चर्चा में क्यों ?
- PLoS Biology(पीएलओएस जीवविज्ञान) में 7 मई 2026 को प्रकाशित एक अध्ययन में वैज्ञानिकों ने डीएनए आधारित आनुवंशिक मानचित्रण प्रणाली (DNA Maps) विकसित की है, जो अवैध रूप से तस्करी किए गए पैंगोलिनों की भौगोलिक उत्पत्ति तथा तस्करी मार्गों की पहचान करने में सक्षम है।
- अध्ययन में अरुणाचल प्रदेश और असम के आसपास उत्तर-पूर्व भारत से चीन के युन्नान क्षेत्र तक जाने वाले संभावित तस्करी नेटवर्क के संकेत भी प्राप्त हुए हैं।

पैंगोलिन तस्करी का पता लगाने में डीएनए मैपिंग का उपयोग
- पैंगोलिन विश्व के सबसे अधिक तस्करी किए जाने वाले स्तनधारियों में शामिल हैं, लेकिन संरक्षण एजेंसियों के सामने लंबे समय से यह चुनौती रही है कि तस्करों से जब्त की गई शल्कों (Scales) के आधार पर यह पता लगाना कठिन होता है कि इन जानवरों का मूल निवास क्षेत्र कौन-सा था।
- इसका प्रमुख कारण यह है कि जब्त की गई शल्कों में उपलब्ध डीएनए अक्सर क्षतिग्रस्त (Degraded) हो जाता है, जिससे पारंपरिक आनुवंशिक विश्लेषण कठिन हो जाता है तथा नमूनों को किसी विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र से जोड़ना संभव नहीं हो पाता।
- इस समस्या के समाधान के लिए शोधकर्ताओं ने जनसंख्या जीनोमिक्स (Population Genomics) पद्धति अपनाई, जिसमें उन्होंने पैंगोलिन जीनोम के केवल 671 ऐसे आनुवंशिक स्थानों (Genetic Markers) को लक्षित किया जो विभिन्न आबादियों के बीच भिन्नता दर्शाते हैं और उनके भौगोलिक स्रोत की पहचान करने में सहायक होते हैं।
- अध्ययन में वैज्ञानिकों ने 122 संग्रहालय नमूनों (Museum Specimens) का भी उपयोग किया, ताकि उन क्षेत्रों से संबंधित भौगोलिक जानकारी प्राप्त की जा सके जहाँ अब जंगली पैंगोलिन अत्यंत दुर्लभ हो चुके हैं। इसके साथ ही सैकड़ों आधुनिक नमूनों को जोड़कर शोधकर्ताओं ने विश्व के सभी आठ पैंगोलिन प्रजातियों को सम्मिलित करते हुए एक विस्तृत भौगोलिक-आधारित डीएनए डेटाबेस तैयार किया।
- यह डेटाबेस एक “जेनेटिक मैप” के रूप में कार्य करेगा, जिससे सरकारी एजेंसियाँ और वन्यजीव संरक्षण संस्थाएँ जब्त किए गए पैंगोलिनों की उत्पत्ति का सटीक निर्धारण कर सकेंगी।
अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष
- अध्ययन ने उस पारंपरिक धारणा को चुनौती दी है जिसके अनुसार स्थानीय (Domestic) व्यापार और अंतरराष्ट्रीय तस्करी को अलग-अलग समस्याएँ माना जाता था, क्योंकि शोध में पाया गया कि स्थानीय बाजारों को आपूर्ति करने वाले क्षेत्र अक्सर अंतरराष्ट्रीय तस्करों को भी आपूर्ति करते हैं।
- शोधकर्ताओं के अनुसार घरेलू व्यापार में पैंगोलिनों को उनके मूल स्थान से औसतन लगभग 454 किलोमीटर दूर तक ले जाया जाता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि अंतरराष्ट्रीय तस्करी से पहले भी एक संगठित स्थानीय आपूर्ति नेटवर्क सक्रिय रहता है।
अध्ययन में तीन प्रमुख अंतरराष्ट्रीय तस्करी केंद्रों की पहचान की गई :
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प्रजाति
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प्रमुख तस्करी क्षेत्र
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व्हाइट-बेलीड पैंगोलिन
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दक्षिण-पश्चिमी कैमरून
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सुंडा पैंगोलिन
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दक्षिण-पश्चिमी बोर्नियो
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चीनी पैंगोलिन
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म्यांमार क्षेत्र
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शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि तस्कर विभिन्न समीपवर्ती आबादियों से पैंगोलिन शल्क एकत्रित कर उन्हें एक साथ मिलाकर वैश्विक बाजारों में भेजते हैं, जिनका मुख्य उपभोक्ता क्षेत्र चीन और वियतनाम है।
भारत से जुड़ा तस्करी नेटवर्क
- अध्ययन में संकेत मिले हैं कि उत्तर-पूर्व भारत के अरुणाचल प्रदेश और असम के आसपास के क्षेत्र तथा संभवतः भूटान, चीन के युन्नान प्रांत को आपूर्ति करने वाले तस्करी नेटवर्क का हिस्सा हो सकते हैं।
- इसके अतिरिक्त शोध में यह भी उल्लेख किया गया कि युन्नान क्षेत्र स्वयं ग्वांगडोंग के लिए एक संभावित स्रोत क्षेत्र के रूप में कार्य कर सकता है, जिससे एशिया में वन्यजीव तस्करी के परस्पर जुड़े नेटवर्क का संकेत मिलता है।
- यह निष्कर्ष भारत के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दर्शाता है कि भारत केवल पैंगोलिनों का आवास क्षेत्र ही नहीं बल्कि क्षेत्रीय वन्यजीव तस्करी नेटवर्क में संभावित आपूर्ति अथवा पारगमन क्षेत्र भी हो सकता है।
डीएनए आधारित जेनेटिक मैप का महत्व
- यह नई आनुवंशिक प्रणाली वन्यजीव संरक्षण और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकती है क्योंकि इसकी सहायता से अवैध शिकार केंद्रों की पहचान, जब्त वन्यजीव उत्पादों के स्रोत का निर्धारण, वैज्ञानिक साक्ष्य उपलब्ध कराना, तस्करी नेटवर्क को तोड़ना तथा तस्करी को उसके मूल स्रोत पर रोकना संभव हो सकेगा।
- वर्ष 2015 से 2021 के बीच विश्वभर में पौधों और पशुओं की 1.4 लाख से अधिक जब्ती घटनाएँ दर्ज की गई थीं, लेकिन अब तक इनके स्रोत तक पहुँचने के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं थे। यह जेनेटिक मैप इस कमी को दूर कर सकता है।
पैंगोलिन के बारे में
पैंगोलिन (Pangolin), जिसे हिंदी में 'सल्लू सांप' या 'वज्रकीट' भी कहा जाता है, दुनिया के सबसे अनोखे और रहस्यमय जीवों में से एक है। यह एकमात्र ऐसा स्तनधारी (Mammal) जीव है जिसके शरीर पर केराटिन (Keratin) से बने कड़े शल्क या स्केल्स (Scales) होते हैं—वही केराटिन जिससे हमारे नाखून और बाल बनते हैं।
शारीरिक विशेषताएँ और व्यवहार
- अनोखा सुरक्षा कवच : खतरा महसूस होने पर पैंगोलिन किसी गेंद (Ball) की तरह गोल घूम जाता है। इसका यह कवच इतना मजबूत होता है कि शेर या तेंदुआ भी इसे चबा नहीं सकते।
- भोजन : इसके दांत नहीं होते। यह अपनी लंबी और चिपचिपी जीभ से चींटियों और दीमकों को खाता है। एक वयस्क पैंगोलिन साल भर में करीब 7 करोड़ कीड़े-मकोड़े खा सकता है, इसलिए इसे 'प्राकृतिक कीट नियंत्रक' भी कहा जाता है।
- स्वभाव : यह एक शर्मीला और निशाचर (रात में जागने वाला) जीव है जो अकेले रहना पसंद करता है।
प्रजातियाँ
विश्व में पैंगोलिन की कुल 8 प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें 4 अफ्रीका तथा 4 एशिया में पाई जाती हैं।
अफ्रीकी प्रजातियाँ
- व्हाइट-बेलीड पैंगोलिन
- ब्लैक-बेलीड पैंगोलिन
- जायंट ग्राउंड पैंगोलिन
- टेम्मिंक ग्राउंड पैंगोलिन
एशियाई प्रजातियाँ
- इंडियन पैंगोलिन
- चाइनीज़ पैंगोलिन
- सुंडा पैंगोलिन
- फिलीपीन पैंगोलिन
आवास और वितरण
पैंगोलिन सामान्यतः उष्णकटिबंधीय वनों, घासभूमियों, कृषि क्षेत्रों तथा मानव बस्तियों के निकट पाए जाते हैं।
Indian Pangolin का वितरण भारत, नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश तक विस्तृत है।
आहार और पारिस्थितिक महत्व
पैंगोलिन मुख्य रूप से चींटियों और दीमकों का भोजन करते हैं, जिससे वे प्राकृतिक कीट नियंत्रण, मृदा वातन (Soil Aeration) तथा पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
खतरे
पैंगोलिनों के सामने प्रमुख खतरे हैं :
- अवैध वन्यजीव व्यापार
- पारंपरिक चिकित्सा में शल्कों का उपयोग
- मांस की मांग
- वनों की कटाई
- कृषि विस्तार
- आवास विनाश एवं विखंडन
संरक्षण स्थिति
- भारतीय पैंगोलिन को IUCN रेड लिस्ट में Endangered (संकटग्रस्त) श्रेणी में रखा गया है, जबकि Chinese Pangolin Critically Endangered (गंभीर रूप से संकटग्रस्त) श्रेणी में सूचीबद्ध है।
- भारत में दोनों प्रजातियों को Wildlife (Protection) Act, 1972 की अनुसूची-I के अंतर्गत सर्वोच्च कानूनी संरक्षण प्राप्त है।
- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सभी आठ प्रजातियाँ CITES के Appendix-I में शामिल हैं, जिसके अंतर्गत इनके अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक व्यापार पर प्रतिबंध लगाया गया है।