New
Final Result - UPSC CSE Result, 2025 GS Foundation (P+M) - Delhi : 1st April 2026, 11:30 AM GS Foundation (P+M) - Prayagraj : 3rd April 2026, 5:30PM Final Result - UPSC CSE Result, 2025 GS Foundation (P+M) - Delhi : 1st April 2026, 11:30 AM GS Foundation (P+M) - Prayagraj : 3rd April 2026, 5:30PM

भारत की इंटरनेट सेंसरशिप व्यवस्था

संदर्भ

  • भारत में एक इंटरनेट उपयोगकर्ता का डिजिटल अनुभव काफी हद तक उसके इंटरनेट सेवा प्रदाता (ISP) के चयन पर निर्भर करता है। यह अंतर केवल डेटा की गति या मूल्य तक सीमित नहीं है, बल्कि इस बात तक विस्तृत है कि वह इंटरनेट के कितने हिस्से तक पहुँच (Access) सकता है। विभिन्न आईएसपी द्वारा वेबसाइटों को ब्लॉक करने की प्रक्रिया में पाई जाने वाली असंगति (Inconsistency) डिजिटल नागरिकता के समान अनुभवों को बाधित करती है। 

वैधानिक आधार और कार्यान्वयन तंत्र 

भारत में वेबसाइट ब्लॉकिंग मुख्य रूप से दो कानूनी स्तंभों पर आधारित है :

  • सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (धारा 69A और 79) : यह सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों के हित में सामग्री को ब्लॉक करने का अधिकार देती है। 
  • आईएसपी लाइसेंस समझौता : इसके तहत आईएसपी कानूनी रूप से सरकार (लाइसेंसर) के निर्देशों का पालन करने के लिए बाध्य हैं। ये आदेश प्रायः गोपनीय होते हैं। हालांकि, कॉपीराइट उल्लंघन या व्यापारिक विवादों के मामलों में न्यायालय के हस्तक्षेप से ये सार्वजनिक हो जाते हैं। वर्ष 2020 में टिकटॉक (TikTok) जैसे चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध इसका एक व्यापक उदाहरण है। 

तकनीकी प्रोटोकॉल और ब्लॉकिंग की विधियाँ 

  • आईएसपी वेबसाइटों तक पहुँच रोकने के लिए इंटरनेट के मूलभूत प्रोटोकॉल का उपयोग करते हैं। इसे समझने के लिए नीचे दिए गए चरणों को देखा जा सकता है:
  • DNS (Domain Name System) ब्लॉकिंग : यह सबसे प्रचलित और सस्ती विधि है। जब कोई उपयोगकर्ता example.com टाइप करता है, तो आईएसपी का डीएनएस सर्वर उसे सही आईपी एड्रेस देने के बजाय गलत जानकारी देता है, जिसे DNS Poisoning कहा जाता है। 
  • इसके अतिरिक्त, आईएसपी बिना एन्क्रिप्शन वाले एचटीटीपी ट्रैफिक को अवरुद्ध कर ब्लॉक पेज भी दिखा सकते हैं, हालांकि एचटीटीपीएस के व्यापक उपयोग के कारण यह तरीका अब कम उपयोग में है। एचटीटीपीएस के मामले में आईएसपी सर्वर नेम इंडिकेशन (एसएनआई) के आधार पर कनेक्शन को पहचानकर उसे रोकते हैं। 

हाइपरटेक्स्ट ट्रांसफर प्रोटोकॉल सिक्योर (एचटीटीपीएस) क्या है ?

  • एचटीटीपीएस, एचटीटीपी का सुरक्षित संस्करण है, जो वेब ब्राउज़र और वेबसाइट के बीच डेटा भेजने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला मुख्य प्रोटोकॉल है। डेटा ट्रांसफर की सुरक्षा बढ़ाने के लिए एचटीटीपीएस एन्क्रिप्टेड होता है। यह तब विशेष रूप से महत्वपूर्ण होता है जब उपयोगकर्ता संवेदनशील डेटा भेजते हैं, जैसे कि बैंक खाते, ईमेल सेवा या स्वास्थ्य बीमा प्रदाता में लॉग इन करते समय।
  • क्रोम जैसे आधुनिक वेब ब्राउज़रों में, एचटीटीपीएस का उपयोग न करने वाली वेबसाइटों को एचटीटीपीएस का उपयोग करने वाली वेबसाइटों से अलग तरीके से दिखाया जाता है। सुरक्षित वेबपेज को दर्शाने के लिए यूआरएल बार में ताले का चिह्न देखें। वेब ब्राउज़र एचटीटीपीएस को गंभीरता से लेते हैं; गूगल क्रोम और अन्य ब्राउज़र एचटीटीपीएस का उपयोग न करने वाली सभी वेबसाइटों को असुरक्षित बताते हैं।

असंगति और अपारदर्शिता की चुनौती 

  • यह अध्ययन दर्शाता है कि वर्तमान व्यवस्था में ब्लॉकिंग आदेशों का क्रियान्वयन असंगठित और असमान है। एक आईएसपी द्वारा अवरुद्ध की गई वेबसाइट दूसरे आईएसपी पर आसानी से उपलब्ध हो सकती है, जिससे न केवल ब्लॉकिंग का उद्देश्य कमजोर पड़ता है बल्कि उपयोगकर्ताओं के अधिकारों पर भी प्रभाव पड़ता है। साथ ही अधिक गंभीर स्थिति तब उत्पन्न होती है जब जिन वेबसाइटों को अनब्लॉक करने का निर्देश दिया गया है, वे भी कुछ आईएसपी पर अभी तक अवरुद्ध बनी रहती हैं। 
  • इसके साथ ही, यह पूरी प्रक्रिया अत्यधिक अपारदर्शी है। वस्तुतः आदर्श रूप में, अवरुद्ध डोमेनों की सूची सार्वजनिक होनी चाहिए, सिवाय उन मामलों के जो राष्ट्रीय सुरक्षा या बाल यौन शोषण सामग्री से संबंधित हों। उदाहरण के तौर पर, अध्ययन में कई हानिकारक डोमेनों के ब्लॉक होने की जानकारी मिली, जो संभवतः जनहित में है। किंतु पारदर्शिता के अभाव में यह निर्धारित करना कठिन हो जाता है कि यह आवश्यक कार्रवाई है या अतिरेक। 

न्यायिक सुरक्षा उपाय और चुनौतियाँ 

  • श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 69A की संवैधानिकता को बरकरार रखा था, लेकिन साथ ही कुछ अनिवार्य सुरक्षा उपाय भी निर्धारित किए थे: 
  • एक सक्षम समीक्षा समिति का गठन।
  • प्रभावित पक्षों को सुनवाई का अधिकार। 

वर्तमान संकट 

  • वर्तमान प्रणाली की अपारदर्शिता इन न्यायिक सुरक्षा उपायों को निष्प्रभावी बना देती है। जब तक ब्लॉक किए गए डोमेनों की सूची (राष्ट्रीय सुरक्षा के अपवादों को छोड़कर) सार्वजनिक नहीं की जाती, तब तक यह तय करना असंभव है कि की गई कार्रवाई न्यायसंगत है या अधिकारों का उलंघन। 

निष्कर्ष 

  • भारत में वेबसाइट ब्लॉकिंग की वर्तमान व्यवस्था अत्यधिक खंडित और अपारदर्शी है। किसी एक आईएसपी पर जो वेबसाइट उपलब्ध है, वह दूसरे पर प्रतिबंधित हो सकती है, जो न केवल कानून के समान कार्यान्वयन पर सवाल उठाती है, बल्कि इंटरनेट की मूल अवधारणा नेट न्यूट्रलिटी और सूचना के अधिकार को भी प्रभावित करती है। यद्यपि एक जवाबदेह डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र के लिए ब्लॉकिंग आदेशों में पारदर्शिता और एक समान तकनीकी मानक अनिवार्य हैं। 
« »
  • SUN
  • MON
  • TUE
  • WED
  • THU
  • FRI
  • SAT
Have any Query?

Our support team will be happy to assist you!

OR
X