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पुन: प्रयोज्य तकनीक और अंतरिक्ष मिशनों की लागत में कमी

संदर्भ 

  • चार दशकों तक अंतरिक्ष अन्वेषण सरकारों के नेतृत्व में संचालित होता रहा है किन्तु नए सहस्राब्दी के साथ ही इस क्षेत्र में एक वाणिज्यिक क्रांति का उदय हुआ है। वर्तमान में निजी कंपनियाँ न केवल अंतरिक्ष उद्योग की प्रमुख उपलब्धियों का नेतृत्व कर रही हैं बल्कि उनके लिए आवश्यक पूँजी और तकनीकी नवाचार भी उपलब्ध करा रही हैं। परिणामस्वरूप अंतरिक्ष क्षेत्र तेजी से विस्तार करता हुआ उद्योग बन गया है जिसके 2030 तक 1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक मूल्य तक पहुँचने की संभावना व्यक्त की जा रही है।
  • इन नए हितधारकों ने विशेष रूप से रॉकेटों की आंशिक पुनः-प्रयोज्यता जैसी नवोन्मेषी तकनीकों को अपनाकर अंतरिक्ष तक पहुँच की लागत में क्रांतिकारी कमी लाई है। पारंपरिक इस्तेमाल होने वाले रॉकेट की तुलना में अब प्रति किलोग्राम प्रक्षेपण लागत 5 से 20 गुना तक घट चुकी है, वहीं प्रक्षेपण की आवृत्ति और गति में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। 

मानव मिशनों एवं उपग्रह मिशनों की लागत में अंतर

  • मानव अंतरिक्ष मिशन, उपग्रह प्रक्षेपणों की तुलना में तीन से पाँच गुना अधिक खर्चीले होते हैं। इसका प्रमुख कारण यह है कि मानव को अंतरिक्ष में भेजने के लिए जीवन-रक्षक प्रणालियाँ, उच्च स्तर की सुरक्षा व्यवस्था, अतिरिक्त बैकअप सिस्टम और विस्तृत मिशन योजना की आवश्यकता होती है। इन सभी व्यवस्थाओं के लिए उन्नत प्रौद्योगिकी और मजबूत बुनियादी ढांचे में भारी निवेश करना पड़ता है। 
  • इसके विपरीत अधिकांश उपग्रह मिशन अपेक्षाकृत सरल हार्डवेयर तथा सॉफ्टवेयर ढाँचों पर आधारित होते हैं जिससे उनकी लागत सीमित रहती है।
  • वायुमंडल से गुजरते हुए कक्षा तक पहुँचने के दौरान रॉकेट्स को दो बड़ी चुनौतियों ‘गुरुत्वाकर्षण बल’ और ‘वायुगतिकीय प्रतिरोध’ का सामना करना पड़ता है। चूँकि अंतरिक्ष में आगे बढ़ने के लिए रॉकेट के पास किसी सतह को धकेलने का माध्यम नहीं होता है, इसलिए उसे इंजन से निकलने वाले गैस प्रवाह को सुपरसोनिक जेट के रूप में पीछे की ओर छोड़ना पड़ता है, जिससे आगे की गति प्राप्त होती है।

त्सिओलकोव्स्की रॉकेट समीकरण 

  • त्सिओलकोव्स्की रॉकेट समीकरण (Tsiolkovsky Rocket Equation) वैज्ञानिक रूप से रॉकेट की गति, उसके ईंधन की मात्रा और कुल भार के बीच संबंध दर्शाता है। 
  • यह समीकरण अंतरिक्ष यात्रा की एक मूलभूत समस्या के रूप में ‘वजन के दुष्चक्र’ की ओर संकेत करता है। ईंधन स्वयं इतना भारी होता है कि उसे उठाने के लिए भी अतिरिक्त ईंधन चाहिए। परिणामस्वरूप, रॉकेट के कुल द्रव्यमान का 90% से अधिक हिस्सा केवल प्रणोदक और ईंधन टैंकों में चला जाता है जबकि वास्तविक उपग्रह या पेलोड के लिए 4% से भी कम स्थान बच पाता है। 

रॉकेट में स्टेज (Stages) की आवश्यकता 

स्टेजिंग

  • रॉकेट प्रौद्योगिकी में ‘स्टेजिंग’ अत्यंत महत्वपूर्ण इंजीनियरिंग अवधारणा है। इसके तहत पूरे रॉकेट को कई स्वतंत्र प्रणोदन इकाइयों (स्टेज) में बाँटा जाता है। जैसे-जैसे किसी स्टेज का ईंधन समाप्त होता है उसे उड़ान के दौरान अलग कर दिया जाता है। इससे रॉकेट पर अनावश्यक भार कम होता है और शेष रॉकेट अधिक कुशलता से आगे बढ़ पाता है।
  • यह तकनीक प्रसिद्ध त्सिओलकोव्स्की रॉकेट समीकरण की उस चुनौती से निपटने का व्यावहारिक समाधान है जिसमें ईंधन का भार स्वयं एक बड़ी समस्या बन जाता है। 
  • वस्तुतः उपयोग हो चुके स्टेज को अलग करने से शेष वाहन का प्रणोदक-से-द्रव्यमान अनुपात बेहतर होता है जिससे रॉकेट को अपेक्षाकृत कम ईंधन में अधिक वेग प्राप्त करने में मदद मिलती है।
  • भारत के पी.एस.एल.वी. एवं एल.वी.एम.-3 जैसे पारंपरिक रॉकेट्स में प्रत्येक स्टेज का उपयोग केवल एक बार किया जाता है। मिशन पूरा होने के बाद ये त्याग दिए जाते हैं और सामान्यतः समुद्र में गिर जाते हैं। 

स्पेसएक्स और पुनः प्रयोज्यता की अवधारणा 

  • निजी कंपनी स्पेसएक्स ने रॉकेट प्रौद्योगिकी में क्रांतिकारी बदलाव किए हैं। कंपनी ने- 
    • रॉकेट के पुर्ज़ों की 3-डी प्रिंटिंग, मॉड्यूलर डिज़ाइन, 
    • अधिकांश घटकों का आंतरिक निर्माण (वर्टिकल इंटीग्रेशन) और 
    • रॉकेट स्टेज के पुनः उपयोग जैसी तकनीकों को अपनाया है।
  • इन नवाचारों के परिणामस्वरूप प्रक्षेपण लागत में भारी कमी आई है और लॉन्च की आवृत्ति उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है।
  • अंतरिक्ष तक मानव पहुँच के संदर्भ में पुनः प्रयोज्यता को सबसे बड़ा परिवर्तनकारी तत्व माना जाता है। इसने अंतरिक्ष उद्योग को ‘डिस्पोजेबल’ सोच से निकालकर एक नियमित परिवहन प्रणाली के रूप में विकसित किया है। स्पेसएक्स के फाल्कन-9 रॉकेट का पहला स्टेज इसका सशक्त उदाहरण है। 

वैश्विक परिदृश्य 

  • दुनिया में एक दर्जन से अधिक निजी कंपनियाँ और स्टार्ट-अप पुनः प्रयोज्य रॉकेट तकनीक पर काम कर रहे हैं। अमेरिका की ब्लू ओरिजिन ने अपने न्यू ग्लेन रॉकेट के बूस्टर की ऊर्ध्वाधर लैंडिंग द्वारा सफल रिकवरी का प्रदर्शन किया है। 
  • चीन का वाणिज्यिक अंतरिक्ष क्षेत्र भी तेज़ी से आगे बढ़ रहा है जहाँ लैंडस्पेस जैसी कंपनियाँ Zhuque-3 जैसे कक्षीय रॉकेटों के हिस्सों को पुनः प्राप्त करने के प्रयास कर रही हैं।

क्या स्टेज कई बार उपयोग किया जा सकता है?

  • पुनर्प्राप्त स्टेज की उड़ानों की संख्या मुख्यतः संरचनात्मक और भौतिक थकान द्वारा सीमित होती है। 
  • क्रायोजेनिक प्रोपेलेंट, इंजन की ऊष्मा, उच्च दबाव और जी-फोर्स के कारण सूक्ष्म दरारें व समस्या उत्पन्न होती हैं। जैसे-जैसे उड़ानों की संख्या बढ़ती है, संवेदनशील घटकों के निरीक्षण, परीक्षण और प्रतिस्थापन में लगने वाला समय व लागत नई स्टेज बनाने की तुलना में अधिक हो सकती है। यद्यपि SpaceX पहले स्टेज को 30 से अधिक बार पुन: उपयोग कर चुका है। 
  • भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) लागत प्रभावी और उन्नत प्रक्षेपण क्षमताएँ विकसित करने के उद्देश्य से विभिन्न रिकवरी (पुनर्प्राप्ति) तकनीकों पर सक्रिय रूप से काम कर रहा है।

इसरो के दो प्रमुख विकल्प 

  • पहला, पुनः प्रयोज्य प्रक्षेपण यान (Reusable Launch Vehicle: RLV) का विकास, जो एक मिनी स्पेस शटल की तरह पंखों वाला यान है। इसे पारंपरिक रॉकेट की मदद से अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया जा सकता है और मिशन के बाद नियंत्रित पुनः प्रवेश कराकर किसी रनवे पर उतारा जा सकता है। यह अवधारणा भविष्य में अंतरिक्ष अभियानों को अधिक सुरक्षित, लचीला और किफायती बना सकती है।
  • दूसरा, रॉकेट के प्रथम स्टेज की पुनर्प्राप्ति से जुड़ा है। इसमें वायुगतिकीय प्रतिरोध और प्रतिगामी प्रणोदन (Retro-propulsion) के संयोजन का प्रयोग कर उपयोग हो चुके पहले स्टेज को नियंत्रित रूप से नीचे लाया जाता है और उसे किसी बजरे (Barge) या भूमि पर सुरक्षित उतारने की योजना है। 

भविष्य की आवश्यकता 

  • तेजी से विकसित हो रहे वैश्विक अंतरिक्ष बाजार में, जहाँ पूर्णतः पुनः प्रयोज्य प्रक्षेपण यान निकट भविष्य में सामान्य मानक बन सकते हैं, भारत के लिए प्रतिस्पर्धी बने रहना अत्यंत आवश्यक है। इसके लिए अंतरिक्ष तक पहुँच की लागत को कम करने वाली प्रौद्योगिकियों को अपनाना समय की माँग है।
  • आने वाले वर्षों में विकसित किए जाने वाले प्रक्षेपण यानों को ऐसे विन्यासों पर केंद्रित होना चाहिए, जिनमें-
    • स्टेज की संख्या न्यूनतम हो
    • आंशिक या पूर्ण पुनर्प्राप्ति संभव हो और
    • स्टेज का पुनः उपयोग एक गैर-प्राप्य (Non-negotiable) डिजाइन सिद्धांत के रूप में शामिल किया जाए।

डिज़ाइन की नई सोच 

  • भविष्य के प्रक्षेपण यानों के डिजाइन के दौरान कई पहलुओं पर संतुलित एवं गंभीर विचार आवश्यक है, जैसे-
    • प्रत्येक स्टेज द्वारा प्रदान की जाने वाली ऊर्जा 
    • उसकी लागत में हिस्सेदारी 
    • उच्च प्रदर्शन हेतु नवीन प्रौद्योगिकियों का उपयोग 
    • कॉम्पैक्ट एवं कुशल इंजन विकास, स्टेज की पुनर्प्राप्ति तथा तेज़ प्रक्षेपण आवृत्ति के लिए प्रभावी नवीनीकरण (Refurbishment) प्रक्रियाएँ। 
  • कुल मिलाकर, यदि भारत को वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में अपनी मज़बूत और प्रतिस्पर्धी उपस्थिति बनाए रखनी है तो पुनः प्रयोज्यता को भविष्य के प्रक्षेपण कार्यक्रमों का केंद्रीय स्तंभ बनाना अनिवार्य होगा।
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