संदर्भ
भारत इस समय बिजली की मांग में अभूतपूर्व उछाल का सामना कर रहा है। समय से पहले और तीव्र रूप से आई लू ने देशभर में बिजली खपत को रिकॉर्ड स्तर तक पहुँचा दिया है। हालांकि यह संकट केवल बढ़ती मांग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी गंभीरता इस बात में है कि सबसे अधिक कमी सूर्यास्त के बाद देखने को मिल रही है जब सौर ऊर्जा उपलब्ध नहीं रहती।
बढ़ती विद्युत मांग और आपूर्ति का अंतर
- ग्रिड इंडिया (Grid India) के आँकड़े स्थिति की गंभीरता को स्पष्ट करते हैं। 25 अप्रैल 2026 को देश की बिजली मांग 256 गीगावाट के ऐतिहासिक स्तर पर पहुँच गई। उसी रात लगभग 10:39 बजे 4.2 गीगावाट की कमी दर्ज की गई।
- इससे एक दिन पहले भी स्थिति चिंताजनक थी, रात में मांग 240 गीगावाट रही और 5.4 गीगावाट की कमी दर्ज हुई, जो अब तक की सबसे बड़ी कमी मानी जा रही है। दिलचस्प रूप से, दिन के समय (करीब 3:45 बजे) पूरी मांग बिना किसी कमी के पूरी कर ली गई। यह अंतर साफ दिखाता है कि भारत का बिजली तंत्र दिन में तो स्थिर है, लेकिन शाम ढलते ही दबाव में आ जाता है।
सौर ऊर्जा का विरोधाभास
- भारत ने सौर ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है और इसकी स्थापित क्षमता लगभग 150 गीगावाट तक पहुँच चुकी है। लेकिन यही उपलब्धि अब एक नई चुनौती भी बन रही है।
- शाम के समय, जब सूर्य अस्त होता है, सौर उत्पादन अचानक घट जाता है, जबकि उसी समय घरों और दफ्तरों में एयर कंडीशनिंग की मांग चरम पर होती है। इस स्थिति को ऊर्जा क्षेत्र में डक कर्व प्रभाव कहा जाता है।
थर्मल संयंत्रों की कमजोरी
- बिजली संकट का एक प्रमुख कारण थर्मल पावर प्लांटों में आई तकनीकी खराबियाँ भी हैं। तात्कालिक सरकारी आंकड़ों के अनुसार, लगभग 21 गीगावाट क्षमता अचानक बंद रही।
- 227 गीगावाट की स्थापित क्षमता के मुकाबले इन संयंत्रों का उत्पादन घटकर 184-187 गीगावाट रह गया। भीषण गर्मी ने मशीनों और उपकरणों पर अतिरिक्त दबाव डाला, जिससे वे ठीक उसी समय विफल हो गए जब उनकी सबसे ज्यादा जरूरत थी।
बाजार में कीमतों का उतार-चढ़ाव
- ग्रिड पर बढ़ते दबाव का असर बिजली बाजार में भी साफ दिखा। इंडियन एनर्जी एक्सचेंज पर रात के समय बिजली की कीमतें ₹10 प्रति यूनिट (ऊपरी सीमा) तक पहुँच गईं।
- वहीं, दिन के समय सौर ऊर्जा की अधिकता के कारण यही कीमतें घटकर ₹1.5 प्रति यूनिट तक आ गईं। इस तरह एक ही दिन में भारी मूल्य अंतर देखने को मिला, जो वितरण कंपनियों (DISCOMs) के लिए चुनौती बन गया है।
2025-26 का वर्ष और विद्युत माँग
- आमतौर पर भारत में बिजली की अधिकतम मांग जून-जुलाई या सितंबर-अक्टूबर के बीच देखने को मिलती है। लेकिन इस बार अप्रैल में ही मांग ने नया रिकॉर्ड बना दिया।
- अप्रैल 2025 में जहां मांग 235 गीगावाट थी, वहीं अप्रैल 2026 में यह बढ़कर 256 गीगावाट तक पहुँच गई, जो असामान्य रूप से तेज वृद्धि को दर्शाता है।
प्रमुख चुनौतियाँ
- इस संकट ने बिजली क्षेत्र की कई संरचनात्मक कमजोरियों को उजागर किया है। शाम के समय मांग और सौर उत्पादन के बीच का अंतर सबसे बड़ी समस्या बनकर सामने आया है।
- इसके अलावा, अत्यधिक गर्मी के दौरान थर्मल संयंत्रों की विश्वसनीयता भी सवालों के घेरे में है। ऊर्जा भंडारण की कमी के कारण दिन की अतिरिक्त बिजली रात के लिए उपयोग नहीं हो पा रही। वहीं, कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव वित्तीय दबाव को बढ़ा रहा है।
समाधान की दिशा
- बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली (BESS) को बड़े पैमाने पर विकसित करना जरूरी है ताकि दिन की सौर ऊर्जा को रात में इस्तेमाल किया जा सके।
- इसके साथ ही, मांग प्रबंधन के जरिए उपभोक्ताओं को पीक घंटों के बाहर बिजली उपयोग के लिए प्रेरित करना होगा।
- थर्मल संयंत्रों को अधिक लचीला और गर्मी सहन करने योग्य बनाना भी आवश्यक है। पम्प्ड स्टोरेज हाइड्रो परियोजनाओं का विस्तार और गैस आधारित संयंत्रों का पुनः संचालन भी इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।
निष्कर्ष
- अप्रैल 2026 का यह बिजली संकट एक स्पष्ट चेतावनी है। जैसे-जैसे देश में सौर ऊर्जा का विस्तार होगा और जलवायु परिवर्तन के कारण गर्मी बढ़ेगी, इस तरह की चुनौतियाँ और जटिल होती जाएँगी।
- भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन अब समय आ गया है कि ग्रिड संरचना- विशेष रूप से ऊर्जा भंडारण और बैकअप व्यवस्था को भी उसी गति से मजबूत किया जाए।