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सबरीमाला मंदिर और धार्मिक स्वतंत्रता

संदर्भ 

  • वर्तमान में न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ उन याचिकाओं की समीक्षा कर रही है, जो धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव से जुड़ी हैं। मुख्य रूप से, यह पीठ इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन बनाम केरल राज्य (2018) के फैसले की वैधता और उसके व्यापक संवैधानिक प्रभावों की जांच कर रही है। 

वर्ष 2018 का ऐतिहासिक फैसला और उसके आधार 

28 सितंबर 2018 को सर्वोच्च न्यायालय की पांच सदस्यीय पीठ ने 4:1 के बहुमत से केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया था। 

  • असंवैधानिक नियम : न्यायालय ने केरल हिंदू सार्वजनिक पूजा स्थल नियम, 1965 के नियम 3(ख) को असंवैधानिक घोषित किया, जो रीति-रिवाजों के नाम पर महिलाओं को बाहर रखने की अनुमति देता था।  
  • समानता का अधिकार : न्यायालय का मानना था कि मासिक धर्म के आधार पर महिलाओं का बहिष्कार उनकी गरिमा और समानता के अधिकार का उल्लंघन है। 
  • संप्रदाय की स्थिति : न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भगवान अयप्पा के भक्त कोई अलग धार्मिक संप्रदाय नहीं हैं, अतः उनकी इस प्रथा को अनिवार्य धार्मिक प्रथा (ERP) का संरक्षण प्राप्त नहीं हो सकता।  

धार्मिक स्वायत्तता बनाम व्यक्तिगत अधिकार (अनुच्छेद 25 और 26) 

संविधान का भाग III धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के बीच संतुलन बनाने का प्रयास करता है :

  • अनुच्छेद 25 : व्यक्तियों को धर्म को मानने और पालन करने का व्यक्तिगत अधिकार देता है, जो सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और अन्य मौलिक अधिकारों के अधीन है। 
  • अनुच्छेद 26 : धार्मिक संस्थाओं को अपने धार्मिक मामलों के प्रबंधन की स्वायत्तता (Institutional Autonomy) प्रदान करता है। 

अनिवार्य धार्मिक प्रथा (ERP) का सिद्धांत 

  • 1954 के शिरूर मठ मामले से निकले इस सिद्धांत के अनुसार, न्यायालय यह तय करता है कि कौन सी प्रथा धर्म का अभिन्न अंग है। 
  • यदि किसी प्रथा को हटाने से धर्म का मूल स्वरूप बदल जाए, तो ही उसे अनिवार्य माना जाता है। सबरीमाला मामले में विवाद यही है कि क्या महिलाओं का प्रवेश निषेध धर्म का अभिन्न अंग है या एक सामाजिक बुराई।

ये भी जाने   

शिरूर मठ मामला (हिंदू धार्मिक बंदोबस्ती, मद्रास बनाम श्री शिरूर मठ के श्री लक्ष्मींदर तीर्थ स्वामी मामला - 1954) 

  • 1954 में, सर्वोच्च न्यायालय की सात न्यायाधीशों की पीठ ने यह मत दिया कि “अनुच्छेद 25(2)(क) का तात्पर्य धार्मिक प्रथाओं के राज्य द्वारा विनियमन से नहीं है, जिनकी स्वतंत्रता संविधान द्वारा गारंटीकृत है, सिवाय इसके कि वे सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य और नैतिकता के विरुद्ध हों, बल्कि उन गतिविधियों के विनियमन से है जो आर्थिक, वाणिज्यिक या राजनीतिक प्रकृति की हैं, भले ही वे धार्मिक प्रथाओं से जुड़ी हों।” 
  • न्यायालय ने मद्रास के एडवोकेट जनरल के उस सुझाव को खारिज कर दिया जिसमें केवल धर्म की “आवश्यक” प्रथाओं को संवैधानिक संरक्षण देने की बात कही गई थी, यह बताते हुए कि “धर्म का आवश्यक भाग क्या है, यह मुख्य रूप से उस धर्म के सिद्धांतों के संदर्भ में ही निर्धारित किया जाना चाहिए।” 

केंद्र सरकार के मुख्य तर्क  

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के माध्यम से केंद्र सरकार ने न्यायालय के हस्तक्षेप पर तीन गंभीर आपत्तियाँ दर्ज की हैं :

  • संवैधानिक नैतिकता की व्यक्तिपरकता : सरकार के अनुसार संवैधानिक नैतिकता एक व्यक्तिपरक धारणा है और इसे न्यायिक समीक्षा का एकमात्र आधार नहीं बनाना चाहिए। 
  • न्यायाधीश बनाम समाज सुधारक : सरकार का तर्क है कि समाज सुधार का कार्य विधायिका और समाज का है, न्यायपालिका को समाज सुधारक की भूमिका नहीं निभानी चाहिए। 
  • धार्मिक विविधता का सम्मान : सरकार का मानना है कि धर्मों में पुरुष या स्त्री-प्रधान प्रतिबंध हो सकते हैं, जो अनिवार्य रूप से पितृसत्ता या लैंगिक भेदभाव से प्रेरित नहीं होते। उदाहरण के लिए, कुछ मंदिरों में पुरुषों का प्रवेश भी वर्जित है। जैसे ;
    • अट्टुकल भगवती मंदिर (केरल) : अट्टुकल पोंगल उत्सव के दौरान, यहां महिलाएं प्रसाद चढ़ाती हैं और पुरुषों का प्रवेश वर्जित होता है।  
    • पुष्कर का ब्रह्मा मंदिर (राजस्थान) : गर्भगृह में विवाहित पुरुषों का प्रवेश वर्जित  
    • कुमारी अम्मन मंदिर (तमिलनाडु) : यहाँ देवी कन्या रूप में हैं। मान्यता के अनुसार, केवल सन्यासी पुरुषों को मंदिर परिसर में आने की अनुमति है, विवाहित पुरुषों का प्रवेश निषेध है। 
    • कामाख्या मंदिर (असम) : अंबुबाची मेला के दौरान पुरुषों को प्रवेश की अनुमति नहीं होती है। 

धर्म में सुधार की शक्ति: राज्य और न्यायपालिका 

यह मुद्दा संरक्षित धार्मिक प्रथाओं और सुधार योग्य प्रथाओं के बीच की धुंधली रेखा पर आधारित है।

  • डॉ. अंबेडकर का दृष्टिकोण : संविधान सभा में अंबेडकर ने मूलतः धार्मिक और धर्म से जुड़ी धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों के बीच स्पष्ट अंतर करने की वकालत की थी, ताकि राज्य गैर-जरूरी प्रथाओं में सुधार कर सके। 
  • बदलती न्यायिक व्याख्या : पूर्व के निर्णयों (जैसे 1954 के मामले) में न्यायालय ने अनुष्ठानों और रीति-रिवाजों को व्यापक सुरक्षा दी थी। लेकिन आधुनिक निर्णयों (2018 का फैसला) में यह सुरक्षा सीमित हो गई है। अब केवल उन्हीं प्रथाओं को संरक्षण मिलता है जो धर्म की पहचान के लिए अपरिहार्य हैं। 

धार्मिक संप्रदाय की परिभाषा और अनुच्छेद 26 

  • अनुच्छेद 26 के तहत मिलने वाले अधिकार अनुच्छेद 25 से अधिक व्यापक हैं। शिरूर मठ मामले के अनुसार, किसी समूह को संप्रदाय होने के लिए तीन शर्तें पूरी करनी होती हैं : 
    • एक समान आस्था।
    • एक सामान्य संगठन।
    • एक विशिष्ट नाम। 

सबरीमाला का विवाद  

  • 2018 में न्यायालय ने अयप्पा भक्तों को संप्रदाय मानने से इनकार कर दिया था क्योंकि वे व्यापक हिंदू धर्म का ही हिस्सा हैं। हालांकि, आलोचकों का तर्क है कि अनुच्छेद 26 में प्रयुक्त वाक्यांश "या उसके किसी भी भाग" का अर्थ यह है कि किसी बड़े धर्म के उप-समूहों को भी स्वायत्तता मिलनी चाहिए, भले ही वे मूल धर्म से पूरी तरह अलग न हों।

निष्कर्ष 

  • अंततः, यह विवाद इस प्रश्न पर टिका है कि क्या न्यायपालिका को धर्म के आंतरिक मामलों में परिवर्तनकारी संवैधानिकवाद के माध्यम से हस्तक्षेप करना चाहिए, या धर्म को अपनी प्रथाएं खुद तय करने की स्वायत्तता दी जानी चाहिए। 
  • यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय की नौ-न्यायाधीशों वाली यह पीठ जो भी निर्णय लेगी, वह भारत में धर्म और धर्मनिरपेक्षता के भविष्य को नई दिशा प्रदान करेगा।
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