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भारत में हिरासत में मृत्यु (Custodial Death in india)

संदर्भ 

  • वर्ष 2020 के चर्चित सत्तंकुलम हिरासत मृत्यु मामले में तमिलनाडु की एक अधीनस्थ अदालत ने ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए व्यापारी पी. जयराज और उनके पुत्र जे. बेनिक्स की हत्या के दोषी नौ पुलिसकर्मियों को मृत्युदंड से दंडित किया है। वस्तुतः यह फैसला विधि के शासन को सुदृढ़ करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। 

हिरासत में मृत्यु (Custodial Death) की अवधारणा और संवैधानिक परिप्रेक्ष्य 

  • हिरासत में मृत्यु (Custodial Death) उस अमानवीय स्थिति को दर्शाती है, जब राज्य के संरक्षण (पुलिस या न्यायिक अभिरक्षा) में किसी व्यक्ति की जान चली जाती है। यह प्रायः व्यवस्थित यातना, शारीरिक उत्पीड़न, मानसिक प्रताड़ना या जानबूझकर की गई चिकित्सीय उपेक्षा का परिणाम होती है। 
  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार प्रदान करता है। जब कानून के रक्षक ही हिंसा का सहारा लेते हैं, तो यह न केवल इस अधिकार का हनन है बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवीय गरिमा पर भी प्रहार है। 

सांख्यिकीय विश्लेषण और वर्तमान रुझान 

  • प्रणालीगत व्यापकता : आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत में हिरासत में मौत के 170 मामले दर्ज किए गए, जो न्यायिक सक्रियता के बावजूद इस समस्या की निरंतरता को दर्शाते हैं। 
  • दीर्घकालिक प्रवृत्ति : वर्ष 2021 से 2026 के मध्य प्रतिवर्ष औसतन 140 से 176 मौतें दर्ज की गईं, जो इसकी गहरी जड़ों की ओर संकेत करती हैं।  
  • राज्यवार स्थिति : वर्ष 2025-26 में बिहार (19 मामले) और राजस्थान (18 मामले) इस सूची में शीर्ष पर रहे। 
  • जवाबदेही का अभाव : राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के 2026 के आंकड़ों के अनुसार, विगत पांच वर्षों में केवल एक मामले में ठोस अनुशासनात्मक कार्रवाई संभव हो सकी, जो दण्डमुक्ति (Impunity) की संस्कृति को उजागर करता है।  

हिरासत में हिंसा के मूल कारण 

  • औपनिवेशिक पुलिसिंग संरचना : भारतीय पुलिस अधिनियम, 1861 का आधारभूत ढांचा जनता की सेवा के बजाय औपनिवेशिक नियंत्रण के लिए तैयार किया गया था, जिसका दमनकारी प्रभाव आज भी विद्यमान है। 
  • पूछताछ की दोषपूर्ण विधियाँ : वैज्ञानिक जांच कौशल की कमी के कारण पुलिस त्वरित स्वीकारोक्ति (Confession) प्राप्त करने हेतु थर्ड डिग्री जैसे हिंसक साधनों पर निर्भर रहती है। 
  • कानूनी शून्यता: भारत ने अभी तक यातना के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCAT) का अनुसमर्थन नहीं किया है, और न ही हमारे पास यातना को एक स्वतंत्र अपराध के रूप में परिभाषित करने वाला कोई विशिष्ट कानून है। 
  • संवेदनशीलता का अभाव : पुलिस प्रशिक्षण में मानवाधिकारों और मनोवैज्ञानिक व्यवहार पर पर्याप्त बल नहीं दिया जाता।
  • संस्थागत संरक्षण : दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 197 के तहत सरकारी अधिकारियों के विरुद्ध अभियोजन के लिए पूर्व अनुमति की अनिवार्यता अक्सर दोषियों के लिए सुरक्षा कवच बन जाती है। 

महत्वपूर्ण न्यायिक हस्तक्षेप 

न्यायपालिका ने समय-समय पर पुलिस निरंकुशता को रोकने के लिए कई ऐतिहासिक दिशानिर्देश जारी किए हैं :

  • डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य : गिरफ्तारी और हिरासत के दौरान अपनाए जाने वाले 11 अनिवार्य नियम निर्धारित किए।
  • प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ : पुलिस सुधारों के लिए पुलिस शिकायत प्राधिकरण (PCA) के गठन का निर्देश। 
  • परमवीर सिंह सैनी बनाम बलजीत सिंह : पारदर्शिता सुनिश्चित करने हेतु सभी थानों में अनिवार्य सीसीटीवी निगरानी का आदेश।  
  • सत्तंकुलम निर्णय (2026) : इस मामले में अदालत ने हिरासत में यातना को दुर्लभतम से दुर्लभ (Rarest of Rare) अपराध की श्रेणी में रखते हुए मृत्युदंड दिया, ताकि समाज में एक कड़ा संदेश जाए। 

विद्यमान बाधाएं और चुनौतियाँ 

  • तकनीकी विफलता : अनिवार्य होने के बावजूद, कई थानों में सीसीटीवी कैमरे या तो खराब रहते हैं या घटना के समय जानबूझकर बंद कर दिए जाते हैं। 
  • विलंबित न्याय : लंबी कानूनी प्रक्रिया के कारण साक्ष्य नष्ट हो जाते हैं और गवाहों पर दबाव बढ़ने से न्याय की संभावना कम हो जाती है। 
  • हाशियाकृत समूहों की सुभेद्यता : आंकड़ों से स्पष्ट है कि हिरासत में हिंसा का शिकार होने वालों में अधिकांश लोग दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक समुदायों से होते हैं। 
  • जेलों की कुव्यवस्था : जेलों में क्षमता से अधिक कैदी (लगभग 77% विचाराधीन) होने से आपसी हिंसा और अस्वस्थता बढ़ती है। 

सुधारात्मक कार्ययोजना (Way Forward) 

  • एंटी-टॉर्चर कानून : यूएनसीएटी (UNCAT) के अनुसमर्थन के साथ एक सशक्त राष्ट्रीय कानून का निर्माण अपरिहार्य है।
  • जांच का आधुनिकीकरण : पूछताछ के पारंपरिक तरीकों के स्थान पर साक्ष्य-आधारित और फोरेंसिक जांच को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। 
  • स्वतंत्र जांच एजेंसियां: हिरासत में हुई मौतों की जांच पुलिस के बजाय किसी पूर्णतः स्वतंत्र निकाय (जैसे मजिस्ट्रेट या सीबीआई) द्वारा की जानी चाहिए। 
  • डिजिटल जवाबदेही : सीसीटीवी के काम न करने की स्थिति में संबंधित थाना प्रभारी पर कठोर प्रशासनिक कार्रवाई होनी चाहिए। 
  • मानवीय प्रशिक्षण : पुलिस बल के प्रशिक्षण मॉड्यूल में मानवाधिकार संवेदनशीलता और तनाव प्रबंधन को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाना चाहिए।  

निष्कर्ष 

  • सत्तंकुलम मामले में आया निर्णय दण्डमुक्ति की सदियों पुरानी संस्कृति को समाप्त करने की दिशा में एक मील का पत्थर है। यह स्पष्ट करता है कि राज्य की शक्ति का उपयोग नागरिकों के दमन के लिए नहीं किया जा सकता। 
  • यद्यपि कठोर दंड आवश्यक है, किंतु वास्तविक समाधान केवल संस्थागत और संरचनात्मक सुधारों में ही निहित है। पुलिस व्यवस्था को नियंत्रण की औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त कर नागरिक सेवा की मानवाधिकार-आधारित प्रणाली में बदलना ही न्याय की सच्ची जीत होगी।
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