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अतिचालकता में प्रेशर क्वेंचिंग तकनीक

संदर्भ 

  • पिछले एक सदी से भौतिकी के क्षेत्र में एक प्रमुख लक्ष्य ऐसा पदार्थ खोजने का रहा है जो कमरे के तापमान पर बिना किसी प्रतिरोध के विद्युत प्रवाहित कर सके। यदि ऐसा संभव होता है तो यह ऊर्जा उत्पादन, संचरण एवं उपयोग की वर्तमान प्रणालियों में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है। अब तक सामान्य दाब पर अतिचालकता  (Superconductivity) प्राप्त करने का अधिकतम तापमान लगभग -140°C तक सीमित रहा है जबकि कुछ पदार्थ उच्च तापमान पर अतिचालक बनते हैं किंतु इसके लिए अत्यधिक दाब आवश्यक होता है। 
  • हाल ही में, प्रोसीडिंग्स ऑफ़ द नेशनल एकेडमी ऑफ़ साइंसेज (Proceedings of the National Academy of Sciences) में प्रकाशित एक अध्ययन में वैज्ञानिकों ने सामान्य दाब पर ही इस सीमा को 18°C तक बढ़ाने का दावा किया है। इस उपलब्धि के लिए प्रेशर क्वेंचिंग नामक नई तकनीक का प्रयोग किया गया।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उपलब्धि

  • यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसने 1993 से चले आ रहे रिकॉर्ड को तोड़ा है। उस समय Hg1223 नामक तांबा-ऑक्साइड पदार्थ में -140°C पर अतिचालकता प्राप्त की गई थी, जिसने इस क्षेत्र में अनुसंधान को नई दिशा दी थी। 
  • वर्तमान अध्ययन उसी पदार्थ के एक संशोधित रूप पर आधारित है जिससे यह स्पष्ट होता है कि नई खोज पूरी तरह नए पदार्थों पर निर्भर नहीं है बल्कि मौजूदा पदार्थों के गुणों के बेहतर उपयोग पर भी आधारित हो सकती है।

अतिचालकता का व्यावहारिक महत्व 

  • अतिचालक पदार्थों का सबसे बड़ा लाभ यह है कि वे बिना ऊर्जा हानि के विद्युत का संचरण कर सकते हैं। वर्तमान में विद्युत ग्रिड में प्रतिरोध के कारण भारी मात्रा में ऊर्जा नष्ट होती है। यदि इस समस्या का समाधान हो जाए तो ऊर्जा दक्षता में उल्लेखनीय सुधार संभव है।
  • इसके अतिरिक्त, अतिचालकता के उपयोग से उन्नत चिकित्सा उपकरण (जैसे- MRI), अधिक दक्ष इलेक्ट्रिक मोटर, उच्च गति परिवहन प्रणाली तथा सस्ती नवीकरणीय ऊर्जा अवसंरचना विकसित की जा सकती है। 

शोध की प्रकृति और वैज्ञानिक दृष्टिकोण 

  • यह अध्ययन लियांगज़ी डेंग और चिंग-वू चू के नेतृत्व में ह्यूस्टन विश्वविद्यालय में किया गया। 
  • विशेषज्ञ सुमित मजूमदार ने इस अध्ययन को तार्किक बताते हुए कहा कि वैज्ञानिकों ने उच्च-दबाव अवस्थाओं का व्यवस्थित अध्ययन किया और ‘प्रेशर क्वेंचिंग’ के माध्यम से उन्हें सामान्य परिस्थितियों में बनाए रखने का प्रयास किया। 

मुख्य चुनौती : उच्च दाब पर निर्भरता 

अब तक उच्च तापमान वाली अतिचालकता प्राप्त करने में सबसे बड़ी बाधा अत्यधिक दाब की आवश्यकता रही है। कई प्रयोगों में 13°C तक अतिचालकता प्राप्त की गई किंतु इसके लिए पृथ्वी के केंद्र के समान दबाव की आवश्यकता पड़ी। जैसे ही यह दबाव हटाया गया अतिचालकता समाप्त हो गई, जिससे इसका व्यावहारिक उपयोग संभव नहीं हो सका। 

प्रेशर क्वेंचिंग: एक नवीन तकनीक 

  • इस अध्ययन की प्रमुख विशेषता ‘प्रेशर-क्वेंच प्रोटोकॉल’ (PQP) है जिसमें तीन चरण शामिल हैं :
    • अत्यधिक दाब (लगभग 30 GPa) लागू करना 
    • अत्यंत निम्न तापमान (-269°C) तक ठंडा करना 
    • तत्पश्चात तेजी से दाब हटाना 
  • इस प्रक्रिया के दौरान निम्न तापमान के कारण पदार्थ के परमाणु अपनी मूल संरचना में वापस नहीं लौट पाते हैं जिससे उच्च-दबाव की अवस्था स्थिर हो जाती है। 

प्रमुख परिणाम 

  • विभिन्न परीक्षणों में वैज्ञानिकों ने -122°C से -134°C के बीच अतिचालकता को बनाए रखने में सफलता प्राप्त की। -122°C का मान पिछले रिकॉर्ड से 18°C अधिक है जो एक महत्वपूर्ण प्रगति है। 
  • आर्गन राष्ट्रीय प्रयोगशाला में किए गए विश्लेषण से यह ज्ञात हुआ कि पदार्थ की संरचना में सूक्ष्म दोष और आंतरिक तनाव उत्पन्न हो जाते हैं जो इस अवस्था को बनाए रखने में सहायक होते हैं। 
  • महत्वपूर्ण रूप से लगभग 78% पदार्थ का आयतन अतिचालक पाया गया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह प्रभाव केवल सतही नहीं है बल्कि संपूर्ण (Bulk) स्तर पर है। 

सीमाएँ और चुनौतियाँ

हालाँकि, यह उपलब्धि महत्वपूर्ण है परंतु इसकी कुछ सीमाएँ भी हैं। यह अवस्था केवल अत्यंत निम्न तापमान पर ही स्थिर रहती है और तापमान बढ़ने पर इसका प्रभाव घटने लगता है। कमरे के तापमान पर यह पूरी तरह स्थिर नहीं रह पाती है।

ऐतिहासिक योगदान और संदर्भ 

चिंग-वू चू का इस क्षेत्र में योगदान उल्लेखनीय रहा है। 1987 में उन्होंने YBCO पदार्थ में -180°C पर अतिचालकता प्रदर्शित की थी जिससे सस्ते शीतलक (तरल नाइट्रोजन) के उपयोग का मार्ग प्रशस्त हुआ। उसी वर्ष अमेरिकन फिजिकल सोसाइटी की एक ऐतिहासिक बैठक, जिसे ‘भौतिकी का वुडस्टॉक’ कहा गया, इस क्षेत्र के महत्व को दर्शाती है। 

विवाद और वैज्ञानिक सतर्कता 

  • हाल के वर्षों में अतिचालकता के क्षेत्र में कुछ विवादास्पद दावे भी सामने आए हैं। रंगा डायस के शोध को बाद में वापस लेना पड़ा, जबकि दक्षिण कोरिया के LK-99 जैसे पदार्थों के दावे भी सत्यापित नहीं हो सके। 
  • इन घटनाओं के कारण वैज्ञानिक समुदाय अब नए शोधों के प्रति अधिक सतर्क हो गया है और पुनरुत्पादन (Reproducibility) तथा विश्वसनीयता पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। 

निष्कर्ष 

  • यह अध्ययन न केवल 33 वर्षों पुराने रिकॉर्ड को तोड़ता है बल्कि एक नई दिशा भी प्रस्तुत करता है जोकि उच्च दाब में प्राप्त गुणों को सामान्य परिस्थितियों में स्थिर करने की है।
  • यद्यपि यह अभी कमरे के तापमान पर पूर्णतः सफल नहीं है, फिर भी यह भविष्य में व्यावहारिक एवं व्यापक रूप से उपयोगी सुपरकंडक्टर विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
  • इस प्रकार यह शोध न केवल वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि ऊर्जा, परिवहन एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में संभावित क्रांतिकारी परिवर्तन का आधार भी बन सकता है। 
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