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मेटा-व्हाट्सएप डेटा मामला: डिजिटल गुलामी बनाम संप्रभुता का प्रश्न

संदर्भ 

विगत कई दशकों से सिलिकॉन वैली की दिग्गज कंपनी मेटा (Meta) उपयोगकर्ता डेटा को केवल अपने विज्ञापनों के लिए एक ‘कच्चा माल’ मानती रही है किंतु 3 फरवरी, 2026 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मेटा के डेटा एकत्रीकरण मॉडल की तुलना ‘चोरी’ से की है।

विवाद की जड़: 2021 की नीति 

  • इस कानूनी टकराव की शुरुआत साल 2021 में हुई थी, जब व्हाट्सएप ने अपनी गोपनीयता नीति में एक ‘मानो या छोड़ो’ (Take it or Leave it) वाला अपडेट जारी किया। इसमें स्पष्ट था कि उपयोगकर्ताओं का डेटा मेटा की अन्य कंपनियों के साथ साझा किया जाएगा। 
  • भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) ने इसे बाजार में प्रभुत्व का दुरुपयोग मानते हुए मेटा पर 213.14 करोड़ का जुर्माना लगाया। CCI का तर्क सीधा था कि एक औसत भारतीय के लिए व्हाट्सएप छोड़ना संभव नहीं है क्योंकि यह देश का डिजिटल इकोसिस्टम बन चुका है। 

NCLAT का बीच का रास्ता 

  • जब मेटा ने इस फैसले को राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) में चुनौती दी तो उसे मिली-जुली राहत मिली। न्यायाधिकरण ने-
    • आर्थिक दंड (Fine) को बरकरार रखा
    • किंतु डेटा साझाकरण पर लगाए गए 5 वर्ष के प्रतिबंध को हटा दिया।
    • NCLAT का मानना था कि डेटा साझा करना एक ‘मानक व्यावसायिक प्रथा’ है और नए DPDP अधिनियम 2023 को ही ऐसे मामलों को संभालना चाहिए। 

सर्वोच्च न्यायालय का कठोर रुख 

  • NCLAT के मुलायम रुख से असंतुष्ट होकर मामला जब सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा, तो न्यायाधीशों का रुख उम्मीद से कहीं अधिक कठोर था। 
  • मुख्य न्यायाधीश ने मेटा के ‘नेटवर्क प्रभाव’ पर प्रहार करते हुए कहा कि भारत में व्हाट्सएप से बाहर निकलना ‘देश से बाहर निकलने’ के समान अनिवार्य हो गया है जिसे ‘स्वैच्छिक सहमति’ नहीं कहा जा सकता है। 
  • न्यायालय ने मेटा के समक्ष स्पष्ट विकल्प रख दिया है की या तो वह व्यक्तिगत डाटा साझा करना रोकने का स्पष्ट आश्वासन दे या फिर उसकी याचिका खारिज कर दी जाएगी और उस पर कठोर शर्तें लागू होंगी। 

डेटा एकत्रीकरण मॉडल का उपभोक्ताओं पर प्रभाव 

  1. ‘सहमति’ का भ्रम और स्वायत्तता की कमी: डेटा एकत्रीकरण मॉडल प्राय: ‘डार्क पैटर्न्स’ का उपयोग करते हैं। उपभोक्ताओं को लंबे और जटिल ‘नियम एवं शर्तें’ स्वीकार करने के लिए मजबूर किया जाता है। सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार एक साधारण उपयोगकर्ता यह समझ ही नहीं पाता कि उसकी निजी बातचीत का उपयोग प्रोफाइलिंग के लिए कैसे किया जा रहा है। यहाँ सहमति स्वैच्छिक न होकर एक अनिवार्य बाध्यता बन जाती है।
  2. सूक्ष्म-लक्ष्यीकरण (Micro-Targeting) और व्यवहार संबंधी हेरफेर: कंपनियाँ उपयोगकर्ता का एक विस्तृत ‘डिजिटल अवतार’ तैयार करती हैं जिसके अंतर्गत आपकी पसंद, डर, राजनीतिक झुकाव और स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को ट्रैक किया जाता है। इसके परिणामस्वरुप आपको वही विज्ञापन या सूचनाएँ दिखाई जाती हैं जो आपके व्यवहार को प्रभावित कर सकें। इसे प्राय: ‘फिल्टर बबल’ कहा जाता है जहाँ उपयोगकर्ता केवल वही देखता है जो एल्गोरिदम उसे दिखाना चाहता है। 
  3. आर्थिक मूल्य का दोहन (Economic Exploitation): कंपनियाँ इस डेटा को परिष्कृत कर अरबों डॉलर का विज्ञापन राजस्व कमाती हैं। उपभोक्ता को सेवा तो ‘नि:शुल्क’ प्राप्त होती है किंतु उसके बदले वह अपनी सबसे कीमती संपत्ति ‘डेटा’ देता है जिसका उसे कोई प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ नहीं मिलता है। न्यायमूर्ति बागची का ‘किराया-साझाकरण’ का तर्क इसी आर्थिक असमानता की ओर इशारा करता है।
  4. निजता का क्षरण और सुरक्षा जोखिम: जब डेटा एक ही स्थान पर एकत्रित (Centralized) होता है तो जोखिम बढ़ जाता है। 
    • डेटा ब्रीच: यदि मेटा जैसे विशाल सर्वर हैक होते हैं तो करोड़ों लोगों की निजी जानकारी एक साथ खतरे में पड़ जाती है।
    • निगरानी (Surveillance): डेटा का साझाकरण व्यक्तिगत जीवन को एक ‘खुली किताब’ बना देता है जिससे राज्य या निजी संस्थाओं द्वारा निगरानी का डर बना रहता है। 
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