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न्यायिक मौखिक टिप्पणियाँ और न्यायालयों की संस्थागत सीमाएँ

संदर्भ 

  • हाल ही में भारत के मुख्य न्यायाधीश की अदालती मौखिक टिप्पणियों ने यह बहस फिर तेज कर दी है कि न्यायाधीशों की अभिव्यक्ति की सीमा क्या होनी चाहिए और न्यायिक आचरण के मानदंड क्या हैं। वस्तुतः अदालतें अक्सर वकीलों के तर्कों को परखने और कानूनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए मौखिक टिप्पणियाँ करती हैं। लेकिन जब ये टिप्पणियाँ विवादास्पद हो जाती हैं, तो न्यायाधीश के निजी विचारों और अदालत के अंतिम कानूनी फैसले के बीच के अंतर पर गंभीर सवाल उठते हैं।
  • इस घटनाक्रम ने एक बड़ा संवैधानिक प्रश्न खड़ा कर दिया है कि पीठ (बेंच) पर बैठकर सुनवाई करते समय न्यायाधीशों की अभिव्यक्ति की सीमा क्या होनी चाहिए?

न्यायिक मौखिक टिप्पणियाँ: अर्थ और प्रासंगिकता 

  • अदालती कार्यवाहियों के दौरान न्यायाधीशों द्वारा व्यक्त किए जाने वाले अनौपचारिक विचार, प्रश्न या अवलोकनों को न्यायिक मौखिक टिप्पणियाँ कहा जाता है। इनका प्राथमिक उद्देश्य निम्नलिखित होता है: 
    • कानूनी दलीलों की सत्यता और प्रामाणिकता को परखना।
    • पेचीदा तथ्यों और विधिक सिद्धांतों को सुगम बनाना।
    • किसी कानूनी निर्णय के दूरगामी और व्यावहारिक परिणामों का आकलन करना। 
    • किसी अंतिम निर्णय पर पहुँचने से पहले दोनों पक्षों के दृष्टिकोण को गहराई से समझना।
  • यहाँ यह समझना आवश्यक है कि ये मौखिक टिप्पणियाँ कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होती हैं। किसी भी अदालत का आधिकारिक और वैधानिक रुख केवल उसके हस्ताक्षरित लिखित निर्णयों और औपचारिक आदेशों में ही परिलक्षित होता है। 
  • इस महत्वपूर्ण विधिक अंतर को सर्वोच्च न्यायालय ने मुख्य चुनाव आयुक्त बनाम एम.आर. विजयभास्कर (2021) के ऐतिहासिक मामले में पूरी स्पष्टता के साथ प्रतिपादित किया था। 

विजयभास्कर निर्णय और न्यायिक आचरण के सूत्र 

  • यह बहस वर्ष 2021 में कोविड-19 महामारी के दौरान तब मुखर हुई, जब मद्रास उच्च न्यायालय ने महामारी के बीच राजनीतिक रैलियों को अनुमति देने के लिए निर्वाचन आयोग की तीखी आलोचना की थी और मौखिक रूप से यहाँ तक कह दिया था कि इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर संभवतः हत्या का मुकदमा चलना चाहिए।
  • इस पर आपत्ति जताते हुए निर्वाचन आयोग ने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और ऐसी मौखिक टिप्पणियों के मीडिया प्रसार पर रोक लगाने की गुहार लगाई। परंतु, सर्वोच्च न्यायालय ने इस मांग को अस्वीकार करते हुए खुली अदालत के सिद्धांत (Open Court Principle) और न्यायिक पारदर्शिता को सर्वोपरि माना। तथापि, देश की शीर्ष अदालत ने एक अनिवार्य वैधानिक सिद्धांत को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया:
    • किसी भी न्यायिक संस्था की प्रामाणिक और आधिकारिक राय उसके अंतिम फैसलों और आदेशों से तय होती है, न कि जजों द्वारा सुनवाई के दौरान व्यक्त किए गए तात्कालिक विचारों से। 
    • इसके साथ ही, इस निर्णय में जजों को किसी भी व्यक्ति, वर्ग या संवैधानिक संस्था के प्रति अत्यंत कटु, अमर्यादित या अनुचित शब्दावली का प्रयोग न करने की हिदायत भी दी गई थी। 
  • इस प्रकार, सर्वोच्च न्यायालय ने मौखिक अभिव्यक्तियों के दो भिन्न रूपों को स्वीकार किया 
    • पहला, वे तर्कसंगत प्रश्न जो न्याय प्रक्रिया को सुदृढ़ करते हैं, और 
    • दूसरा, वे अनावश्यक आक्षेप जो किसी को मानसिक रूप से आहत करते हैं। 

अदालती प्रश्नों (Bench Questions) का महत्व 

  • विधिक प्रक्रियाओं में तर्कों की वास्तविकता जानने के लिए न्यायाधीश अक्सर तीखे या उकसाने वाले प्रश्न पूछते हैं। यह अनिवार्य नहीं है कि पूछे गए प्रश्न अदालत के अंतिम मत का प्रतिनिधित्व करते हों। उदाहरण: सुप्रियो बनाम भारत संघ (2023) के समलैंगिक विवाह मामले की सुनवाई के दौरान पीठ की मौखिक टिप्पणियों से ऐसा प्रतीत होता था कि अदालत व्यापक लैंगिक पहचान (Gender Identity) को मान्यता देने की पक्षधर है। किंतु, जब अंतिम लिखित निर्णय आया, तो न्यायालय का विधिक रुख इससे पूरी तरह भिन्न था। 
  • यह इस बात का जीवंत प्रमाण है कि अदालती जिरह के दौरान की जाने वाली पूछताछ केवल एक विधिक कसौटी होती है, न कि किसी अंतिम निष्कर्ष का संकेत। एक जीवंत और संवैधानिक लोकतंत्र में यह अपेक्षित है कि न्यायपीठ किसी भी निर्णय पर पहुँचने से पूर्व दोनों पक्षों के तर्कों को कठोरता से जाँचे। 

न्यायिक अभिव्यक्ति की वैधानिक और नैतिक सीमाएँ 

यद्यपि न्यायाधीशों को न्यायालय कक्ष में खोजपूर्ण प्रश्न पूछने का पूर्ण अधिकार है, तथापि उनका आचरण संवैधानिक नैतिकता, संस्थागत अनुशासन और जनता के विश्वास की सीमाओं से बंधा है।

  • न्यायिक जीवन के मूल्यों का पुनर्कथन Restatement of Values of Judicial Life (1997) : भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अंगीकार की गई यह आचार संहिता न्यायाधीशों को नैतिक दिशा-निर्देश देती है। यह स्पष्ट रूप से सचेत करती है कि जजों को सार्वजनिक विवादों का हिस्सा बनने या ऐसी व्यक्तिगत राय रखने से बचना चाहिए जिससे उनकी निष्पक्षता संदेहास्पद हो जाए।  
  • बेंजामिन कार्डोज़ो का दृष्टिकोण : प्रख्यात विधिवेत्ता और न्यायाधीश बेंजामिन कार्डोज़ो का भी यही मत था कि न्यायिक विवेक को व्यक्तिगत भावनाओं या क्षणिक आवेगों के बजाय विधिक तर्कसंगतता, परंपरा और संस्थागत मर्यादा के अनुरूप संचालित होना चाहिए।
  • वस्तुतः जब किसी न्यायाधीश की भाषा अमर्यादित, व्यक्तिगत आक्षेपों से युक्त, राजनीतिक रूप से झुकी हुई या अत्यधिक भावुक प्रतीत होने लगती है, तब स्थिति गंभीर हो जाती है। चूँकि न्यायपालिका अपनी शक्ति और प्रासंगिकता जन-विश्वास से अर्जित करती है, इसलिए न्यायिक भाषा का सदैव नपा-तुला और गरिमापूर्ण होना अनिवार्य है। 

वर्तमान परिदृश्य और संस्थागत साख की चुनौती 

  • हालिया विवाद तब उपजा जब देश के मुख्य न्यायाधीश ने वरिष्ठ अधिवक्ताओं के चयन से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान कुछ लोगों के संदर्भ में अत्यधिक कठोर उपमाओं का प्रयोग किया। उन्होंने कथित तौर पर युवा लोगों की तुलना तिलचट्टों से की और कुछ वकीलों को समाज का परजीवी कह डाला। यद्यपि बाद में एक स्पष्टीकरण के माध्यम से यह साफ किया गया कि यह टिप्पणी केवल फर्जी डिग्री के सहारे वकालत करने वालों के संदर्भ में थी। 
  • फिर भी, इस घटना ने इस मूलभूत चिंता को पुनः चर्चा में ला दिया है कि क्या ऐसी विवादास्पद मौखिक टिप्पणियाँ संस्था की साख को ठेस पहुँचाती हैं; विशेषकर आज के डिजिटल युग में जब ये बातें सोशल मीडिया और समाचार माध्यमों द्वारा पलक झपकते ही प्रसारित हो जाती हैं।
  • आज के दौर में अदालती टिप्पणियाँ अंतिम फैसले से बहुत पहले ही जनसामान्य के बीच विमर्श का विषय बन जाती हैं। यह स्थिति दो महत्वपूर्ण प्राथमिकताओं के बीच संतुलन बिठाने में अवरोध उत्पन्न करती है: 
    • न्यायालय के भीतर बिना किसी संकोच के स्वतंत्र और जीवंत चर्चा का माहौल बनाए रखना।
    • न्यायिक संयम, शिष्टता और संस्थागत सम्मान को अक्षुण्ण रखना। 

यद्यपि कानूनी विशेषज्ञों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि यदि मूल रूप से की गई टिप्पणियाँ स्थापित न्यायिक व्यवहार और उच्च मानदंडों के विपरीत दिखाई देती हैं, तो केवल बाद में स्पष्टीकरण जारी कर देने से संस्थागत गरिमा को लगने वाले धक्के की पूरी भरपार्इ नहीं की जा सकती।

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