भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक देश है और वैश्विक मछली उत्पादन में इसका योगदान लगभग 8 प्रतिशत है। मत्स्य पालन न केवल तटीय और ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा, रोजगार और आय के सृजन का प्रमुख स्तंभ है, बल्कि कृषि सकल मूल्य वर्धित (GVA) में इसका योगदान लगभग 7.43 प्रतिशत है, जो कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में सबसे अधिक है।
प्रमुख बिंदु
मत्स्य उत्पादन और निर्यात में वृद्धि
दीर्घकालीन कार्यक्रमों के परिणामस्वरूप, भारत का कुल मछली उत्पादन वित्त वर्ष 2013-14 में 95.79 लाख टन से बढ़कर वित्त वर्ष 2024-25 में 197.75 लाख टन हो गया, जो 106 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है।
इसी अवधि में समुद्री खाद्य निर्यात में भी महत्वपूर्ण उछाल आया और वित्त वर्ष 2024-25 में यह 62,408 करोड़ रुपये तक पहुँच गया।
केंद्रीय बजट में मत्स्य पालन का महत्व
केंद्रीय बजट 2026-27 में मत्स्य पालन क्षेत्र के लिए 2,761.80 करोड़ रुपये का उच्चतम वार्षिक आवंटन प्रस्तावित किया गया है।
इसमें से 2,530 करोड़ रुपये विभिन्न लक्षित सरकारी योजनाओं के तहत मछुआरों और मत्स्य किसानों को प्रत्यक्ष लाभ देने, बुनियादी ढांचे का विकास, बीमा कवरेज, वित्तीय सहायता और क्षमता निर्माण पहल के लिए निर्धारित हैं।
नीली क्रांति और प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना
वर्ष 2015 में शुरू की गई नीली क्रांति ने उत्पादकता बढ़ाने, बुनियादी ढांचे का विस्तार करने और आधुनिक तकनीक और प्रबंधन के माध्यम से मत्स्य पालन क्षेत्र को व्यवस्थित किया।
इसके बाद 2020 में प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) शुरू की गई, जिसने मछली उत्पादन, मूल्य श्रृंखला, मछली पकड़ने और प्रबंधन के बाद बुनियादी ढांचे को मजबूत किया।
पीएमएमएसवाई ने उच्च घनत्व, जल-कुशल और प्रौद्योगिकी-संचालित जलीय कृषि प्रणालियों को बढ़ावा दिया, जैसे कि रिसर्क्युलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम (RAS) और बायो-फ्लॉक तकनीक, जो उत्पादन, गुणवत्ता और पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण में मदद करते हैं।
वित्तीय समावेशन और जोखिम प्रबंधन
मछुआरों और मछली पालकों की वित्तीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना (PM-MKSSY) और किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) जैसी योजनाएं लागू की गई हैं।
वर्ष 2019 से केसीसी योजना के तहत मछुआरों के लिए ऋण सीमा बढ़ाकर 5 लाख रुपये कर दी गई है। वित्तीय समावेशन और कल्याण कार्यक्रमों के तहत जनवरी 2026 तक लगभग 4.39 लाख मछुआरों को केसीसी लाभ और 33 लाख लाभार्थियों को बीमा कवरेज प्राप्त हुआ।
मत्स्य पालन और जलीय कृषि अवसंरचना विकास कोष (FIDF)
2018-19 में शुरू किया गया एफआईडीएफ (FIDF) मछली पकड़ने और प्रसंस्करण बुनियादी ढांचे में निवेश और दीर्घकालीन विकास को बढ़ावा देता है।
जनवरी 2026 तक एफआईडीएफ (FIDF) के तहत 6,685.78 करोड़ रुपये की 225 परियोजनाओं को मंजूरी मिली, जिसमें 8,100 से अधिक जहाजों के लिए लैंडिंग और बर्थिंग सुविधाएं और लगभग 3.3 लाख मछुआरों और हितधारकों को लाभ हुआ।
डिजिटल गवर्नेंस और राष्ट्रीय मत्स्य डिजिटल प्लेटफॉर्म (NFDP)
एनएफडीपीने मत्स्य पालन मूल्य श्रृंखला में पारदर्शिता, जवाबदेही और डेटा-संचालित निर्णय लेने को मजबूत किया। 5 मार्च 2026 तक 30.60 लाख से अधिक हितधारकों ने पंजीकरण कराया और 12 बैंकों को एक सामान्य डिजिटल ढांचे से जोड़ा गया।
समुद्री मत्स्य पालन जनगणना 2025
31 अक्टूबर 2025 को शुरू की गई यह डिजिटल और भू-संदर्भित जनगणना मछुआरा परिवारों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति, आय, बीमा, ऋण और सरकारी योजनाओं में भागीदारी का विस्तृत डेटा उपलब्ध कराती है।
मिशन-संचालित जलाशय विकास
भारत का अंतरदेशीय जलाशय नेटवर्क लगभग 31.5 लाख हेक्टेयर में फैला है। मिशन अमृत सरोवर के तहत 68,827 जलाशयों का विकास हुआ है, जिससे मछली संस्कृति, आजीविका और जलीय पारिस्थितिकी को बढ़ावा मिला है।
सतत शासन और वैश्विक प्रतिस्पर्धा
देश की 11,099 किलोमीटर तटरेखा और 24 लाख वर्ग किलोमीटर का विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) समुद्री मत्स्य पालन और नीली अर्थव्यवस्था में रणनीतिक योगदान देता है।
सरकार ने ईईजेड और अंतर्राष्ट्रीय जल क्षेत्रों में सतत मत्स्य पालन नियमों और दिशानिर्देशों को लागू किया है। एमपीईडीए (MPEDA) गुणवत्ता आश्वासन, बाजार सुविधा और क्षमता निर्माण के माध्यम से निर्यात को बढ़ावा देता है।
निष्कर्ष
भारत का मत्स्य पालन क्षेत्र लगभग तीन करोड़ लोगों की आजीविका का आधार है। उत्पादन में विस्तार, निर्यात प्रतिस्पर्धा, बुनियादी ढांचे का आधुनिकीकरण और टिकाऊ प्रौद्योगिकियों को अपनाने की नीति ने इसे तेजी से मजबूत किया है।
केंद्रीय बजट 2026-27 और योजनाएं जैसे पीएमएमएसवाई, पीएम-एमकेएसएसवाई, एनएफडीपी और एफआईडीएफ इस परिवर्तन को और गति दे रहे हैं। इन प्रयासों से मत्स्य पालन सतत विकास लक्ष्य 14: पानी के नीचे जीवन की प्राप्ति में योगदान कर रहा है और नीली अर्थव्यवस्था को अधिक समावेशी, टिकाऊ और प्रतिस्पर्धात्मक बना रहा है।