प्रदान करती है जो पर्यावरणीय स्वास्थ्य की रक्षा करते हुए उत्पादकता बढ़ाने में सक्षम हैं। 

वर्तमान स्थिति: भारत के प्रयास और उपलब्धियां 

  • जलवायु अनुकूल कृषि में राष्ट्रीय नवाचार परियोजना (2011) : भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) द्वारा शुरू की गई इस परियोजना के तहत 448 गाँवों में धान की सीधी बुवाई, शून्य जुताई (Zero Tillage) और प्रतिकूल मौसम सहन करने वाली किस्मों का सफल प्रदर्शन किया गया।  
  • बायोई3 (BioE3) नीति : हाल ही में आई इस नीति ने जैव प्रौद्योगिकी आधारित समाधानों को प्राथमिकता दी है। 
  • निजी क्षेत्र की भागीदारी : बायोस्टैड, आईएफएफसीओ, जीएसएफसी, एनएफएल और आईपीएल बायोलॉजिकल्स जैसी कम्पनियाँ जैव-समाधान प्रदान कर रही हैं। साथ ही, एग्रीटेक स्टार्टअप्स एआई (AI) आधारित फसल निगरानी और सटीक सिंचाई उपकरणों के माध्यम से डिजिटल कृषि को बढ़ावा दे रहे हैं।  

वैश्विक परिदृश्य: अन्य देशों की पहल 

  • अमेरिका : अमेरिका जलवायु-अनुकूल कृषि को बढ़ावा देने के लिए व्यापक कदम उठा रहा है। इसके तहत, कृषि विभाग (यूएसडीए) की जलवायु-स्मार्ट कृषि और वानिकी (सीएसएएफ) पहल के माध्यम से अरबों डॉलर का निवेश किया जा रहा है। साथ ही, इन कृषि पद्धतियों को संघीय नीतियों में शामिल कर उन्हें संस्थागत रूप दिया गया है। 
  • यूरोपीय संघ : फार्म टू फोर्क रणनीति के तहत रसायनों के उपयोग को न्यूनतम करने पर जोर दिया जा रहा है।  
  • चीन व ब्राजील : चीन डिजिटल सिंचाई और सहिष्णु बीजों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, जबकि ब्राजील उष्णकटिबंधीय जलवायु-लचीली फसलों के अनुसंधान में अग्रणी है। 

भारत के समक्ष चुनौतियाँ 

  • सीमित पहुंच : छोटे और सीमांत किसानों में जागरूकता और धन की कमी के कारण इन तकनीकों का उपयोग कम है।
  • गुणवत्ता में असमानता : जैव-उत्पादों की गुणवत्ता में भिन्नता किसानों के भरोसे को प्रभावित करती है। 
  • डिजिटल विभाजन : ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल साक्षरता की कमी एआई और सटीक कृषि उपकरणों के विस्तार में बाधक है। 

आगे की राह 

भारत को एक सुसंगत राष्ट्रीय जलवायु अनुकूलन योजना की आवश्यकता है, जिसमें निम्नलिखित बिंदु शामिल हों : 

  • त्वरित विकास : जीनोम-संशोधित फसलों के अनुसंधान और वितरण में तेजी लाना।
  • मानकीकरण : जैव उर्वरकों और कीटनाशकों के लिए कड़े गुणवत्ता मानक और सुदृढ़ आपूर्ति श्रृंखला बनाना।
  • वित्तीय सहायता : छोटे किसानों को तकनीक अपनाने के लिए प्रोत्साहन, जलवायु बीमा और आसान ऋण उपलब्ध कराना।
  • नीतिगत समन्वय : बायोई3 ढाँचे के तहत जैव प्रौद्योगिकी और कृषि नीतियों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना। 

यद्यपि वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए जलवायु अनुकूल कृषि (Climate-Resilient Agriculture) अब केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि भारत के लिए एक अनिवार्य रक्षा तंत्र है। यह पर्यावरण की रक्षा के साथ-साथ करोड़ों किसानों की आजीविका और देश के भविष्य को सुरक्षित करने का एकमात्र मार्ग है।

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