भारत की न्यायपालिका में देरी: कोर्ट मैनेजरों की आवश्यकता
परिचय
भारत की न्यायिक प्रणाली के सामने न्यायिक विलंब (Judicial Delays) सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक बन चुका है क्योंकि न्याय में देरी केवल वादकारियों (litigants) को व्यक्तिगत स्तर पर प्रभावित नहीं करती, बल्कि इसके व्यापक आर्थिक और सामाजिक प्रभाव भी पूरे समाज पर पड़ते हैं।
न्यायालयों में देरी के कारण वित्तीय संसाधन लंबे समय तक अवरुद्ध रहते हैं, व्यापार करने की लागत बढ़ती है, घरेलू एवं विदेशी निवेश हतोत्साहित होते हैं तथा सार्वजनिक संस्थानों और सरकारी संसाधनों पर निरंतर दबाव पड़ता है। विभिन्न अनुमानों के अनुसार न्यायिक विलंब का आर्थिक प्रभाव भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 1.5–2 प्रतिशत तक हो सकता है।
भारत की न्यायिक प्रणाली में 5 करोड़ से अधिक लंबित मामलों के साथ इस समस्या का स्वरूप अत्यंत गंभीर हो चुका है और समय के साथ यह और अधिक बढ़ता जा रहा है।
इस स्थिति ने संरचनात्मक सुधारों पर पुनः चर्चा को प्रोत्साहित किया है, विशेष रूप से कोर्ट मैनेजरों की नियुक्ति के माध्यम से न्यायालय प्रशासन को पेशेवर बनाने की आवश्यकता पर।
भारत में न्यायिक विलंब: एक बढ़ती चुनौती
भारतीय न्यायालयों में देरी कई परस्पर संबंधित कारकों के संयुक्त प्रभाव का परिणाम है, जो इस बात को प्रभावित करते हैं कि मामले न्यायिक प्रणाली में कैसे प्रवेश करते हैं, न्यायालयों के भीतर उनकी प्रक्रिया कैसे संचालित होती है तथा न्यायपालिका से जुड़े संस्थान किस प्रकार कार्य करते हैं। अनेक अध्ययनों ने लंबित मामलों और धीमी निस्तारण दरों के पीछे कई कारणों की पहचान की है।
प्रमुख कारणों में कमजोर या अस्पष्ट कानून निर्माण, न्यायाधीशों और सहायक कर्मचारियों की कमी, अपर्याप्त आधारभूत संरचना, न्यायालयी प्रक्रियाओं की अक्षमता, मुकदमों की बढ़ती संख्या तथा न्यायाधीशों पर प्रशासनिक दायित्वों का भार शामिल है।
इन सभी कारणों में एक महत्वपूर्ण लेकिन अक्सर उपेक्षित समस्या न्यायालयों में पेशेवर प्रशासनिक सहायता का अभाव है। आज न्यायालय केवल विवाद समाधान की संस्थाएँ नहीं रह गए हैं, बल्कि वे बड़े और जटिल संगठन बन चुके हैं, जिन्हें प्रभावी प्रबंधन व्यवस्था की आवश्यकता होती है। इसके बावजूद प्रशासनिक जिम्मेदारियों का बड़ा हिस्सा अभी भी न्यायाधीशों के पास ही बना हुआ है।
प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ न्यायिक दक्षता को कम करती हैं
भारत में न्यायाधीश केवल न्यायिक कार्य ही नहीं करते, बल्कि अनेक प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ भी निभाते हैं, जो उनके समय और ऊर्जा का बड़ा हिस्सा ले लेती हैं। मामलों की सुनवाई और निर्णय देने के अतिरिक्त उन्हें केस प्रबंधन, न्यायालय कर्मचारियों की निगरानी, आधारभूत संरचना की देखरेख, प्रशासनिक समन्वय तथा संस्थागत प्रदर्शन की समीक्षा जैसे कार्य भी करने पड़ते हैं।
इन दायित्वों में केस फ्लो प्रबंधन प्रणाली, मानव संसाधन प्रशासन, अवसंरचना रखरखाव, कर्मचारियों की निगरानी, प्रदर्शन मूल्यांकन प्रणाली तथा बाहरी एजेंसियों और राज्य सरकारों के साथ समन्वय शामिल हैं।
जब न्यायाधीश इन गैर-न्यायिक कार्यों में अधिक समय देते हैं, तो मामलों के निस्तारण के लिए उपलब्ध समय कम हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप मामलों का निपटान धीमा होता है और लंबित मामलों की संख्या बढ़ती जाती है। इसलिए पेशेवर प्रशासनिक सहायता न्यायाधीशों को न्याय प्रदान करने की उनकी मूल भूमिका पर केंद्रित रहने में सहायता कर सकती है तथा संस्थागत दक्षता में सुधार ला सकती है।
कोर्ट मैनेजर पहल की उत्पत्ति
कोर्ट मैनेजर नियुक्त करने की अवधारणा को औपचारिक रूप से 13वें वित्त आयोग (2010–2015) के दौरान प्रस्तुत किया गया था। आयोग ने यह माना कि न्यायाधीश प्रशासनिक कार्यों से अत्यधिक बोझिल हो रहे हैं, इसलिए जिला न्यायालयों और उच्च न्यायालयों में पेशेवर रूप से प्रशिक्षित कोर्ट मैनेजरों का एक समर्पित ढाँचा बनाया जाना चाहिए।
आयोग ने एमबीए (MBA) जैसी प्रबंधन योग्यता रखने वाले व्यक्तियों की नियुक्ति की सिफारिश की, जो न्यायालयों के प्रशासनिक कार्यों में सहयोग कर सकें। इस पहल के कार्यान्वयन हेतु आयोग ने पाँच वर्षों के लिए ₹300 करोड़ की एकमुश्त सहायता राशि भी प्रदान की।
इस प्रस्ताव का मूल उद्देश्य स्पष्ट था—न्यायाधीश मामलों के निर्णय पर ध्यान दें, जबकि प्रशासनिक कार्य कोर्ट मैनेजर संभालें।
कोर्ट मैनेजरों से अपेक्षा की गई थी कि वे केस फ्लो प्रबंधन, मानव संसाधन प्रशासन, अवसंरचना पर्यवेक्षण, संस्थागत योजना, प्रदर्शन निगरानी तथा दक्षता सुधार संबंधी कार्यों का दायित्व संभालेंगे।
कोर्ट मैनेजर योजना का कमजोर क्रियान्वयन
स्पष्ट दृष्टिकोण होने के बावजूद इस पहल का कार्यान्वयन सीमित और असमान रहा। पाँच वर्षीय अनुदान अवधि के दौरान आवंटित राशि का केवल एक छोटा हिस्सा ही उपयोग किया गया, जबकि कुछ रिपोर्टों के अनुसार इसका उपयोग स्तर मात्र 13 प्रतिशत तक सीमित रहा।
केवल कुछ राज्यों—हरियाणा, तमिलनाडु, पंजाब और राजस्थान—ने कोर्ट मैनेजर नियुक्त किए, और ये नियुक्तियाँ भी अधिकांशतः संविदात्मक या अस्थायी थीं।
मार्च 2015 तक, जब वित्त आयोग की अवधि समाप्त हुई, तब पूरे देश में केवल लगभग 128 कोर्ट मैनेजर पद ही भरे जा सके थे, जो इस योजना के सीमित कार्यान्वयन को दर्शाता है।
केंद्रीय वित्तीय सहायता समाप्त होने के बाद स्थिति और खराब हो गई क्योंकि वित्तीय दायित्व राज्य सरकारों और उच्च न्यायालयों पर स्थानांतरित हो गया। अनेक राज्यों में समर्पित संसाधनों के अभाव के कारण कोर्ट मैनेजर पद समाप्त ही कर दिए गए।
सुधार की विफलता के कारण
कोर्ट मैनेजर पहल की विफलता का कारण केवल वित्तीय संसाधनों की कमी नहीं थी, बल्कि कई संरचनात्मक और संस्थागत समस्याएँ भी इसके लिए उत्तरदायी थीं।
पहला, इस योजना को न्यायिक प्रणाली में स्थायी प्रशासनिक संवर्ग (cadre) के रूप में संस्थागत रूप नहीं दिया गया, जिसके कारण यह अस्थायी वित्तीय सहायता पर निर्भर रही और केंद्रीय सहायता समाप्त होने के बाद कमजोर पड़ गई।
दूसरा, संस्थागत प्रतिरोध देखने को मिला क्योंकि कई न्यायाधीश प्रशासनिक कार्यों को न्यायिक कार्यप्रणाली का अभिन्न हिस्सा मानते थे और उन्हें बाहरी पेशेवरों को सौंपने के प्रति संकोच करते थे। न्यायालय कर्मियों द्वारा भी कोर्ट मैनेजरों को बाहरी व्यक्ति माना गया, जिससे उनकी स्वीकृति और प्रभावशीलता सीमित रही।
तीसरा, इस पहल में भूमिका निर्धारण स्पष्ट नहीं था क्योंकि कोर्ट मैनेजरों की जिम्मेदारियाँ, अधिकार संरचना और प्रदर्शन मूल्यांकन प्रणाली पर्याप्त रूप से मानकीकृत नहीं की गई थीं।
अंततः पेशेवर योग्यता और संस्थागत आवश्यकताओं के बीच असंगति भी रही क्योंकि कई नियुक्त व्यक्तियों के पास सामान्य प्रबंधन विशेषज्ञता तो थी, लेकिन न्यायिक प्रक्रियाओं और न्यायालय व्यवस्था की पर्याप्त समझ नहीं थी। परिणामस्वरूप वे न्यायिक प्रशासन को प्रभावी रूप से सहयोग देने में सक्षम नहीं हो सके।
इन सभी कमियों ने इस सुधार को एक स्थायी संस्थागत ढाँचे के रूप में विकसित होने से रोक दिया।
सर्वोच्च न्यायालय का पुनः हस्तक्षेप
Supreme Court of India ने एक बार फिर कोर्ट मैनेजरों और न्यायिक प्रशासन सुधार के मुद्दे को पुनर्जीवित किया है। न्यायालय ने अगस्त 2018 में कोर्ट मैनेजरों की नियुक्ति और कार्यप्रणाली को लेकर निर्देश जारी किए थे, लेकिन राज्यों में उनका पर्याप्त पालन नहीं हुआ।
मई 2025 में सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्व निर्देशों के अनुपालन न होने पर चिंता व्यक्त की और सभी उच्च न्यायालयों को तीन महीनों के भीतर कोर्ट मैनेजरों से संबंधित सेवा नियम बनाने अथवा संशोधित करने का निर्देश दिया। साथ ही राज्य सरकारों को अगले तीन महीनों के भीतर इन नियमों को स्वीकृति देने के लिए कहा गया।
यह हस्तक्षेप न्यायालय प्रशासन को पेशेवर बनाने और संस्थागत सुधारों के माध्यम से न्यायिक दक्षता बढ़ाने के नए प्रयासों को दर्शाता है।
न्यायिक सुधारों में कोर्ट मैनेजरों का महत्व
डिजिटलीकरण, तकनीकी एकीकरण, ई-कोर्ट प्रणाली और प्रक्रिया स्वचालन जैसे आधुनिक न्यायिक सुधार तब तक सीमित प्रभाव वाले रहेंगे, जब तक न्यायाधीश प्रशासनिक कार्यों से मुक्त नहीं होते।
स्थायी और पेशेवर रूप से प्रशिक्षित कोर्ट मैनेजरों का संवर्ग न्यायिक कार्यप्रणाली में महत्वपूर्ण सुधार ला सकता है। इससे प्रशासनिक दक्षता बढ़ेगी, लंबित मामलों में कमी आएगी, निस्तारण दर में सुधार होगा, तकनीकी सुधारों के कार्यान्वयन को मजबूती मिलेगी तथा न्यायाधीश अपना समय पूर्णतः न्यायिक निर्णयों के लिए समर्पित कर सकेंगे।
न्यायिक और प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बीच स्पष्ट विभाजन भारत की न्याय वितरण प्रणाली को सुधारने वाले सबसे प्रभावशाली सुधारों में से एक सिद्ध हो सकता है।
निष्कर्ष
भारत में न्यायिक विलंब केवल मामलों की बढ़ती संख्या का परिणाम नहीं है, बल्कि यह न्यायालय प्रणाली के भीतर गहरी प्रशासनिक चुनौतियों को भी दर्शाता है। प्रबंधकीय कार्यों के लिए न्यायाधीशों पर निरंतर निर्भरता ने संस्थागत दक्षता को कम किया है और लंबित मामलों में वृद्धि की है।
स्थायी और सुदृढ़ कोर्ट मैनेजर संवर्ग की स्थापना, साथ ही न्यायिक और प्रशासनिक कार्यों के स्पष्ट विभाजन के साथ, भारतीय न्यायपालिका के लिए सबसे व्यावहारिक और प्रभावी सुधारों में से एक हो सकती है।
सर्वोच्च न्यायालय पहले ही इसके लिए रूपरेखा और कार्यान्वयन समयसीमा प्रदान कर चुका है, किंतु इस सुधार की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि राज्य सरकारें और उच्च न्यायालय इन परिवर्तनों को किस हद तक संस्थागत रूप देकर न्यायालय प्रशासन को अस्थायी व्यवस्था से पेशेवर प्रबंधन प्रणाली में बदल पाते हैं।