दशकों से भारतीय नीति-निर्माण का केंद्र बिंदु आय रही है, जिसे असमानता मापने का सबसे सटीक पैमाना माना जाता रहा। लेकिन तेलंगाना सरकार द्वारा हाल ही में जारी सामाजिक-आर्थिक, शैक्षिक, रोजगार, राजनीतिक और जाति (एसईईईपीसी) सर्वेक्षण 2024 ने इस धारणा को बुनियादी तौर पर चुनौती दी है।
राज्य की 97% आबादी (लगभग 3.5 करोड़ लोग) पर आधारित यह ऐतिहासिक रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि भारत में पिछड़ापन क्रमिक (लीनियर) नहीं, बल्कि जाति के आधार पर घातीय (एक्सपोनेंशियल) रूप से बढ़ता है।
रिपोर्ट से संबंधित प्रमुख बिंदु
समग्र पिछड़ापन सूचकांक (सीबीआई): एक गहरी खाई का खुलासा
इस सर्वेक्षण की सबसे बड़ी विशेषता इसका समग्र पिछड़ापन सूचकांक (कंपोजिट बैकवर्डनेस इंडेक्स - सीबीआई) है। 57 मुख्य मापदंडों (शिक्षा, संपत्ति, जीवन स्तर और सामाजिक एकीकरण) के आधार पर तैयार किए गए इस सूचकांक में 100 का स्कोर उच्चतम पिछड़ेपन को दर्शाता है।
सर्वेक्षण के परिणाम नीति निर्माताओं के लिए आंखें खोलने वाले हैं:
अनुसूचित जाति (एससी): इनका सीबीआई स्कोर 96 दर्ज किया गया।
सामान्य जाति (जीसी):इनका स्कोर मात्र 31 रहा।
इसका सीधा अर्थ यह है कि एक औसत दलित परिवार, एक उच्च जाति के परिवार की तुलना में तीन गुना अधिक पिछड़ा है। यह डेटा सिद्ध करता है कि असमानता केवल आय की कमी नहीं, बल्कि एक संरचनात्मक बाधा है।
पिछड़ेपन के भीतर विविधता
रिपोर्ट ने पिछड़ा वर्ग (बीसी) को एक एकल इकाई के रूप में देखने की नीतिगत गलती को भी उजागर किया है। सर्वेक्षण में शामिल 242 जातियों में से 135 जातियों का सीबीआई स्कोर राज्य के औसत से अधिक पाया गया।
रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि सभी पिछड़ी जातियाँ समान पायदान पर नहीं हैं। कुछ समूह पिछड़ेपन के मामले में अनुसूचित जातियों के करीब हैं, जबकि कुछ सामान्य वर्ग के समकक्ष पहुंच चुके हैं।
वस्तुतः यह निष्कर्ष एक आकार सबके लिए उपयुक्त (वन-साइज-फिट्स-ऑल) वाली आरक्षण और कल्याणकारी नीतियों की प्रभावशीलता पर सवाल खड़ा करता है।
शहरीकरण बनाम संरचनात्मक अलगाव
सर्वेक्षण में एक महत्वपूर्ण विरोधाभास देखा गया। यद्यपि शहरीकरण से जीवन स्तर में सुधार हुआ है, लेकिन इसने जातिगत अंतर को समाप्त नहीं किया है। हैदराबाद जैसे महानगरों में भी उच्च जातियों को विकास का अधिक लाभ मिला है, जबकि एससी/एसटी परिवार शहरी झुग्गी-बस्तियों और अनौपचारिक क्षेत्रों में सिमटे हुए हैं।
विशेष रूप से अनुसूचित जनजातियों (एसटी) में शैक्षिक पिछड़ापन एससी की तुलना में भी अधिक है, जिसका मुख्य कारण भौगोलिक अलगाव और सांस्कृतिक दूरी है।
नीतिगत सिफारिशें: शिक्षा की गुणवत्ता पर जोर
स्वतंत्र विशेषज्ञ कार्य समूह ने रिपोर्ट के आधार पर स्पष्ट किया है कि केवल स्कूलों में दाखिला बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। वर्तमान नीतियां नामांकन पर तो ध्यान देती हैं, लेकिन सीखने के परिणामों (लर्निंग आउटकम्स) की अनदेखी करती हैं।
मुख्य सुझाव:
सरकारी स्कूल व्यवस्था को केवल उपलब्ध नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण बनाना होगा। जब तक वंचित क्षेत्रों में उच्च स्तरीय शिक्षण संस्थान नहीं होंगे, तब तक व्यावसायिक विभाजन का यह दुष्चक्र चलता रहेगा।
निष्कर्ष: विकास बनाम समानता
तेलंगाना की बढ़ती जीडीपी और घटती गरीबी दर के बावजूद, एसईईईपीसी रिपोर्ट यह चेतावनी देती है कि आर्थिक समृद्धि का अर्थ सामाजिक समानता नहीं है। वस्तुतः आय-आधारित लक्ष्यीकरण (इनकम-बेस्ड टारगेटिंग) जातिगत खाई को पाटने में विफल रहा है।
समय की मांग है कि नीति निर्माता आय के चश्मे को हटाकर एक ऐसी जाति-संवेदनशील और बहुआयामी रणनीति अपनाएं, जो केवल गरीबी को कम न करे, बल्कि उस संरचनात्मक बहिष्कार को खत्म करे जो सदियों से शिक्षा, श्रम और सामाजिक व्यवस्था में अपनी जड़ें जमाए हुए है।