गगनयान: अंतरिक्ष से सुरक्षित वापसी की रिकवरी प्रक्रिया
संदर्भ
भारत का महत्वाकांक्षी गगनयान मिशन केवल अंतरिक्ष यात्रियों को गगन मिशन पर भेजने के बारे में नहीं है, बल्कि उन्हें सुरक्षित वापस पृथ्वी पर लाने की एक चुनौतीपूर्ण परीक्षा भी है। वस्तुतः जब गगनयान का क्रू मॉड्यूल लगभग 7,800 मीटर/सेकंड की प्रचंड गति से पृथ्वी की परिक्रमा करेगा, तो उसकी वापसी का सफर विज्ञान और इंजीनियरिंग का एक अद्भुत तालमेल होगा।
प्रमुख बिंदु
सुरक्षित लैंडिंग के लिए बहु-स्तरीय प्रणाली
एयरोब्रेकिंग के बाद भी मॉड्यूल की गति इतनी अधिक होती है कि सुरक्षित लैंडिंग संभव नहीं होती। इसलिए लगभग 12 किलोमीटर की ऊँचाई पर बहु-चरणीय पैराशूट प्रणाली को सक्रिय किया जाता है। यह प्रणाली धीरे-धीरे मॉड्यूल की गति को कम करती है ताकि अंतिम चरण में नियंत्रित स्प्लैशडाउन या लैंडिंग संभव हो सके।
एक सामान्य रिकवरी सिस्टम में केवल पैराशूट ही नहीं, बल्कि कई महत्वपूर्ण घटक शामिल होते हैं - जैसे
लोकेटिंग डिवाइस जो मॉड्यूल की स्थिति बताने में मदद करते हैं,
दिशा नियंत्रण प्रणाली जो समुद्र में गिरने की स्थिति में मॉड्यूल को सही ओरिएंटेशन में रखती है, और अन्य सुरक्षा तंत्र।
भूमि बनाम समुद्र लैंडिंग: अलग-अलग चुनौतियाँ
भूमि पर सुरक्षित लैंडिंग के लिए अतिरिक्त ब्रेकिंग प्रणालियों, जैसे रेट्रोरॉकेट्स या ब्रेकिंग मोटर्स, का उपयोग किया जाता है। रूस का सोयुज़ और चीन का शेनझोउ अंतरिक्ष यान इसी सिद्धांत पर आधारित हैं।
भूमि पर लैंडिंग के लिए लगभग 12 मीटर प्रति सेकंड तक की अंतिम गति स्वीकार्य मानी जाती है, क्योंकि सतह कठोर होती है। इसके विपरीत, समुद्र पानी के कारण अधिक ऊर्जा अवशोषित कर सकता है, जिससे लगभग 79 मीटर प्रति सेकंड तक की गति पर भी सुरक्षित स्प्लैशडाउन संभव हो जाता है।
हालांकि भूमि पर लैंडिंग के लिए बड़े और सुरक्षित क्षेत्र की आवश्यकता होती है, जो आबादी से दूर हों। वहीं समुद्री लैंडिंग उन देशों के लिए उपयुक्त होती है जिनके पास विशाल रेगिस्तान या खुले मैदान नहीं होते।
केवल पैराशूट क्यों पर्याप्त नहीं हैं ?
सैद्धांतिक रूप से यदि केवल पैराशूट का उपयोग करके गति को अत्यधिक कम करने का प्रयास किया जाए, तो यह व्यावहारिक नहीं होता।
ड्रैग और पैराशूट के आकार के बीच व्युत्क्रम संबंध के कारण गति को बहुत कम करने के लिए अत्यधिक बड़े पैराशूट की आवश्यकता होगी। उदाहरण के लिए, यदि गति को 7 मीटर/सेकंड से घटाकर 1 मीटर/सेकंड करना हो, तो पैराशूट का क्षेत्रफल लगभग 49 गुना बढ़ाना पड़ेगा। इतना बड़ा पैराशूट न केवल भारी और जटिल होगा, बल्कि उसके उलझने और असफल तैनाती का जोखिम भी बहुत अधिक होगा।
लैंडिंग क्षेत्र का दीर्घवृत्ताकार स्वरूप
पुनःप्रवेश के दौरान अंतरिक्ष यान का लक्ष्य कोई एक बिंदु नहीं होता, बल्कि एक विस्तृत क्षेत्र होता है जिसे लैंडिंग एलिप्स कहा जाता है। यह क्षेत्र दीर्घवृत्ताकार इसलिए होता है क्योंकि यान की गति का अधिकांश भाग उसकी उड़ान दिशा में केंद्रित होता है।
वायुमंडलीय घनत्व में छोटे बदलाव, गति में हल्के परिवर्तन और पुनःप्रवेश के दौरान आने वाली अनिश्चितताओं के कारण यान अपने निर्धारित बिंदु से सैकड़ों किलोमीटर आगे या पीछे जा सकता है। हालांकि पार्श्व दिशा में विचलन अपेक्षाकृत कम होता है, इसलिए लैंडिंग क्षेत्र लंबा और संकरा आकार लेता है।
समुद्री रिकवरी प्रक्रिया
स्प्लैशडाउन के बाद रिकवरी टीमों की जिम्मेदारी शुरू होती है। मॉड्यूल अपने जीपीएस (GPS) डेटा, होमिंग सिग्नल और अन्य संचार प्रणालियों के माध्यम से अपनी स्थिति भेजता है। इसके अलावा, दृश्य पहचान के लिए कम रोशनी की स्थिति में चमकीला फ्लोरोसेंट डाई और उच्च तीव्रता वाली स्ट्रोब लाइट्स का उपयोग किया जाता है।
मॉड्यूल और उसके फ्लोटेशन सिस्टम को अंतरराष्ट्रीय नारंगी रंग में रंगा जाता है ताकि वह समुद्र की गहरी नीली सतह पर आसानी से दिखाई दे।
रिकवरी ऑपरेशन का नेतृत्व भारतीय नौसेना करती है। स्प्लैशडाउन के तुरंत बाद पैराशूट अलग कर दिए जाते हैं और फ्लोटेशन बैग स्वतः सक्रिय हो जाते हैं।
इसके बाद नौसेना के गोताखोर मॉड्यूल तक पहुँचकर उसे फ्लोटेशन कॉलर और टोइंग उपकरणों से सुरक्षित करते हैं। अंततः उसे जहाज के डेक तक विंच की मदद से खींचा जाता है, जहाँ से अंतरिक्ष यात्रियों को सुरक्षित रूप से बाहर निकाला जाता है।
निष्कर्ष
वस्तुतः गगनयान मिशन की सफलता केवल अंतरिक्ष में पहुँचने तक सीमित नहीं है, बल्कि सुरक्षित वापसी और रिकवरी प्रणाली इसकी सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। एयरोब्रेकिंग, पैराशूट प्रणाली और नौसेना की समन्वित रिकवरी प्रक्रिया मिलकर इस मिशन को सुरक्षित और प्रभावी बनाती हैं।