संदर्भ
- 21वीं सदी के वैश्विक परिदृश्य में जलवायु परिवर्तन एक अस्तित्वपरक संकट के रूप में उभरा है। पेरिस समझौते के अंतर्गत भारत द्वारा अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) को संशोधित करना एक ऐसा रणनीतिक कदम है, जो वैश्विक उत्तरदायित्व और राष्ट्रीय विकास की अनिवार्यताओं के बीच एक सूक्ष्म संतुलन साधने का प्रयास करता है। यह संशोधन ऐसे समय में आया है जब वैश्विक ऊर्जा बाज़ार अस्थिर हैं और विकासशील देशों पर अपनी जलवायु महत्वाकांक्षाएं बढ़ाने का तीव्र दबाव है। भारत का यह निर्णय न केवल उसकी क्रमिक प्रगति को दर्शाता है, बल्कि जलवायु न्याय के प्रति उसकी अटूट प्रतिबद्धता को भी रेखांकित करता है।
संशोधित लक्ष्यों का त्रिकोणीय ढांचा
भारत सरकार द्वारा हाल ही में स्वीकृत संशोधित एनडीसी में तीन प्रमुख स्तंभों को सुदृढ़ किया गया है, जो देश के हरित विकास की रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं :
- उत्सर्जन तीव्रता में कटौती : भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था की उत्सर्जन तीव्रता (Emission Intensity) को 2005 के स्तर के मुकाबले वर्ष 2035 तक 47% कम करने का संकल्प लिया है। यह पिछले लक्ष्य (2030 तक 45%) से अधिक महत्वाकांक्षी और दीर्घकालिक है।
- ऊर्जा संक्रमण : विद्युत उत्पादन की कुल स्थापित क्षमता में गैर-जीवाश्म ईंधन (Non-fossil fuel) आधारित स्रोतों की हिस्सेदारी को 60% तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा को स्वच्छ स्रोतों के साथ एकीकृत करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
- कार्बन सिंक का विस्तार : वन और वृक्ष आवरण के माध्यम से 3.5 से 4 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य के अतिरिक्त कार्बन सिंक के निर्माण का लक्ष्य निर्धारित किया गया है, जो पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली पर केंद्रित है।
संरचनात्मक सीमाएं और जलवायु न्याय का तर्क
- भारत की जलवायु नीति को उसकी सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं से अलग करके नहीं देखा जा सकता। एक निम्न-मध्यम आय वाले देश के रूप में, भारत की प्रति व्यक्ति उत्सर्जन दर वैश्विक औसत का लगभग एक-तिहाई है। इसके बावजूद, भारत समान परंतु विभेदित जिम्मेदारियों (CBDR-RC) के सिद्धांत पर जोर देता रहा है।
- पेरिस समझौते की संरचनात्मक अपेक्षाएं प्रत्येक पांच वर्ष में लक्ष्यों को उन्नत करने की मांग करती हैं। हालांकि, भारत का तर्क है कि विकासशील देशों के लिए यह प्रक्रिया केवल कागजी लक्ष्यों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसे तकनीकी हस्तांतरण और रियायती जलवायु वित्त (Climate Finance) से समर्थित होना चाहिए।
जलवायु कार्रवाई बनाम क्रियान्वयन की चुनौतियां
- भारत में निम्न-कार्बन विकास के प्रति नीतिगत उत्साह स्पष्ट है। केंद्र और राज्यों के समन्वय से पीएम-कुसुम, पीएलआई (PLI) योजना, और राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से एक पारिस्थितिकी तंत्र विकसित किया जा रहा है।
- हालांकि, इन प्रयासों को कठोर कानूनी प्रतिबद्धता में बदलने से पहले सावधानी आवश्यक है। इसका मुख्य कारण बिएनियल ट्रांसपेरेंसी रिपोर्ट (BTR) जैसी अंतर्राष्ट्रीय जवाबदेही प्रणालियां हैं। भारत अपनी क्षमताओं का अति-आकलन करने के बजाय एक यथार्थवादी मार्ग अपनाना चाहता है ताकि वैश्विक मंच पर उसकी विश्वसनीयता बनी रहे।
महत्वाकांक्षा बनाम वास्तविकता
वैश्विक विशेषज्ञों के एक वर्ग का मानना है कि भारत को 1.5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य के अनुरूप अधिक आक्रामक कटौती करनी चाहिए। किंतु यह तर्क भारत की ऊर्जा संरचना की जटिलताओं को नजरअंदाज करता है:
- कोयला आधारित निर्भरता : भारत की ऊर्जा का मुख्य आधार अभी भी कोयला है। नवीकरणीय ऊर्जा (RE) के विस्तार के साथ-साथ ग्रिड स्थिरता बनाए रखने के लिए कोयला संयंत्रों को बैकअप के रूप में रखना पड़ता है, जो परिचालन लागत को बढ़ाता है।
- भंडारण की उच्च लागत : सौर और पवन ऊर्जा की अस्थिरता को दूर करने के लिए बड़े पैमाने पर बैटरी स्टोरेज और पंप हाइड्रो स्टोरेज की आवश्यकता है। वर्तमान में इन तकनीकों की लागत अत्यधिक है, जो अंततः उपभोक्ताओं और सरकारी खजाने पर भार डालती है।
- आर्थिक परिवर्तन की लागत : बीएस-VI मानकों को अपनाना और इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की ओर संक्रमण करना उद्योगों के लिए भारी निवेश की मांग करता है।
विकास का अधिकार और वैश्विक उत्तरदायित्व
- भारत को अभी अपने तीव्र शहरीकरण और औद्योगिक विस्तार के दौर से गुजरना है। बुनियादी ढांचे का निर्माण और गरीबी उन्मूलन जैसे प्राथमिक लक्ष्यों के लिए ऊर्जा की मांग का बढ़ना अपरिहार्य है। 1.5 डिग्री सेल्सियस का लक्ष्य केवल तभी प्राप्त हो सकता है जब विकसित देश, जिनका ऐतिहासिक उत्सर्जन अधिक रहा है, अपने नेट-जीरो लक्ष्यों को और पहले प्राप्त करें और विकासशील देशों को वित्तीय सहायता प्रदान करें।
निष्कर्ष
- भारत के संशोधित एनडीसी न तो अति-महत्वाकांक्षी कल्पनाओं पर आधारित हैं और न ही यथास्थितिवाद पर आधारित हैं। ये पंचामृत के सिद्धांतों और मिशन लाइफ (LiFE) जैसी जीवनशैली की अवधारणाओं के अनुरूप हैं। भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह जलवायु परिवर्तन के समाधान का हिस्सा है, समस्या का नहीं। भविष्य की राह इस बात पर निर्भर करेगी कि वैश्विक समुदाय जलवायु वित्त के अपने वादों को कितनी गंभीरता से पूरा करता है, ताकि भारत जैसे देश अपनी विकास यात्रा को बाधित किए बिना वैश्विक पर्यावरण संरक्षण में अपना न्यायसंगत योगदान दे सकें।