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वैश्विक भू-राजनीतिक अस्थिरता और भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

संदर्भ 

  • पश्चिम एशिया (West Asia) में गहराता भू-राजनीतिक संकट तेल की कीमतों में उछाल, मुद्रा के अवमूल्यन और राजकोषीय दबाव के माध्यम से भारत की आर्थिक बुनियाद को प्रभावित कर रहा है। ऊर्जा की दृष्टि से समृद्ध क्षेत्रों में तनाव भारत की व्यापक आर्थिक स्थिरता (Macroeconomic Stability) के लिए एक गंभीर चुनौती पेश करता है। 
  • चूँकि भारत अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का 85% से अधिक आयात करता है, इसलिए वह वैश्विक बाहरी झटकों के प्रति अत्यंत संवेदनशील है। हालिया घटनाक्रम यह स्पष्ट करते हैं कि अंतरराष्ट्रीय संघर्ष किस प्रकार सीधे तौर पर घरेलू संकेतकों जैसे—महंगाई, राजकोषीय घाटा और विनिमय दर को असंतुलित कर सकते हैं। 

भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव के प्रमुख माध्यम (Channels of Transmission) 

1. ऊर्जा की कीमतें और मुद्रास्फीति 

  • वैश्विक झटकों का सबसे तीव्र प्रभाव तेल की कीमतों के माध्यम से महसूस किया जाता है।
  • वर्तमान स्थिति : हाल ही में भारतीय कच्चे तेल की बास्केट $156.29 प्रति बैरल के स्तर तक पहुँच गई। 
  • प्रभाव : कच्चे तेल की कीमत में प्रति $10 की वृद्धि न केवल थोक और खुदरा मुद्रास्फीति को बढ़ाती है, बल्कि चालू खाता घाटा (CAD) को भी गहरा करती है। इससे परिवहन लागत और उत्पादन व्यय में वृद्धि होती है, जो अंततः समग्र महंगाई का रूप ले लेती है। 

2. विनिमय दर और मुद्रा अवमूल्यन 

  • भू-राजनीतिक अनिश्चितता के कारण रुपया दबाव में है और गिरकर $1 के मुकाबले ₹95 के ऐतिहासिक निचले स्तर तक पहुँच गया है।
  • आरबीआई की भूमिका : भारतीय रिज़र्व बैंक को विनिमय दर में अत्यधिक अस्थिरता रोकने के लिए अपने विदेशी मुद्रा भंडार का सहारा लेना पड़ रहा है।
  • दोहरी मार : मुद्रा के कमजोर होने से आयातित वस्तुएं महंगी हो जाती हैं, जिससे अर्थव्यवस्था पर 'इम्पोर्टेड इन्फ्लेशन' (आयातित महंगाई) का बोझ बढ़ता है।  

3. बाह्य क्षेत्र और विदेशी निवेश 

  • अनिश्चितता के माहौल में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) द्वारा निकासी बढ़ी है, जिससे बाह्य स्थिरता को खतरा पैदा हुआ है। वर्तमान में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार घटकर लगभग $709 अरब रह गया है, जो वैश्विक झटकों के विरुद्ध सुरक्षा कवच को थोड़ा कम करता है। 

राजकोषीय ढांचा और तेल पर निर्भरता 

  • भारत की राजकोषीय प्रणाली संरचनात्मक रूप से तेल की कीमतों से जुड़ी हुई है। जब तेल महंगा होता है, तो सरकार के सामने दोहरी चुनौती होती है: 
  • सब्सिडी का बोझ : अंतरराष्ट्रीय कीमतों में वृद्धि से उर्वरक और एलपीजी (रसोई गैस) पर दी जाने वाली सरकारी सब्सिडी का खर्च बढ़ जाता है।
  • राजस्व की हानि : आम जनता को महंगाई से बचाने के लिए सरकार को अक्सर ईंधन पर लगने वाले उत्पाद शुल्क (Excise Duty) में कटौती करनी पड़ती है, जिससे सरकारी खजाने में राजस्व की कमी आती है।  

बदलती राजस्व संरचना 

  • भारत का कर ढांचा अब आय-आधारित के बजाय लेन-देन आधारित करों (जैसे जीएसटी) पर अधिक निर्भर हो गया है।
  • जीएसटी संग्रह : वर्तमान में यह ₹22.8 लाख करोड़ के स्तर पर है।
  • जोखिम : यह निर्भरता अर्थव्यवस्था को उन झटकों के प्रति संवेदनशील बनाती है जो उपभोग या आर्थिक गतिविधियों को धीमा करते हैं। यदि संकट के कारण खपत घटती है, तो सीधे तौर पर जीएसटी संग्रह प्रभावित होता है। 

परिवारों और उद्योगों पर प्रभाव 

  • निजी खपत, जो भारत की जीडीपी का लगभग 61.4% है, आर्थिक अस्थिरता का मुख्य केंद्र है।
  • बढ़ती देनदारियां : घरेलू ऋण (Household Liabilities) जीडीपी के 41% से अधिक हो गया है। उच्च कर्ज और बढ़ती महंगाई परिवारों की डिस्पोजेबल इनकम (खर्च योग्य आय) को कम कर देती है, जिससे मांग में गिरावट आती है। 
  • औद्योगिक असंतुलन : जहाँ एक ओर पूंजी-प्रधान विनिर्माण क्षेत्र में मजबूती दिख रही है, वहीं श्रम-प्रधान क्षेत्र और सूक्ष्म एवं लघु उद्योग (MSMEs) मांग में कमी के कारण संघर्ष कर रहे हैं। सरकारी पूंजीगत व्यय के बावजूद, निजी निवेश में अभी भी सतर्कता और मंदी देखी जा रही है।  

व्यापक आर्थिक विरोधाभास (Macroeconomic Paradox) 

  • भारतीय अर्थव्यवस्था वर्तमान में एक विचित्र दोहरी स्थिति से गुजर रही है :
    • एक ओर मजबूत जीडीपी वृद्धि (8.1%) और बुनियादी ढांचे पर भारी सरकारी खर्च है। 
    • दूसरी ओर कमजोर आय वृद्धि, बढ़ता घरेलू कर्ज और गंभीर बाहरी जोखिम मौजूद हैं।
  • यह विरोधाभास दर्शाता है कि केवल बुनियादी ढांचा-आधारित विकास पर्याप्त नहीं है; यह दीर्घकालिक क्षमता तो बढ़ाता है, लेकिन तात्कालिक रूप से आय और उपभोग को सुदृढ़ करने में विफल रह सकता है।  

आगे की राह 

वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच स्थिरता बनाए रखने के लिए भारत को निम्नलिखित रणनीतियों पर ध्यान देना होगा : 

  • ऊर्जा विविधीकरण : कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा और वैकल्पिक स्रोतों की गति तेज करना।
  • आय-आधारित मांग : रोजगार सृजन और वास्तविक वेतन वृद्धि के माध्यम से घरेलू उपभोग को मजबूती प्रदान करना।
  • राजकोषीय बफर : आकस्मिक संकटों से निपटने के लिए पर्याप्त वित्तीय सुरक्षा तंत्र और कर आधार का विस्तार करना। 

वस्तुतः विकास और लचीलेपन (Resilience) के बीच सही संतुलन ही भारत को भविष्य के वैश्विक झटकों से सुरक्षित रख सकता है।

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