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लैटिन अमेरिका और आक्रामकता का नया दौर

संदर्भ 

लैटिन अमेरिका में अमेरिकी हस्तक्षेप का वर्तमान परिदृश्य न केवल कूटनीतिक आक्रामकता को दर्शाता है, बल्कि यह 20वीं सदी के उन पुराने ढर्रों की याद दिलाता है जहाँ संप्रभुता पर शक्ति को प्राथमिकता दी जाती थी। 

कूटनीति से दमन की ओर: एक नया प्रस्थान 

  • हाल के समय में, दूसरे डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन ने लैटिन अमेरिका के प्रति अपनी नीतियों को अत्यधिक कठोर बना दिया है। ड्रोन हमलों से लेकर आयात शुल्कों (tariffs) में वृद्धि और वेनेजुएला व क्यूबा के प्रति सैन्य आक्रामकता की धमकियाँ - ये सभी कदम एक ऐसे दौर की ओर इशारा करते हैं जिसे इतिहासकार दमनकारी दृष्टिकोण के रूप में देखते हैं। 
  • कई विश्लेषक वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के प्रति अमेरिकी रुख की तुलना 1989 में पनामा के मैनुअल नोरिएगा की गिरफ्तारी से कर रहे हैं। 
  • हालांकि, यदि गहराई से देखा जाए, तो यह नीति शीत युद्ध के हस्तक्षेपों (जैसे 1973 में चिली का तख्तापलट या 1954 में ग्वाटेमाला की कार्रवाई) से भी कहीं अधिक पुरानी है।   

रूजवेल्ट कोरोलरी और अंतरराष्ट्रीय पुलिस की भूमिका 

  • इतिहासकारों के अनुसार, वर्तमान अमेरिकी नीति 1900 से 1930 के बीच की गनबोट डिप्लोमेसी (Gunboat Diplomacy) के समान है। उस समय राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट ने रूजवेल्ट कोरोलरी के माध्यम से यह तर्क दिया था कि अमेरिका को अपने हितों की रक्षा के लिए पड़ोसी देशों में अंतरराष्ट्रीय पुलिस शक्ति के रूप में हस्तक्षेप करने का पूर्ण अधिकार है। 

प्रतिरोध का इतिहास: साम्राज्यवाद विरोधी सोच का उदय  

  • इतिहास गवाह है कि जब भी अमेरिका ने अपनी प्रभुता थोपने की कोशिश की, लैटिन अमेरिका में एक सशक्त वैचारिक प्रतिरोध का जन्म हुआ। 1920 के दशक के उत्तरार्ध में मैक्सिको सिटी से लेकर ब्यूनस आयर्स तक, छात्र संगठनों और श्रमिक संघों ने अमेरिकी शक्ति की तीखी आलोचना की।
  • पीजेंट लीग (1923): मैक्सिको के वेराक्रूज़ में श्रमिकों ने स्थानीय समस्याओं को अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ वैश्विक संघर्ष के रूप में देखा। 
  • वैचारिक प्रेरणा: मैक्सिकन क्रांति और 1917 का नया संविधान इस प्रतिरोध के स्तंभ बने, जिसने भूमि और संसाधनों के राष्ट्रीयकरण को बढ़ावा दिया।  

मैक्सिको सिटी: सक्रियता का वैचारिक केंद्र  

  • 1920 के दशक में मैक्सिको सिटी साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलनों का केंद्र बन गया। एंटी-इम्पीरियलिस्ट लीग ऑफ द अमेरिकाज़ (1925) जैसे संगठनों ने यह स्पष्ट किया कि अमेरिकी साम्राज्य यूरोपीय साम्राज्यों से अलग था। यह सीधा क्षेत्रीय नियंत्रण नहीं, बल्कि आर्थिक और वित्तीय दबावों (डॉलर कूटनीति) के माध्यम से शासन करता था।
  • पोर्टल ने लैटिन अमेरिका को अलग-अलग क्षेत्रों में विभाजित किया था, जहाँ कुछ देश निवेश के केंद्र थे और कैरिबियन जैसे क्षेत्र सीधे सैन्य हस्तक्षेप के शिकार थे। 

भविष्य की ओर: क्या इतिहास खुद को दोहराएगा ? 

  • 1920 और 30 के दशक की साम्राज्यवाद विरोधी लहर ने लैटिन अमेरिका के भविष्य के नेताओं (जैसे राउल रोआ) की पूरी पीढ़ी को तैयार किया। 
  • यद्यपि इन आंदोलनों के भीतर भी गहरे वैचारिक मतभेद थे- जैसे अंतरराष्ट्रीयता बनाम राष्ट्रवाद। लेकिन उनका मूल उद्देश्य एक ही था: अमेरिकी दबदबे का मुकाबला करना। 
  • आज, जबकि पूरा क्षेत्र एक नए राजनीतिक झुकाव की ओर बढ़ रहा है, अमेरिका का आक्रामक रुख एक बार फिर सक्रियता की नई लहर पैदा कर सकता है। इतिहास के सबक बताते हैं कि अत्यधिक दबाव अक्सर उस प्रतिरोध को जन्म देता है, जो आने वाले दशकों की राजनीति को परिभाषित करता है। 
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