संदर्भ
- दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका पर नोटिस जारी करते हुए एक महत्वपूर्ण एवं संवेदनशील प्रश्न पर विचार शुरू किया है कि क्या कानून जीवक्षम फ्रोजन भ्रूणों (Viable Frozen Embryos) को नष्ट करने का आदेश दे सकता है जबकि इच्छुक और सहमत बांझ दंपत्तियों को उन्हें दान करने की अनुमति नहीं देता है।
- यह याचिका सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी (विनियमन) अधिनियम, 2021 (ART Act 2021) तथा उसके अंतर्गत बनाए गए नियमों की वैधता को चुनौती देती है जो दाता शुक्राणु और अंडाणु से भ्रूण निर्माण की अनुमति तो देते हैं किंतु जीवअक्षम फ्रोजन भ्रूणों को किसी अन्य बांझ दंपत्ति को प्रजनन उद्देश्य से हस्तांतरित करने पर रोक लगाते हैं।
वर्तमान कानूनी स्थिति
- मौजूदा व्यवस्था के अनुसार, आई.वी.एफ. प्रक्रिया के दौरान बने अतिरिक्त फ्रोजन भ्रूणों को अधिकतम 10 वर्षों तक संग्रहित किया जा सकता है।
- इस अवधि के पश्चात इन्हें या तो अनुसंधान के लिए दान करना होता है या ‘नष्ट होने दिया जाता है’। कानून किसी भी स्थिति में इन्हें किसी अन्य बांझ दंपत्ति को गर्भधारण हेतु देने की अनुमति नहीं देता है।
- याचिका में तर्क दिया गया है कि जब सहमति देने वाले प्राप्तकर्ता उपलब्ध हों, तब भी जीवक्षम भ्रूणों को नष्ट करने के लिए बाध्य करना नैतिक और तर्कसंगत दृष्टि से असंगत है।
गैर-आनुवंशिक पितृत्व पर विरोधाभासी दृष्टिकोण
- यह भी प्रश्न उठाता है कि कानून दाता शुक्राणु एवं दाता अंडाणु के माध्यम से गैर-आनुवंशिक पितृत्व को स्वीकार करता है किंतु भ्रूण दान को प्रतिबंधित करता है।
- इस अंतर को एक संभावित विधायी चूक के रूप में प्रस्तुत किया गया है क्योंकि दोनों ही स्थितियों में बच्चे का माता-पिता से कोई आनुवंशिक संबंध नहीं होता है।
कानून क्या अनुमति देता है
- ए.आर.टी. अधिनियम, 2021 नियंत्रित परिस्थितियों में शुक्राणु एवं अंडों के परोपकारी दान की अनुमति देता है। इसके अंतर्गत दाता-सहायता प्राप्त आई.वी.एफ. और डबल-डोनर आई.वी.एफ. भी वैध हैं जहाँ दाता शुक्राणु व दाता अंडाणु से बने भ्रूण को इच्छुक दंपत्ति में प्रत्यारोपित किया जाता है।
- इन मामलों में कानून स्पष्ट रूप से यह मान्यता देता है कि बच्चे का अपने माता-पिता से कोई आनुवंशिक संबंध नहीं होगा और फिर भी ऐसे पितृत्व को वैध स्वीकार किया जाता है।
कानून क्या रोकता है
- इन अनुमतियों के बावजूद यह अधिनियम प्रजनन उद्देश्य से किसी अन्य बांझ दंपत्ति को जीवक्षम फ्रोजन भ्रूण दान करने की अनुमति नहीं देता है।
- यह प्रतिबंध उस अवस्था में लागू होता है जब आईवीएफ प्रक्रिया के बाद भ्रूण जीवक्षम होते हुए भी अप्रयुक्त रह जाते हैं।
अतिरिक्त भ्रूण का कारण
आई.वी.एफ. उपचार में प्राय: गर्भधारण की सफलता दर बढ़ाने के लिए एक से अधिक भ्रूण तैयार किए जाते हैं। सभी भ्रूण प्रत्यारोपित नहीं किए जाते हैं और जब दंपत्ति भविष्य में गर्भधारण न करने का निर्णय लेते हैं तो ये भ्रूण क्रायोप्रिजर्वेशन में बने रहते हैं।
प्रतिबंध का तरीका
- यद्यपि कानून ‘भ्रूण गोद लेने’ पर सीधे शब्दों में रोक नहीं लगाता है किंतु एआरटी अधिनियम और उसके नियमों के संयुक्त प्रभाव से यह व्यवहारिक रूप से निषिद्ध हो जाता है।
- मूल दंपत्ति तक सीमित उपयोग: क्लीनिक केवल उसी दंपत्ति के लिए भ्रूण सुरक्षित रख सकते हैं जिन्होंने आई.वी.एफ. कराया है।
- भ्रूण स्थानांतरण की सीमित अनुमति: भ्रूण का उपयोग केवल मूल दंपत्ति द्वारा, अपने ही प्रजनन उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है, वह भी नियामक स्वीकृति के साथ।
- 10 वर्ष बाद अनिवार्य समाप्ति: धारा 28(2) के अनुसार, 10 वर्षों के बाद भ्रूणों को या तो नष्ट करना होता है या सहमति से अनुसंधान संस्थानों को दान करना होता है।
- सहमति प्रपत्रों की भूमिका: मानक सहमति प्रपत्रों में भ्रूण दान का कोई विकल्प नहीं दिया गया है जिससे यह रास्ता प्रभावी रूप से बंद हो जाता है।
फ्रेश एवं फ्रोजन भ्रूणों के बीच विरोधाभास
- याचिका कानून में निहित एक मूलभूत असंगति की ओर ध्यान दिलाती है। फ्रेश भ्रूणों के मामले में दाता शुक्राणु और अंडाणु से बने भ्रूणों को इच्छुक दंपत्तियों में स्थानांतरित करने की अनुमति है, भले ही बच्चे का माता-पिता से कोई आनुवंशिक संबंध न हो। जैविक दृष्टि से जीवक्षम फ्रोजन भ्रूण भी फ्रेश भ्रूणों के समान होते हैं और आई.वी.एफ. उपचार में समान सफलता दर दिखाते हैं।
- इसके बावजूद कानून फ्रोजन भ्रूणों को प्रजनन उद्देश्य से किसी अन्य दंपत्ति को देने की अनुमति नहीं देता है। याचिका इसे एक ‘दोहरा मापदंड’ बताते हुए कानूनी और नैतिक विसंगति के रूप में प्रस्तुत करती है।
संवैधानिक आधार पर चुनौती
याचिका में भ्रूण दान पर प्रतिबंध को संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के उल्लंघन के रूप में चुनौती दी गई है।
- अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार): तर्क दिया गया है कि कानून उन दंपत्तियों के बीच मनमाना भेद करता है जिन्हें फ्रेश दाता भ्रूण मिल सकते हैं और जिन्हें फ्रोजन भ्रूण प्राप्त करने से रोका जाता है जबकि दोनों ही स्थितियों में आनुवंशिक संबंध समान रूप से अनुपस्थित है।
- अनुच्छेद 21 (प्रजनन स्वायत्तता): याचिका के अनुसार, सहायक प्रजनन के माध्यम से शिशु जन्म का निर्णय जीवन, गरिमा एवं निजता के अधिकार का हिस्सा है। भ्रूण दान पर पूर्ण प्रतिबंध इस व्यक्तिगत स्वायत्तता में अनुचित हस्तक्षेप करता है।
अनिवार्य रूप से भ्रूण को नष्ट करने पर आपत्ति
- एक प्रमुख चिंता उस कानूनी आवश्यकता को लेकर है जिसके तहत 10 वर्षों के बाद भ्रूणों को नष्ट करना अनिवार्य हो जाता है। याचिका इसे ‘विधायी असंगतता’ बताती है क्योंकि जीवनक्षम भ्रूणों को तब भी नष्ट किया जाता है जब इच्छुक एवं सहमति देने वाले प्राप्तकर्ता मौजूद हों।
इस मामला का महत्त्व
- यह विवाद केवल कानूनी नहीं है बल्कि सामाजिक और नैतिक दृष्टि से भी व्यापक महत्व रखता है।
- भारत में बांझपन की व्यापकता: अनुमानतः 27–30 मिलियन दंपत्ति बांझपन से प्रभावित हैं, जिससे सहायक प्रजनन तक पहुंच एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रश्न बन जाता है।
- मौजूदा विकल्पों की सीमाएँ: आई.वी.एफ. अत्यधिक महंगा है और गोद लेने की प्रक्रिया लंबी तथा जटिल है।
- भ्रूण दान की संभावना: विनियमित भ्रूण दान उन दंपत्तियों के लिए एक व्यवहार्य मध्य मार्ग हो सकता है जो गर्भधारण और प्रसव का अनुभव चाहते हैं।
- समानता का प्रश्न: आर्थिक रूप से सक्षम दंपत्ति विदेश जाकर भ्रूण दान का विकल्प चुन सकते हैं जबकि अन्य ऐसा नहीं कर पाते हैं जिससे प्रजनन अधिकार असमानता का शिकार हो जाते हैं।
निष्कर्ष
दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित यह याचिका एआरटी कानून की मूल संरचना, नैतिक आधार और संवैधानिक संगति पर गंभीर प्रश्न उठाती है। यह बहस केवल भ्रूण दान तक सीमित नहीं है बल्कि प्रजनन स्वायत्तता, समानता एवं मानवीय गरिमा जैसे मूल अधिकारों से सीधे जुड़ी हुई है। न्यायालय का निर्णय भविष्य में भारत की सहायक प्रजनन नीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।