हाल ही में, भारत सरकार ने असम से ब्रिटेन और इटली को भौगोलिक संकेतक (GI Tag) प्राप्त 25 मीट्रिक टन जोहा चावल की पहली निर्यात खेप भेजी है। असम की एक स्वदेशी सुगंधित किस्म ‘जोहा चावल’ को वर्ष 2017 में भौगोलिक संकेतक प्राप्त हुआ। अपनी विशिष्ट सुगंध, महीन दानेदार बनावट और समृद्ध स्वाद के लिए प्रसिद्ध यह चावल घरेलू एवं अंतर्राष्ट्रीय प्रीमियम बाजारों में पहचान अर्जित कर रहा है।
जोहा चावल के बारे में
- जोहा चावल (Joha Rice) अपनी विशिष्ट सुगंध, बेहतरीन स्वाद और उच्च पोषण मूल्य के लिए जाना जाता है।
- यह मुख्य रूप से भारत के असम और उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में उगाया जाने वाला एक प्रीमियम ‘सुगंधित’ (Aromatic) चावल है।
भौगोलिक पहचान और विशेषताएँ
- GI टैग: असम के जोहा चावल को इसकी विशिष्टता के कारण भौगोलिक संकेतक (GI Tag) प्राप्त है।
- सुगंध: यह अपनी तीव्र एवं मनमोहक सुगंध के लिए प्रसिद्ध है जो अन्य सुगंधित चावलों (जैसे- बासमती) से काफी अलग होती है।
- आकार: इसके दाने छोटे से मध्यम आकार के होते हैं।
पोषण और स्वास्थ्य लाभ
- एंटी-ऑक्सीडेंट: इसमें प्रचुर मात्रा में एंटी-ऑक्सीडेंट्स होते हैं जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं।
- मधुमेह (Diabetes) के लिए उपयुक्त: शोध के अनुसार, जोहा चावल में ऐसे यौगिक पाए जाते हैं जो ब्लड शुगर को नियंत्रित करने में मदद कर सकते हैं जिससे यह मधुमेह रोगियों के लिए अन्य सफेद चावलों की तुलना में बेहतर विकल्प माना जाता है।
- ओमेगा फैटी एसिड: यह ओमेगा-6 और ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर होता है जो हृदय स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है।
- प्रोटीन: इसमें अन्य सामान्य चावल की किस्मों की तुलना में प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है।
कृषि और उत्पादन
- क्षेत्र: इसकी खेती मुख्य रूप से ब्रह्मपुत्र घाटी के उपजाऊ क्षेत्रों में की जाती है।
- सीजन: यह मुख्य रूप से ‘साली’ (Sali) धान के रूप में उगाया जाता है जिसकी कटाई सर्दियों के मौसम में होती है।
सांस्कृतिक महत्व
असम में जोहा चावल का विशेष स्थान है। इसका उपयोग मुख्य रूप से त्योहारों (जैसे- बिहू) के दौरान तथा खीर, पुलाव व पारंपरिक ‘पीठा’ बनाने में और विशेष अतिथियों के सत्कार के लिए किया जाता है।