संदर्भ
संसद द्वारा दिवालियापन एवं दिवालिया संहिता (IBC) में किए गए हालिया संशोधन भारत के कॉर्पोरेट ऋण समाधान ढांचे को अधिक सुव्यवस्थित और त्वरित बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम हैं।
दिवालियापन एवं दिवालिया संहिता (IBC) के बारे में
- वर्ष 2016 में लागू आईबीसी एक क्रांतिकारी कानून है, जो कंपनियों, साझीदारी फर्मों और व्यक्तियों के वित्तीय संकट के समाधान के लिए एक समयबद्ध ढांचा प्रदान करता है।
- उद्देश्य: संकटग्रस्त संस्थाओं को पुनर्जीवित करना या विफल होने पर व्यवस्थित रूप से उनकी परिसंपत्तियों का निपटान (Liquidation) करना।
- नियामक ढांचा: पूरी प्रक्रिया की देखरेख नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) करता है, जबकि भारतीय दिवाला और दिवालियापन बोर्ड (IBBI) नियामक के रूप में कार्य करता है।
क्रियान्वयन की चुनौतियाँ और संशोधनों की आवश्यकता
अपने महत्वाकांक्षी लक्ष्यों के बावजूद, पिछले कुछ वर्षों में आईबीसी को कई बाधाओं का सामना करना पड़ा:
- न्यायिक विलंब: एनसीएलटी में मामलों की स्वीकृति और सुनवाई में लंबा समय लगना।
- लंबित मामले: न्यायाधिकरणों पर बढ़ता मुकदमों का बोझ।
- वसूली दर: कई मामलों में बैंकों और लेनदारों को उनके वास्तविक दावे की तुलना में बहुत कम राशि प्राप्त होना।
प्रमुख संशोधन: आईबीसी संशोधन विधेयक, 2026 के मुख्य बिंदु
इन संरचनात्मक कमियों को दूर करने के लिए पारित नए संशोधनों में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं:
- अनिवार्य स्वीकृति: अब डिफॉल्ट (चूक) सिद्ध होने पर एनसीएलटी को बिना किसी अतिरिक्त विवेकाधिकार के आवेदन स्वीकार करना होगा। इससे शुरुआती देरी समाप्त होगी।
- सीआईआईआरपी (CIIRP) की शुरुआत: लेनदार-प्रेरित दिवाला समाधान प्रक्रिया (Creditor-initiated Insolvency Resolution Process) के तहत, यदि 51% वित्तीय लेनदार सहमत हों, तो अदालत के बाहर भी प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।
- वैश्विक मानक: अब इस ढांचे में समूह दिवालियापन (Group Insolvency) और सीमा-पार दिवालियापन (Cross-border Insolvency) को भी शामिल किया गया है।
- हितों का टकराव: पारदर्शिता बनाए रखने के लिए समाधान पेशेवरों (Resolution Professionals) को उसी मामले में परिसमापक (Liquidator) बनने से रोक दिया गया है।
- दंड का सरलीकरण: कुछ प्रक्रियात्मक चूकों के लिए अब आपराधिक सजा के बजाय नागरिक दंड (Civil Penalty) का प्रावधान है।
अपेक्षित सकारात्मक प्रभाव
इन संशोधनों से भारतीय अर्थव्यवस्था और ऋण संस्कृति पर दूरगामी प्रभाव पड़ेंगे:
- त्वरित समाधान: मामलों की शीघ्र स्वीकृति से पूरी प्रक्रिया की गति बढ़ेगी।
- न्यायपालिका पर कम बोझ: अदालत के बाहर समाधान (Out-of-court settlements) से एनसीएलटी का कार्यभार कम होगा।
- निवेशक विश्वास: वैश्विक मानकों के अनुरूप नियमों से विदेशी निवेशकों का भारत पर भरोसा बढ़ेगा।
- बेहतर वसूली: समयबद्ध समाधान से परिसंपत्तियों की वैल्यू कम नहीं होगी, जिससे लेनदारों को बेहतर रिकवरी मिलेगी।
अब तक का प्रदर्शन: एक नज़र (दिसंबर 2025 तक)
आईबीसी ने अपनी स्थापना के बाद से ऋण अनुशासन में बड़ा बदलाव किया है:
- सफल समाधान: 1,376 से अधिक कंपनियों का पुनरुद्धार।
- कुल वसूली: लगभग 4.11 लाख करोड़ रुपये की प्राप्ति।
- रिकवरी रेट: वित्तीय लेनदारों ने अपने दावों का औसतन 34% से अधिक वसूल किया है।
भविष्य की राह: सतत सुधार की आवश्यकता
हालिया संशोधन सराहनीय हैं, लेकिन आईबीसी की पूर्ण सफलता के लिए निम्नलिखित बिंदुओं पर निरंतर कार्य करना होगा:
- संस्थागत क्षमता: एनसीएलटी में रिक्त पदों को भरना और बुनियादी ढांचे को मजबूत करना।
- समयसीमा का पालन: समाधान के लिए निर्धारित डेडलाइन का सख्ती से पालन सुनिश्चित करना।
- प्राथमिकता: अंतिम विकल्प के रूप में ही परिसमापन (Liquidation) को चुनना, प्राथमिक लक्ष्य हमेशा समाधान ही होना चाहिए।