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माइक्रोप्लास्टिक

संदर्भ 

  • हाल ही में वी.ओ. चिदंबरम कॉलेज के शोधकर्ताओं द्वारा चेन्नई के 15 तटीय स्थानों पर किए गए अध्ययन में एक चिंताजनक प्रवृत्ति सामने आई है। यद्यपि चेन्नई के समुद्र तटों की रेत में माइक्रोप्लास्टिक (Microplastics) की सांद्रता वैश्विक औसत से कम पाई गई है, किंतु इनमें नायलॉन फाइबर की प्रधानता भविष्य के लिए एक बड़े पारिस्थितिक खतरे का संकेत देती है। 

प्रमुख निष्कर्ष: मात्रा बनाम गुणवत्ता 

  • अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि प्रदूषण की गंभीरता केवल उसकी मात्रा से नहीं, बल्कि उसके प्रकार (Type) से निर्धारित होती है :
    • संरचना : अधिकांश कण 1000 माइक्रोमीटर से छोटे फाइबर के रूप में हैं। 
    • बहुलक (Polymers) : इनमें नायलॉन फाइबर की अधिकता है, जो अन्य प्लास्टिक की तुलना में अधिक स्थायित्व और विषाक्तता रखते हैं।  
    • तुलनात्मक स्थिति : यह समस्या केवल चेन्नई तक सीमित नहीं है; गोवा और मालाबार तटों पर भी पॉलीइथिलीन और पॉलीप्रोपिलीन जैसे फाइबर की उपस्थिति दर्ज की गई है। 

पारिस्थितिक एवं स्वास्थ्य चुनौतियां 

1. समुद्री खाद्य श्रृंखला (Food Chain) पर प्रभाव :

  • निक्षेप भक्षी (Deposit Feeders) : रेत में रहने वाले केंचुए, केकड़े और शंख इन सूक्ष्म कणों को अनजाने में ग्रहण कर लेते हैं, जिससे उनके पाचन तंत्र में अवरोध उत्पन्न होता है।
  • जैव-संचयन (Bio-accumulation) : ये कण मछलियों और पक्षियों के माध्यम से अंततः खाद्य श्रृंखला के शीर्ष तक पहुँचते हैं। 

2. बेन्थिक ज़ोन (Benthic Zone) का क्षरण :

  • नायलॉन जैसे फाइबर समुद्री तल की प्राकृतिक संरचना को बदल देते हैं, जिससे सूक्ष्मजीवों का संतुलन बिगड़ जाता है और ईको-सिस्टम की कार्यक्षमता प्रभावित होती है। 

3. मानव स्वास्थ्य पर संकट :

  • समुद्री भोजन (Seafood) के माध्यम से ये प्लास्टिक कण मनुष्यों में प्रवेश कर सकते हैं, जिससे दीर्घकाल में हार्मोनल असंतुलन, प्रतिरक्षा तंत्र में गिरावट और शारीरिक सूजन (Inflammation) जैसी समस्याएं हो सकती हैं। 

प्रदूषण के मुख्य स्रोत: मानवीय हस्तक्षेप 

  • अध्ययन के अनुसार, यह प्रदूषण मुख्यतः अनियंत्रित मानवीय गतिविधियों का परिणाम है :
    • मत्स्य पालन : समुद्र में छोड़े गए नायलॉन के जाल और रस्सियों का विखंडन।
    • शहरी अपशिष्ट : सिंथेटिक कपड़ों की धुलाई से निकलने वाले फाइबर और सीवेज का समुद्र में गिरना।
    • पर्यटन : तटों पर अनियंत्रित कचरा और प्लास्टिक का जमाव। 

निवारण के उपाय 

  • विशेषज्ञों का मानना है कि चेन्नई और अन्य तटीय शहरों के पास इस संकट को शुरुआती स्तर पर रोकने का अभी भी अवसर है। इसके लिए निम्नलिखित नीतिगत कदम आवश्यक हैं : 
    • अपशिष्ट प्रबंधन : तटीय क्षेत्रों में ठोस कचरा प्रबंधन (Solid Waste Management) को कड़ाई से लागू करना।
    • सतत मत्स्य पालन : मछली पकड़ने के उपकरणों के पुनर्चक्रण (Recycling) और जैव-अपघट्य (Biodegradable) विकल्पों को बढ़ावा देना।
    • जन भागीदारी : स्थानीय समुदायों और पर्यटकों के बीच प्लास्टिक के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूकता पैदा करना। 

निष्कर्ष

  • चेन्नई के तटों पर माइक्रोप्लास्टिक की कम उपस्थिति एक 'भ्रामक सुरक्षा' (False sense of security) दे सकती है। वास्तविकता यह है कि ये सूक्ष्म फाइबर दीर्घकालिक और अपरिवर्तनीय क्षति पहुँचाने में सक्षम हैं। समय रहते प्रभावी हस्तक्षेप ही हमारे तटीय पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा कर सकता है।
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