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अंतरिक्ष शासन : चुनौतियाँ एवं भविष्य की राह

संदर्भ 

  • पृथ्वी की कक्षाएँ अब पहले की तरह खाली नहीं रहीं, बल्कि तेजी से भीड़भाड़ और अंतरिक्ष मलबे के खतरे से जूझ रही हैं। ऐसे में अंतरिक्ष शासन की वर्तमान व्यवस्था कमजोर साबित हो रही है, क्योंकि मौजूदा नियम तेजी से बढ़ रही वाणिज्यिक गतिविधियों के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहे हैं। 

अंतरिक्ष शासन (Space Governance) के बारे में  

  • अंतरिक्ष शासन से आशय उन अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय व्यवस्थाओं से है, जिनमें संधियाँ, कानून और नैतिक मानदंड शामिल होते हैं। 
  • इनका उद्देश्य बाह्य अंतरिक्ष में मानव गतिविधियों को नियंत्रित और व्यवस्थित करना है। इसके अंतर्गत 
    • उपग्रह प्रक्षेपण का नियंत्रण, 
    • कक्षीय मलबे में कमी, 
    • रेडियो आवृत्तियों का प्रबंधन तथा 
    • अंतरिक्ष दुर्घटनाओं के लिए जिम्मेदारी तय करना शामिल है। 

अंतरिक्ष से जुड़े प्रमुख कानून  

  • आउटर स्पेस ट्रीटी (1967) : यह अंतरिक्ष कानून की आधारशिला है। इसका अनुच्छेद VI देशों को उनकी सभी अंतरिक्ष गतिविधियों (निजी संस्थाओं सहित) के लिए उत्तरदायी बनाता है, जबकि अनुच्छेद VII अंतरिक्ष वस्तुओं से होने वाले नुकसान की जिम्मेदारी तय करता है। 
  • लायबिलिटी कन्वेंशन (1972) : यह संधि आउटर स्पेस ट्रीटी के प्रावधानों को और स्पष्ट करती है तथा अंतरिक्ष से हुए नुकसान के लिए मुआवज़ा पाने की प्रक्रिया निर्धारित करती है।  
  • राष्ट्रीय लाइसेंसिंग प्रणाली : आज के समय में विभिन्न देश प्रक्षेपण से पहले कक्षीय जिम्मेदारी सुनिश्चित करने के लिए लाइसेंसिंग प्रणाली लागू करते हैं, जिसमें निपटान योजनाएँ भी शामिल होती हैं।  

अंतरिक्ष शासन का महत्व 

  • टकराव की रोकथाम : उचित नियमों के माध्यम से उपग्रहों को सुरक्षित रूप से हटाया या उनकी कक्षा बदली जा सकती है। छोटे-से-छोटा मलबा भी अत्यधिक गति के कारण भारी नुकसान पहुंचा सकता है। 
  • दीर्घकालिक नुकसान पर नियंत्रण : शासन केवल तात्कालिक दुर्घटनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भविष्य में बढ़ने वाली भीड़ और उससे होने वाले स्थायी नुकसान को भी रोकने का प्रयास करता है। 
  • पीढ़ियों के बीच संतुलन : यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि आने वाली पीढ़ियाँ भी अंतरिक्ष संसाधनों का उपयोग कर सकें। 
  • वैश्विक सेवाओं की सुरक्षा : मौसम पूर्वानुमान, जीपीएस और संचार जैसी सेवाएँ अंतरिक्ष पर निर्भर हैं, जिन्हें सुरक्षित रखना अत्यंत आवश्यक है।  
  • जिम्मेदारी की भावना विकसित करना : मानकीकृत नियम यह तय करते हैं कि कितना उपयोग सुरक्षित है, जिससे जिम्मेदार और गैर-जिम्मेदार ऑपरेटरों के बीच संतुलन बना रहता है। 

मुख्य चुनौतियाँ 

  • सत्यापन की कमी : यह जांचने का कोई प्रभावी तरीका नहीं है कि मिशन के बाद उपग्रह वास्तव में कक्षा से हटाए गए या नहीं। 
  • मलबे की निगरानी में कठिनाई : कई खतरनाक मलबों का पता लगाना मुश्किल होता है, और अक्सर नुकसान के बाद ही उनकी पहचान होती है। 
  • सूचना में असमानता : सभी देशों को समान और सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं होती, क्योंकि डेटा कई बार व्यावसायिक या सुरक्षा कारणों से छिपा लिया जाता है।  
  • पुराने कानून : वर्तमान संधियाँ उस समय बनी थीं जब अंतरिक्ष गतिविधियाँ सीमित थीं। वे आज के निजी क्षेत्र और बड़े उपग्रह समूहों की वास्तविकताओं को पूरी तरह नहीं समझतीं। 
  • नियमों का दुरुपयोग : कंपनियाँ ऐसे देशों को चुनती हैं जहाँ नियम कम सख्त हों, जिससे सुरक्षा मानकों से बचा जा सके। 

आगे की दिशा 

  • लाइसेंसिंग में एकरूपता : वैश्विक स्तर पर समान नियम लागू किए जाने चाहिए। 
  • डेटा साझा करना अनिवार्य बने : स्वैच्छिक व्यवस्था की बजाय कानूनी रूप से डेटा साझा करना जरूरी किया जाए। 
  • सख्त मलबा-नियंत्रण मानक : ऐसे नियम बनाए जाएँ जो मापने योग्य और लागू करने योग्य हों। 
  • पर्यावरणीय दृष्टिकोण अपनाना : सावधानी और संतुलन जैसे सिद्धांतों को अंतरिक्ष नीति में शामिल किया जाए। 
  • भारत की भूमिका : भारत अपने अंतरिक्ष कानूनों में कक्षीय जिम्मेदारी को अनिवार्य बनाकर उदाहरण प्रस्तुत कर सकता है।  

निष्कर्ष 

  • अंतरिक्ष अब केवल खोज का विषय नहीं, बल्कि एक 'वैश्विक सार्वजनिक संपत्ति' (Global Common) है। यदि हम समय रहते स्वैच्छिक दिशा-निर्देशों से आगे बढ़कर कठोर और प्रवर्तनीय अंतरराष्ट्रीय कानूनों की ओर नहीं बढ़े, तो अंतरिक्ष का 'अंतिम सीमांत' (Final Frontier) हमारे अपने ही कचरे के कारण बंद हो सकता है। 
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