हाल ही में, साइंस ऑफ क्लाइमेट चेंज जर्नल में प्रकाशित एक शोध-पत्र ने वैश्विक ऊष्मीकरण (Global Warming) के मूल सिद्धांतों पर प्रश्नचिह्न खड़ा किया है। शोध का दावा है कि यदि डेटा की अनिश्चितताओं को शामिल किया जाए तो पृथ्वी का ऊर्जा असंतुलन (Earth’s Energy Imbalance - EEI) और महासागरों की ऊष्मा-सामग्री में वृद्धि शून्य के करीब है। हालांकि, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इन दावों का सूक्ष्म विश्लेषण जलवायु विज्ञान की सुदृढ़ता को ही प्रमाणित करता है।
ऊष्मप्रवैगिकी (Thermodynamics) और मापन का तर्क
शोध-पत्र का प्राथमिक तर्क तापमान को एक गहन गुण (Intensive Property) मानने पर आधारित है, जिसके अनुसार तापमान का औसत नहीं निकाला जा सकता।
वैज्ञानिक केवल तापमान का औसत नहीं निकालते, बल्कि वे ऊष्मीय ऊर्जा की गणना करते हैं, जो एक विस्तृत गुण (Extensive Property) है। ऊष्मीय ऊर्जा अणुओं की कुल गतिज ऊर्जा को दर्शाती है और द्रव्यमान पर निर्भर करती है।
समय के साथ ऊष्मीय ऊर्जा में निरंतर वृद्धि दर्ज की गई है, जो यह सिद्ध करती है कि महासागर वास्तव में ऊष्मा का संचय कर रहे हैं।
ऊष्मप्रवैगिकी (Thermodynamics) के बारे में
ऊष्मप्रवैगिकी या ऊष्मागतिकी भौतिकी की वह शाखा है जो किसी प्रणाली की ऊर्जा और कार्य का अध्ययन करती है। इसका जन्म 19वीं शताब्दी में हुआ जब वैज्ञानिकों ने पहली बार भाप इंजनों के निर्माण और संचालन की खोज की।
ऊष्मागतिकी केवल किसी प्रणाली की वृहद प्रतिक्रिया का अध्ययन करती है जिसे हम प्रयोगों में देख और माप सकते हैं। सूक्ष्म स्तर पर गैसों की अंतःक्रियाओं का वर्णन गैसों के गतिज सिद्धांत द्वारा किया जाता है।
ये दोनों विधियाँ एक-दूसरे की पूरक हैं; कुछ सिद्धांतों को ऊष्मागतिकी के संदर्भ में आसानी से समझा जा सकता है और कुछ सिद्धांतों को गतिज सिद्धांत द्वारा आसानी से समझाया जा सकता है।
आर्गो (Argo) डेटा और अनिश्चितता
आर्गो प्रोग्राम के तहत 2000 मीटर की गहराई तक समुद्री डेटा एकत्र किया जाता है। शोध-पत्र ने डेटा अंतराल (Gaps) और अनिश्चितताओं को आधार बनाकर निष्कर्षों को खारिज करने का प्रयास किया है।
शोध में विभिन्न सांख्यिकीय त्रुटियों को 'अवैज्ञानिक' तरीके से जोड़कर अनिश्चितता को बढ़ा-चढ़ाकर (Overestimated) पेश किया गया है।
महासागर वैज्ञानिक केवल आर्गो पर निर्भर नहीं हैं। वे उपग्रह-आधारित रडार (समुद्र-स्तर वृद्धि मापने हेतु) और गुरुत्वाकर्षण मापन (GRACE मिशन) के डेटा का उपयोग करते हैं। जब विभिन्न स्वतंत्र स्रोतों से प्राप्त डेटा एक ही निष्कर्ष (महासागरों का ऊष्मीय विस्तार) की ओर इशारा करते हैं, तो डेटा की विश्वसनीयता स्वतः सिद्ध हो जाती है।
सीईआरईएस और सर्कुलर तर्क (Circularity Argument) की पड़ताल
नासा का Clouds and the Earth's Radiant Energy System (बादल और पृथ्वी की विकिरण ऊर्जा प्रणाली-CERES) प्रोजेक्ट पृथ्वी के वायुमंडल के शीर्ष पर ऊर्जा प्रवाह को मापता है। शोध-पत्र का आरोप है कि सीईआरईएस डेटा को आर्गो डेटा के अनुरूप समायोजित (Adjust) करना एक सर्कुलर तर्क है।
वैज्ञानिक बैलेंसिंग और फिलिंग (EBAF) के माध्यम से दीर्घकालिक औसत को समायोजित करते हैं। वस्तुतः यह समायोजन केवल औसत मान (Mean value) को प्रभावित करता है, न कि समय के साथ होने वाले उतार-चढ़ाव (Trends) को। मासिक स्तर पर ऊर्जा असंतुलन में जो वृद्धि देखी गई है, वह आर्गो डेटा से स्वतंत्र है। अतः सर्कुलरिटी का दावा तकनीकी रूप से कमजोर है।
जलवायु विज्ञान की विश्वसनीयता का आधार
विज्ञान में किसी निष्कर्ष की सत्यता इस बात पर निर्भर करती है कि क्या अलग-अलग विधियों से समान परिणाम प्राप्त हो रहे हैं। पृथ्वी का ऊर्जा असंतुलन (Earth’s Energy Imbalance - EEI) के मामले में निम्नलिखित स्वतंत्र स्रोत एक ही दिशा में संकेत करते हैं :
वायुमंडलीय पुनर्विश्लेषण (Atmospheric Reanalysis)
गहरे महासागर के तापमान का मापन
परिष्कृत भौतिक मॉडल (Physical Models)
यदि पृथ्वी गर्म नहीं हो रही होती, तो इन सभी भिन्न-भिन्न प्रणालियों का एक साथ और एक ही दिशा में गलत होना सांख्यिकीय रूप से असंभव है।
आगे की राह (Way Forward)
किसी भी वैज्ञानिक शोध की प्रामाणिकता उसके स्वतंत्र सत्यापन की क्षमता में निहित होती है। आलोचक शोध-पत्र डेटा की सूक्ष्म अनिश्चितताओं को तो पकड़ता है, लेकिन वह इस व्यापक अंतर्संबंध की व्याख्या करने में विफल रहता है कि क्यों दुनिया भर के स्वतंत्र मापन तंत्र एक ही निष्कर्ष पर पहुँच रहे हैं।
निष्कर्ष
जलवायु परिवर्तन केवल एक मॉडल नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष मापन और भौतिकी के नियमों पर आधारित वास्तविकता है। नीति-निर्माताओं के लिए आवश्यक है कि वे 'स्यूडो-साइंस' (Pseudo-science) और वास्तविक वैज्ञानिक अनिश्चितताओं के बीच के अंतर को समझें, ताकि वैश्विक जलवायु कार्ययोजना (Climate Action) प्रभावित न हो।