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राष्ट्रीय सतत तटीय प्रबंधन केंद्र (NCSCM) - आर्द्रभूमियों का सत्यापन और संरक्षण

चर्चा में क्यों ?

  • हाल ही में राष्ट्रीय सतत तटीय प्रबंधन केंद्र (NCSCM) National Centre for Sustainable Coastal Management ने महाराष्ट्र राज्य की कुल 23,415 आर्द्रभूमियों (Wetlands) में से 23,404 आर्द्रभूमियों का दस्तावेजीकरण, उपग्रह आधारित मानचित्रण तथा जमीनी स्तर पर सत्यापन (Ground-truthing) पूरा कर लिया है। केवल 11 आर्द्रभूमियां, जो मुख्य रूप से पुणे जिले में स्थित हैं, अभी भी मैदानी सत्यापन की प्रक्रिया में हैं।
  • इस प्रक्रिया के पूर्ण होने के साथ ही इन आर्द्रभूमियों को आर्द्रभूमि (संरक्षण एवं प्रबंधन) नियम, 2017 [Wetlands (Conservation and Management) Rules] के अंतर्गत अधिसूचित कर उन्हें औपचारिक कानूनी संरक्षण प्रदान करने का मार्ग प्रशस्त हो गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम महाराष्ट्र के आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण तथा जलवायु परिवर्तन अनुकूलन की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण साबित होगा।

क्या है ग्राउंड-ट्रुथिंग (Ground-truthing) ?

ग्राउंड-ट्रुथिंग एक वैज्ञानिक एवं प्रशासनिक प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत किसी आर्द्रभूमि की मैदानी स्तर पर प्रत्यक्ष जांच और सत्यापन किया जाता है, ताकि उपग्रह चित्रों, रिमोट सेंसिंग डेटा और वास्तविक स्थल स्थिति के बीच सामंजस्य स्थापित किया जा सके।

इस प्रक्रिया के दौरान निम्न पहलुओं का विस्तृत मूल्यांकन किया जाता है —

आर्द्रभूमि का वास्तविक अस्तित्व एवं क्षेत्रफल निर्धारण

  • यह सुनिश्चित किया जाता है कि उपग्रह चित्रों में दिखाई देने वाला जल क्षेत्र वास्तव में मौजूद है या नहीं तथा उसका वास्तविक विस्तार कितना है।

सीमाओं (Boundaries) का निर्धारण

  • आर्द्रभूमि की भौगोलिक सीमा, जल फैलाव क्षेत्र तथा आसपास की भूमि उपयोग स्थिति का अध्ययन किया जाता है।

पारिस्थितिक स्थिति (Ecological Condition) का मूल्यांकन

  • वनस्पति, जैव विविधता, जल गुणवत्ता तथा पारिस्थितिक स्वास्थ्य की स्थिति का आकलन किया जाता है।

वर्तमान भूमि उपयोग एवं मानवीय हस्तक्षेप

  • यह देखा जाता है कि क्षेत्र में अतिक्रमण, मलबा भराव, निर्माण गतिविधियां अथवा अन्य मानवीय दबाव मौजूद हैं या नहीं।

उपग्रह आंकड़ों का सत्यापन

  • रिमोट सेंसिंग एवं GIS से प्राप्त आंकड़ों का वास्तविक भौतिक स्थिति से मिलान किया जाता है।
  • ग्राउंड-ट्रुथिंग इसलिए अत्यंत आवश्यक मानी जाती है क्योंकि इसके बिना किसी आर्द्रभूमि को पर्यावरणीय कानूनों के अंतर्गत अधिसूचित नहीं किया जा सकता।

राष्ट्रीय सतत तटीय प्रबंधन केंद्र (NCSCM) : 

नेशनल सेंटर फॉर सस्टेनेबल कोस्टल मैनेजमेंट को 2011 में मिनिस्ट्री ऑफ़ एनवायरनमेंट, फॉरेस्ट एंड क्लाइमेट चेंज ने एक ऑटोनॉमस रिसर्च और पॉलिसी बॉडी के तौर पर शुरू किया था।इस संस्था का उद्देश्य भारत के तटीय एवं समुद्री क्षेत्रों के संरक्षण, सतत उपयोग, पुनर्वास तथा वैज्ञानिक प्रबंधन में सहायता प्रदान करना है।

मुख्यालय :- चेन्नई, तमिलनाडु

NCSCM के लक्ष्य एवं उद्देश्य :-

तटीय क्षेत्रों के संरक्षण एवं सतत विकास को बढ़ावा देना

  • संस्था तटीय क्षेत्रों के पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने तथा प्राकृतिक संसाधनों के दीर्घकालिक संरक्षण हेतु कार्य करती है।

तटीय एवं समुद्री क्षेत्रों का एकीकृत प्रबंधन

  • भारत में Integrated Coastal Zone Management (ICZM) की अवधारणा को लागू करने में सहायता प्रदान करना इसका प्रमुख उद्देश्य है।

तटीय समुदायों के सामाजिक-आर्थिक हितों की रक्षा

  • संस्था पारंपरिक तटीय एवं द्वीपीय समुदायों के आजीविका, संसाधनों और कल्याण को ध्यान में रखते हुए नीतिगत सुझाव प्रदान करती है।

सरकारों को वैज्ञानिक एवं नीतिगत सलाह

  • केंद्र एवं राज्य सरकारों को तटीय प्रबंधन, समुद्री संसाधनों और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मामलों में तकनीकी सहायता दी जाती है।

अनुसंधान एवं क्षमता निर्माण

  • तटीय संसाधनों, समुद्री पारिस्थितिकी और जलवायु परिवर्तन पर अध्ययन एवं शोध कार्य संचालित किए जाते हैं।

NCSCM के प्रमुख अनुसंधान विभाग

1. भूस्थानिक विज्ञान, रिमोट सेंसिंग एवं GIS विभाग

  • यह विभाग उपग्रह मानचित्रण, भू-स्थानिक विश्लेषण, तटीय क्षेत्र मानचित्रण तथा आर्द्रभूमियों के दस्तावेजीकरण का कार्य करता है।

2. एकीकृत सामाजिक विज्ञान एवं अर्थशास्त्र विभाग

  • तटीय समुदायों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति, आजीविका एवं संसाधन उपयोग का अध्ययन करता है।

3. तटीय पर्यावरण प्रभाव आकलन विभाग

  • विभिन्न विकास परियोजनाओं के तटीय पारिस्थितिकी पर पड़ने वाले प्रभावों का मूल्यांकन किया जाता है।

4. तटीय एवं समुद्री संसाधन संरक्षण विभाग

  • समुद्री जैव विविधता, प्रवाल भित्तियों, मैंग्रोव और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण हेतु कार्य करता है।

5. ज्ञान, शासन एवं नीति विभाग

  • नीति निर्माण, संस्थागत समन्वय तथा पर्यावरणीय प्रशासन को सुदृढ़ बनाने का कार्य करता है।

6. भविष्योन्मुखी अनुसंधान एवं एकीकृत द्वीप प्रबंधन इकाई

  • जलवायु परिवर्तन, द्वीपीय पारिस्थितिकी और दीर्घकालिक तटीय प्रबंधन रणनीतियों पर अनुसंधान किया जाता है।

आर्द्रभूमियों का पारिस्थितिक महत्व

आर्द्रभूमियों को पृथ्वी के सबसे उत्पादक पारिस्थितिकी तंत्रों में शामिल किया जाता है क्योंकि वे अनेक महत्वपूर्ण पर्यावरणीय सेवाएं प्रदान करती हैं।

बाढ़ नियंत्रण (Flood Buffering)

  • ये अतिरिक्त वर्षा जल को संग्रहित कर शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में बाढ़ की तीव्रता कम करती हैं।

प्राकृतिक जल निकासी प्रणाली

  • आर्द्रभूमियां प्राकृतिक ड्रेनेज नेटवर्क के रूप में कार्य करती हैं और जलभराव को नियंत्रित करती हैं।

भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge)

  • ये भूजल स्तर को बनाए रखने तथा जल उपलब्धता बढ़ाने में सहायता करती हैं।

कार्बन पृथक्करण (Carbon Sequestration)

  • आर्द्रभूमियां कार्बन को अवशोषित कर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में योगदान देती हैं।

जैव विविधता संरक्षण

  • ये प्रवासी पक्षियों, जलीय जीवों तथा विभिन्न वनस्पतियों का प्राकृतिक आवास हैं।

जलवायु परिवर्तन अनुकूलन

  • अत्यधिक वर्षा, समुद्री स्तर वृद्धि और चरम मौसम घटनाओं के प्रभावों को कम करने में सहायक होती हैं।

आगे की राह

  • सत्यापित आर्द्रभूमियों को शीघ्र अधिसूचित किया जाए। 
  • कानूनी संरक्षण लागू कर अतिक्रमण पर नियंत्रण किया जाए। 
  • शहरी नियोजन में आर्द्रभूमियों को प्राकृतिक जल निकासी तंत्र के रूप में शामिल किया जाए। 
  • जलवायु परिवर्तन नीतियों में आर्द्रभूमि संरक्षण को प्राथमिकता दी जाए। 
  • स्थानीय समुदायों की भागीदारी बढ़ाकर संरक्षण मॉडल विकसित किए जाएं।
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