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रोहिंग्या शरणार्थी

संदर्भ 

अप्रैल 2026 के मध्य में अंडमान सागर से आई एक हृदयविदारक खबर ने दुनिया को फिर से झकझोर दिया है। मलेशिया की ओर जा रही एक जर्जर नाव के पलटने से लगभग 250 लोगों के समुद्र में समा जाने की आशंका है। यह केवल एक दुर्घटना नहीं है, बल्कि उस व्यवस्थागत विफलता का परिणाम है जहाँ हज़ारों लोग म्यांमार में दमन और बांग्लादेश के शिविरों में छटपटाहट के बीच मौत के सफर को चुनने पर मजबूर हैं। 

विस्थापन का संकट और मजबूरी का सौदा 

रोहिंग्या शरणार्थियों के लिए समुद्र की लहरें अब उम्मीद से ज्यादा मौत का पर्याय बन चुकी हैं। 2017 के संकट के बाद से बांग्लादेश के कॉक्स बाज़ार में रह रहे करीब 10 लाख रोहिंग्याओं का जीवन स्तर लगातार गिर रहा है।  

  • बढ़ती असुरक्षा: शिविरों में राशन की कटौती और रोज़गार के अभाव ने एक मानवीय वैक्यूम पैदा किया है।
  • तस्करों का जाल: इस हताशा का फायदा उठाकर मानव तस्कर भारी कीमत वसूलते हैं और प्रवासियों को ऐसी नावों पर बिठा देते हैं जो 1,500 समुद्री मील लंबी यात्रा के लायक ही नहीं होतीं। 
  • घातक आंकड़े: संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों के अनुसार, 2025 अब तक का सबसे घातक वर्ष रहा, और 2026 की शुरुआत भी इसी भयानक सिलसिले के साथ हुई है।   

भूमध्य सागर बनाम अंडमान: दो संकट, दो प्रतिक्रियाएँ 

अंडमान सागर की स्थिति की तुलना अक्सर भूमध्य सागर (Mediterranean) से की जाती है, लेकिन दोनों के प्रबंधन में ज़मीन-आसमान का अंतर है:

  • संस्थागत ढांचा: यूरोप में ऑपरेशन मारे नोस्ट्रम और फ्रोंटेक्स जैसे मिशनों के माध्यम से एक समन्वित बचाव प्रणाली विकसित की गई है। वहां कानूनी जवाबदेही तय करने के लिए यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय जैसे संस्थान मौजूद हैं। 
  • एशिया का खालीपन: इसके विपरीत, दक्षिण-पूर्व एशिया में बाध्यकारी कानूनी ढांचे का पूरी तरह अभाव है। भारत, बांग्लादेश, थाईलैंड और मलेशिया जैसे प्रमुख देश 1951 के शरणार्थी सम्मेलन के हस्ताक्षरकर्ता नहीं हैं। यहाँ बचाव कार्य केवल दया पर आधारित (Ad-hoc) हैं, न कि किसी कानूनी बाध्यता पर।  

भू-राजनीतिक जटिलता और शासन की कमी 

रोहिंग्या संकट अब केवल एक शरणार्थी समस्या नहीं, बल्कि दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया की एक जटिल भू-राजनीतिक पहेली बन गया है। 

  • म्यांमार की अस्थिरता: रखाइन राज्य में अराकान आर्मी और म्यांमार सेना के बीच बढ़ते संघर्ष ने वापसी की सभी संभावनाओं को खत्म कर दिया है। 
  • चीन का प्रभाव: चीन म्यांमार का सबसे बड़ा साझीदार है। क्यौकफ्यू बंदरगाह जैसी परियोजनाओं के माध्यम से वह इस क्षेत्र में अपनी रणनीतिक पकड़ मजबूत कर रहा है, जिससे म्यांमार पर किसी भी अंतरराष्ट्रीय दबाव का असर कम हो जाता है। 
  • भारत की दुविधा: भारत एक तरफ अपनी सीमाओं पर सुरक्षा और उग्रवाद को लेकर चिंतित है, वहीं दूसरी ओर चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए उसे म्यांमार के साथ कूटनीतिक संबंध भी बनाए रखने पड़ते हैं। 

आसियान (ASEAN) का गतिरोध 

  • क्षेत्रीय संगठन आसियान का गैर-हस्तक्षेप का सिद्धांत इस संकट के समाधान में सबसे बड़ी बाधा है। 2021 की पंचसूत्रीय सहमति (Five-Point Consensus) केवल कागजों तक सीमित रह गई है क्योंकि सदस्य देशों के बीच आंतरिक मतभेद गहरे हैं। इंडोनेशिया और मलेशिया जहाँ मानवीय आधार पर सक्रियता चाहते हैं, वहीं थाईलैंड और म्यांमार जैसे देशों का रुख अलग है।  

निष्कर्ष 

अंडमान सागर में बार-बार होने वाली ये त्रासदियाँ केवल खराब मौसम या पुरानी नावों का नतीजा नहीं हैं। ये उस राज्यविहीनता (Statelessness) और क्षेत्रीय उपेक्षा की उपज हैं जहाँ इंसानी जान की कीमत भू-राजनीतिक हितों से कम आंकी जाती है। जब तक अंतरराष्ट्रीय समुदाय और क्षेत्रीय शक्तियां मिलकर एक स्थायी सुरक्षा ढांचा और बोझ साझा करने की नीति नहीं बनाते, तब तक ये नावें इसी तरह अनंत विस्थापन की भेंट चढ़ती रहेंगी। 

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