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भारतीय राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व

संदर्भ  

  • हाल ही में लोकसभा द्वारा संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण के संवैधानिक संशोधन विधेयक को खारिज किया जाना, भारतीय लोकतंत्र में लैंगिक समानता के संघर्ष को एक बड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है। ऐतिहासिक आंकड़े गवाह हैं कि भारतीय विधायिकाओं में महिलाओं की उपस्थिति 15% के स्तर को भी मुश्किल से छू पाई है, जो राजनीतिक सशक्तिकरण की दिशा में एक गहरी खाई को दर्शाता है। 

संसदीय प्रतिनिधित्व 

भारतीय संसद में महिलाओं की भागीदारी का ग्राफ बेहद धीमी गति से आगे बढ़ा है :

  • लोकसभा का सफर : जहाँ 1951-52 (पहली लोकसभा) में महिला प्रतिनिधित्व मात्र 4.9% था, वह सात दशकों के बाद 18वीं लोकसभा (2024-29) में केवल 13.6% तक ही पहुँच सका है। 
  • ऐतिहासिक उतार-चढ़ाव : भारतीय संसदीय इतिहास में सर्वाधिक प्रतिनिधित्व 14.36% (2019-24) रहा है, जबकि न्यूनतम स्तर 3.5% (1977-79) दर्ज किया गया था। 
  • धीमी रफ्तार : चिंताजनक तथ्य यह है कि महिलाओं को 10% के सांकेतिक आंकड़े को पार करने में ही 15 आम चुनाव लग गए। 

वस्तुतः वर्तमान में राज्यसभा की स्थिति (लगभग 16%) लोकसभा से मामूली रूप से बेहतर है, लेकिन यह भी वास्तविक समानता से कोसों दूर है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह सुधार किसी संस्थागत नियम के बजाय राजनीतिक दलों के नेतृत्व की इच्छाशक्ति पर अधिक निर्भर करता है।

राज्यों की स्थिति: छत्तीसगढ़ बना अपवाद 

देश की 31 विधानसभाओं और केंद्र शासित प्रदेशों का परिदृश्य और भी अधिक निराशाजनक है। अधिकांश राज्यों में महिलाओं की भागीदारी नगण्य बनी हुई है :

  • अग्रणी राज्य : छत्तीसगढ़ (21.1%) देश का एकमात्र ऐसा राज्य है जिसने 15% की सीमा को पार किया है। इसके बाद त्रिपुरा (15%) और झारखंड (14.8%) का स्थान आता है।
  • चिंताजनक आंकड़े : गुजरात (7.7%), महाराष्ट्र (7.6%) और कर्नाटक (4.5%) जैसे बड़े और विकसित राज्यों में महिला विधायकों की संख्या दहाई के आंकड़े तक भी नहीं पहुँच पाई है। 
  • सकारात्मक संकेत : नगालैंड ने 2023 में अपनी पहली महिला विधायक चुनकर एक रूढ़िवादी राजनीतिक दीवार को ढहाने की शुरुआत की है। 

वैश्विक रैंकिंग में भारत का पिछड़ना 

अप्रैल 2026 के इंटर-पार्लियामेंट्री यूनियन (IPU) के आंकड़ों ने वैश्विक मंच पर भारत की स्थिति पर सवाल खड़े कर दिए हैं :

  • रैंकिंग : निचले सदनों (Lower Houses) में महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मामले में भारत दुनिया में 147वें स्थान पर है।
  • वैश्विक मानक : जहाँ दुनिया के 56 देशों में 33% से अधिक महिला प्रतिनिधित्व है, वहीं रवांडा, क्यूबा और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों ने 50% से अधिक की हिस्सेदारी के साथ मिसाल पेश की है।

महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी के बुनियादी कारक  

1. हानिकारक सामाजिक मानदंड और हिंसा 

  • समाज में व्याप्त हानिकारक मानदंड और लिंग आधारित हिंसा महिलाओं के राजनीतिक सफर में सबसे बड़ी रुकावट हैं। 
  • मीडिया अक्सर ऐसी रूढ़ियों को बढ़ावा देता है जो यह दर्शाती हैं कि महिलाएँ पुरुषों की तुलना में कम सक्षम या कम वैध नेता हैं।
  • वर्तमान डिजिटल युग में, राजनीति में सक्रिय महिलाओं को जान से मारने, बलात्कार और शारीरिक हिंसा की ऑनलाइन धमकियों का सामना करना पड़ता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के उदय ने इस प्रकार के दुर्व्यवहार और डीपफेक जैसी चुनौतियों के दायरे को और अधिक बढ़ा दिया है। 

2. संस्थागत उत्पीड़न 

  • संयुक्त राष्ट्र महिला (UN Women) द्वारा जॉर्डन, लेबनान, नेपाल, फिलिस्तीन और ट्यूनीशिया में किए गए सर्वेक्षणों ने एक चौंकाने वाला सच उजागर किया है।
  • महिला पदाधिकारियों ने बताया कि उन्हें सबसे अधिक मनोवैज्ञानिक हिंसा का सामना करना पड़ता है। इसके बाद यौन और आर्थिक हिंसा का स्थान आता है।
  • आर्थिक हिंसा के रूप में महिलाओं को अक्सर वेतन, उचित कार्यालय स्थान और आवश्यक उपकरणों जैसे संसाधनों से वंचित रखा जाता है। 
  • चिंताजनक बात यह है कि महिला पदाधिकारियों को सबसे अधिक उत्पीड़न उन्हीं सरकारी संस्थानों के भीतर झेलना पड़ता है जहाँ वे कार्यरत हैं, जबकि उनके घर और समुदाय भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं।

3. चुनावी प्रणाली और राजनीतिक दलों का विरोध

  • कई राजनीतिक दल महिलाओं को नेता या उम्मीदवार के रूप में स्वीकार करने का आंतरिक रूप से विरोध करते हैं।
  • विजेता सब कुछ ले जाता है (First-past-the-post) जैसी चुनावी प्रणालियाँ अक्सर महिलाओं के लिए समान स्तर पर प्रतिस्पर्धा करना कठिन बना देती हैं। 

4. संसाधनों और वित्तीय नेटवर्क की कमी 

  • पुरुषों की तुलना में महिलाओं की पहुँच राजनीतिक संरक्षण और बड़े वित्तीय नेटवर्क तक बहुत कम होती है।
  • विकासशील देशों में स्थिति इतनी विकट है कि कई बार महिलाएँ मामूली उम्मीदवार पंजीकरण शुल्क वहन करने में असमर्थ होने के कारण चुनाव लड़ने से वंचित रह जाती हैं। 

समाधान का मार्ग: कोटा और संस्थागत सुधार 

वैश्विक डेटा स्पष्ट करता है कि जिन देशों ने उन्नति की है, वहां तीन प्रमुख कारक सक्रिय रहे हैं :

  • संवैधानिक कोटा : 2024 के आंकड़े बताते हैं कि आरक्षण वाले देशों में महिला प्रतिनिधित्व 31.2% है, जबकि बिना आरक्षण वाले देशों में यह मात्र 16.8% है। 
  • चुनावी सुधार : समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणालियों का अपनाया जाना।
  • सुरक्षित वातावरण : राजनीति में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा को रोकने के कड़े उपाय। 

निष्कर्ष   

  • भारत में पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना और ढांचागत बाधाएं महिलाओं की राजनीतिक पहुंच को सीमित करती हैं। वैश्विक रैंकिंग में सुधार और वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना के लिए अब केवल इच्छाशक्ति पर्याप्त नहीं है; इसके लिए नारी शक्ति वंदन जैसे मजबूत संस्थागत सुधारों और कोटा प्रणाली की अनिवार्य आवश्यकता है।
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