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जीवन बीमा: भ्रामक मापदंड बनाम वास्तविक सुरक्षा की चुनौती

संदर्भ 

भारतीय बीमा क्षेत्र के विमर्श में प्राय: ‘अंडरइंश्योर्ड’ (Underinsured) शब्द का प्रयोग किया जाता है। इसके प्रमाण स्वरूप ‘बीमा पैठ’ (Insurance Penetration) और ‘बीमा घनत्व’ (Insurance Density) के कम स्तर को प्रस्तुत किया जाता है। हालांकि, ये आर्थिक संकेतक उद्योग की वित्तीय वृद्धि को तो दर्शाते हैं किंतु सामाजिक सुरक्षा की वास्तविक प्रभावशीलता को मापने में विफल रहते हैं। 

परिभाषा और वर्तमान समझ का संकट 

  • प्राय : ‘पैठ’ का अर्थ किसी उत्पाद की व्यापक पहुंच (Reach) से लिया जाता है किंतु बीमा के संदर्भ में इसके अर्थ भिन्न हैं-
    • बीमा पैठ (Penetration) : कुल एकत्रित प्रीमियम और सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का अनुपात
    • बीमा घनत्व (Density) : प्रति व्यक्ति औसत प्रीमियम (अमेरिकी डॉलर में)
  • समस्या : ये मानक यह नहीं बताते हैं कि कितने परिवार बीमित हैं या मृत्यु की स्थिति में उन्हें प्राप्त होने वाली राशि उनके जीवन स्तर को बनाए रखने के लिए पर्याप्त है या नहीं। 

पारंपरिक संकेतकों की सीमाएँ  

प्रीमियम-आधारित आँकड़े सुरक्षा का सटीक आकलन करने में निम्नलिखित कारणों से असमर्थ हैं -

  • GDP के साथ व्युत्क्रमानुपाती संबंध : यदि देश की अर्थव्यवस्था (बुनियादी ढांचे या निर्यात के कारण) बीमा क्षेत्र से अधिक तेजी से बढ़ती है तो बीमा पैठ का आंकड़ा गिर जाएगा, भले ही बीमा धारकों की संख्या बढ़ी हो।
  • उत्पाद मिश्रण (Product Mix) : बीमा कंपनियां उच्च प्रीमियम वाले ‘बचत या निवेश आधारित’ उत्पाद बेचकर पैठ के आंकड़े तो सुधार सकती हैं लेकिन इससे वास्तविक ‘जोखिम कवर’ (Risk Cover) में वृद्धि नहीं होती है। 
  • नियामक प्रभाव : कमीशन संरचना या नियमों में बदलाव से अल्पकालिक प्रीमियम संग्रह प्रभावित हो सकता है जिसे प्राय: गलत तरीके से खराब कवरेज मान लिया जाता है। 
  • क्रय शक्ति की उपेक्षा : बीमा घनत्व की तुलना विकसित देशों से करते समय ‘जीवन-यापन की लागत’ और ‘आय स्तर’ को नजरअंदाज कर दिया जाता है। भारत में एक छोटा प्रीमियम भी परिवार की आय के अनुपात में अधिक महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रदान कर सकता है। 

प्रीमियम बनाम वास्तविक सुरक्षा: एक विश्लेषण 

  • भारत में बीमा को ‘सुरक्षा’ के बजाय ‘बचत’ के रूप में देखने की प्रवृत्ति रही है। IRDAI की वार्षिक रिपोर्ट (2024-25) के आंकड़े इस विसंगति को स्पष्ट करते हैं - 
    • दावा निपटान : लगभग 10 लाख व्यक्तिगत मृत्यु दावों में 33,000 करोड़ का भुगतान किया गया।
    • औसत भुगतान : प्रति दावा औसत राशि मात्र 3.3 लाख रही। यद्यपि दावा निपटान अनुपात (97%) उत्कृष्ट है किंतु प्राप्त होने वाली औसत राशि किसी भी परिवार के लिए दीर्घकालिक आय प्रतिस्थापन (Income Replacement) हेतु अपर्याप्त है। 

पहुँच (Access) बनाम पर्याप्तता (Adequacy) 

  • भारत की वास्तविक समस्या बीमा तक ‘पहुँच’ की कमी नहीं है बल्कि ‘पर्याप्तता’ की कमी है। 
  • औपचारिक एवं अर्ध-औपचारिक क्षेत्रों के अधिकांश परिवारों के पास किसी-न-किसी रूप में (नियोक्ता, सरकारी योजना या व्यक्तिगत) बीमा है।
  • चुनौती यह है कि यह कवर उनकी वार्षिक आय के अनुपात में बहुत कम है। जब तक बीमा कवर आय के नुकसान की भरपाई करने में सक्षम नहीं होता है तब तक उसे ‘पूर्ण सुरक्षा’ नहीं माना जा सकता है। 

आगे की राह 

‘बीमा पैठ एवं घनत्व’ उद्योग की वृद्धि को ट्रैक करने के लिए उपयोगी हो सकते हैं किंतु इन्हें ‘सामाजिक सुरक्षा' का पैमाना नहीं बनाया जाना चाहिए। सार्वजनिक नीति के निर्धारण हेतु निम्नलिखित दृष्टिकोण आवश्यक हैं -

  • सुरक्षा अंतराल (Protection Gap) का मापन : प्रीमियम संग्रह के बजाय इस बात पर ध्यान केंद्रित किया जाए कि कितने परिवारों के पास उनकी वार्षिक आय का कम से कम 10-15 गुना कवर उपलब्ध है।
  • डेटा का एकीकरण : जनगणना, नियामक रिपोर्ट एवं सरकारी योजनाओं (जैसे- PMJJBY) के डेटा का उपयोग कर वास्तविक कवरेज का मानचित्रण किया जाए।
  • शुद्ध सुरक्षा उत्पादों को प्रोत्साहन : ‘टर्म इंश्योरेंस’ जैसे शुद्ध सुरक्षा उत्पादों के प्रति जागरूकता बढ़ाई जाए ताकि कम प्रीमियम में उच्च जीवन कवर सुनिश्चित हो सके। 
  • भारत को प्रीमियम-केंद्रित विकास से हटकर ‘सुरक्षा-केंद्रित पर्याप्तता’ की ओर बढ़ने की आवश्यकता है। वस्तुतः स्पष्ट मापन ही स्पष्ट और प्रभावी नीति-निर्माण का आधार बन सकता है। 
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