ग्राउंड-ट्रुथिंग एक वैज्ञानिक एवं प्रशासनिक प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत किसी आर्द्रभूमि की मैदानी स्तर पर प्रत्यक्ष जांच और सत्यापन किया जाता है, ताकि उपग्रह चित्रों, रिमोट सेंसिंग डेटा और वास्तविक स्थल स्थिति के बीच सामंजस्य स्थापित किया जा सके।
इस प्रक्रिया के दौरान निम्न पहलुओं का विस्तृत मूल्यांकन किया जाता है —
आर्द्रभूमि की भौगोलिक सीमा, जल फैलाव क्षेत्र तथा आसपास की भूमि उपयोग स्थिति का अध्ययन किया जाता है।
वनस्पति, जैव विविधता, जल गुणवत्ता तथा पारिस्थितिक स्वास्थ्य की स्थिति का आकलन किया जाता है।
यह देखा जाता है कि क्षेत्र में अतिक्रमण, मलबा भराव, निर्माण गतिविधियां अथवा अन्य मानवीय दबाव मौजूद हैं या नहीं।
नेशनल सेंटर फॉर सस्टेनेबल कोस्टल मैनेजमेंट को 2011 में मिनिस्ट्री ऑफ़ एनवायरनमेंट, फॉरेस्ट एंड क्लाइमेट चेंज ने एक ऑटोनॉमस रिसर्च और पॉलिसी बॉडी के तौर पर शुरू किया था।इस संस्था का उद्देश्य भारत के तटीय एवं समुद्री क्षेत्रों के संरक्षण, सतत उपयोग, पुनर्वास तथा वैज्ञानिक प्रबंधन में सहायता प्रदान करना है।
मुख्यालय :- चेन्नई, तमिलनाडु
संस्था तटीय क्षेत्रों के पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने तथा प्राकृतिक संसाधनों के दीर्घकालिक संरक्षण हेतु कार्य करती है।
भारत में Integrated Coastal Zone Management (ICZM) की अवधारणा को लागू करने में सहायता प्रदान करना इसका प्रमुख उद्देश्य है।
संस्था पारंपरिक तटीय एवं द्वीपीय समुदायों के आजीविका, संसाधनों और कल्याण को ध्यान में रखते हुए नीतिगत सुझाव प्रदान करती है।
केंद्र एवं राज्य सरकारों को तटीय प्रबंधन, समुद्री संसाधनों और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मामलों में तकनीकी सहायता दी जाती है।
तटीय संसाधनों, समुद्री पारिस्थितिकी और जलवायु परिवर्तन पर अध्ययन एवं शोध कार्य संचालित किए जाते हैं।
यह विभाग उपग्रह मानचित्रण, भू-स्थानिक विश्लेषण, तटीय क्षेत्र मानचित्रण तथा आर्द्रभूमियों के दस्तावेजीकरण का कार्य करता है।
तटीय समुदायों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति, आजीविका एवं संसाधन उपयोग का अध्ययन करता है।
विभिन्न विकास परियोजनाओं के तटीय पारिस्थितिकी पर पड़ने वाले प्रभावों का मूल्यांकन किया जाता है।
समुद्री जैव विविधता, प्रवाल भित्तियों, मैंग्रोव और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण हेतु कार्य करता है।
नीति निर्माण, संस्थागत समन्वय तथा पर्यावरणीय प्रशासन को सुदृढ़ बनाने का कार्य करता है।
जलवायु परिवर्तन, द्वीपीय पारिस्थितिकी और दीर्घकालिक तटीय प्रबंधन रणनीतियों पर अनुसंधान किया जाता है।
आर्द्रभूमियों को पृथ्वी के सबसे उत्पादक पारिस्थितिकी तंत्रों में शामिल किया जाता है क्योंकि वे अनेक महत्वपूर्ण पर्यावरणीय सेवाएं प्रदान करती हैं।
ये अतिरिक्त वर्षा जल को संग्रहित कर शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में बाढ़ की तीव्रता कम करती हैं।
आर्द्रभूमियां प्राकृतिक ड्रेनेज नेटवर्क के रूप में कार्य करती हैं और जलभराव को नियंत्रित करती हैं।
ये भूजल स्तर को बनाए रखने तथा जल उपलब्धता बढ़ाने में सहायता करती हैं।
आर्द्रभूमियां कार्बन को अवशोषित कर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में योगदान देती हैं।
ये प्रवासी पक्षियों, जलीय जीवों तथा विभिन्न वनस्पतियों का प्राकृतिक आवास हैं।
अत्यधिक वर्षा, समुद्री स्तर वृद्धि और चरम मौसम घटनाओं के प्रभावों को कम करने में सहायक होती हैं।
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