संदर्भ
- भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा शुरू की गई विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया, जिसका उद्देश्य मतदाता सूचियों से डुप्लिकेट, मृत और स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाकर अवैध प्रवासियों की पहचान करना था, अब पश्चिम बंगाल में एक गहरे राजनीतिक और कानूनी विवाद का केंद्र बन गई है। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, इस प्रक्रिया ने संवैधानिक संस्था ईसीआई और राज्य की निर्वाचित सरकार के मध्य एक गंभीर विश्वास की कमी (Trust Deficit) को जन्म दिया है।
पुनरीक्षण का सांख्यिकीय प्रभाव
4 नवंबर 2025 को पश्चिम बंगाल में मतदाताओं की कुल संख्या 7.66 करोड़ थी। एसआईआर प्रक्रिया के तहत :
- भारी कटौती : 16 दिसंबर की प्रारूप सूची तक 63 लाख नाम हटा दिए गए।
- अनमैप्ड वोटर्स : शेष 7 करोड़ मतदाताओं में से 30 लाख ऐसे थे जिनका रिकॉर्ड 2002 की सूची से मेल नहीं खाता था।
- तार्किक विसंगतियाँ : लगभग 1.20 करोड़ नामों में डेटा संबंधी खामियाँ पाई गईं।
विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR)
- विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) मतदाता सूची (electoral roll) को पूरी तरह से जांचने और अपडेट करने की एक व्यापक प्रक्रिया है, जिसे Election Commission of India (ECI) द्वारा कराया जाता है।
- यह सामान्य संशोधन (revision) से अलग होता है क्योंकि इसमें सिर्फ नए नाम जोड़ने या छोटे सुधार करने के बजाय पूरी मतदाता सूची का गहराई से सत्यापन किया जाता है।
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क्या है तार्किक विसंगति (Logical Discrepancy) ?
ईसीआई ने एक नए एआई एल्गोरिदम का उपयोग करते हुए पाँच मानदंडों के आधार पर मतदाताओं की जांच की :
- वर्ष 2002 और 2025 की सूचियों में नाम की वर्तनी में भिन्नता।
- एक ही पूर्वज (Ancestor) से 6 से अधिक मतदाताओं का संबद्ध होना।
- अभिभावक और मतदाता की आयु में 15 से 45 वर्ष के मानक अंतर का न होना।
- दादा-दादी और मतदाता की आयु के बीच 40 वर्ष से कम का अंतर।
- मतदाता के नाम और लिंग (Gender) के बीच विसंगति।
- विवाद तब बढ़ा जब लगभग 60 लाख मामले अधिकारियों के बीच असहमति के कारण अधिनिर्णय के अधीन (Under Adjudication) श्रेणी में डाल दिए गए, जिससे इन लोगों का मतदान का अधिकार अधर में लटक गया।
न्यायिक हस्तक्षेप और मतदाता न्यायाधिकरण
- मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया में न्यायपालिका को शामिल किया। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ के निर्देश पर बंगाल, ओडिशा और झारखंड के लगभग 700 न्यायिक अधिकारियों ने इन विवादित मामलों की सुनवाई की।
वर्तमान स्थिति
- न्यायिक जांच के बाद 60 लाख में से 27 लाख नामों को खारिज कर दिया गया।
- जिन लोगों के नाम खारिज हुए हैं, वे अब ईसीआई द्वारा स्थापित 19 विशेष न्यायाधिकरणों में गुहार लगा सकते हैं।
- अब तक कुल 90.8 लाख नाम सूची से हटाए जा चुके हैं, जिससे वर्तमान मतदाता संख्या घटकर 6.77 करोड़ रह गई है।
राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएँ
इस मुद्दे ने राज्य में एक बड़ा राजनीतिक ध्रुवीकरण पैदा कर दिया है :
- सत्ता पक्ष बनाम विपक्ष : जहाँ भाजपा ने इस सफाई अभियान का समर्थन किया है, वहीं तृणमूल कांग्रेस ने इसे चुनाव से पहले समर्थकों को लक्षित करने की साजिश बताया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने स्वयं इस मामले में कानूनी मोर्चा संभाला है।
- नागरिक समाज की चिंता : योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि यह प्रक्रिया भेदभावपूर्ण है। उनके अनुसार, मुस्लिम बहुल जिलों (जैसे मुर्शिदाबाद, मालदा) और विशिष्ट समुदायों (जैसे मतुआ) में नाम हटाने की दर असमान रूप से अधिक है।
निष्कर्ष
- यद्यपि चुनावी प्रक्रिया की शुद्धता आवश्यक है, लेकिन अधिनिर्णय की लंबी प्रक्रिया और बड़े पैमाने पर नाम हटने से आगामी विधानसभा चुनावों में लाखों लोगों के मताधिकार पर प्रश्नचिह्न लग गया है। यह मामला अब केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि एक बड़ा संवैधानिक और मानवाधिकार मुद्दा बन चुका है।