संदर्भ
- हाल ही में नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की दो दिवसीय बैठक संपन्न हो गई है। इस बैठक में ब्रिक्स समूह ने 1967 से पहले की सीमाओं के आधार पर एक स्वतंत्र और व्यवहार्य फिलिस्तीन राज्य के गठन के अपने संकल्प को दोहराया, जिसकी राजधानी पूर्वी यरुशलम होगी।
- हालांकि, फिलिस्तीन के मुद्दे पर आम सहमति बनने के बावजूद, कई अन्य भू-राजनीतिक विषयों पर सदस्य देशों के बीच गहरे मतभेद खुलकर सामने आए। इसके चलते बैठक के बाद पारंपरिक संयुक्त वक्तव्य जारी नहीं किया जा सका और इसके स्थान पर अध्यक्ष का वक्तव्य और परिणाम दस्तावेज जारी किया गया। सूत्रों के मुताबिक, मुख्य रूप से संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और ईरान के प्रतिनिधिमंडलों के बीच कई अहम मुद्दों पर तीखी असहमति देखी गई।
फिलिस्तीन मुद्दे पर ब्रिक्स का सामूहिक समर्थन
अध्यक्ष के वक्तव्य में अंतरराष्ट्रीय कानून और दो-राज्य समाधान (Two-State Solution) के प्रति ब्रिक्स की अटूट प्रतिबद्धता व्यक्त की गई है। वक्तव्य के अनुसार:
- ब्रिक्स ने संयुक्त राष्ट्र में फिलिस्तीन राज्य की पूर्ण सदस्यता का समर्थन किया है।
- वस्तुतः संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, महासभा के प्रस्तावों और अरब शांति पहल के तहत गाजा पट्टी और वेस्ट बैंक को शामिल करते हुए 1967 की सीमाओं के भीतर एक संप्रभु फिलिस्तीन राज्य की स्थापना पर बल दिया गया है।
- गाजा पट्टी को कब्जे वाले फिलिस्तीनी क्षेत्र का एक अविभाज्य हिस्सा मानते हुए इसे राष्ट्रपति महमूद अब्बास के नेतृत्व वाले फिलिस्तीनी राष्ट्रीय प्राधिकरण के तहत वेस्ट बैंक के साथ एकीकृत करने का आह्वान किया गया है।
- यद्यपि 7 अक्टूबर, 2023 के हमलों के बाद गाजा का नियंत्रण हमास से लेकर फिलिस्तीनी प्राधिकरण को सौंपने के इस प्रस्ताव पर ईरान और यूएई के बीच गंभीर मतभेद उभरे, जिसके कारण दोनों पक्षों ने कुछ प्रस्तावों पर आपत्तियां दर्ज कराईं।
ईरान और यूएई के बीच बढ़ता तनाव
- बैठक की सबसे महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच उभरे मतभेद रहे। विशेष रूप से गाजा पट्टी और हमास से जुड़े मुद्दों पर दोनों देशों के दृष्टिकोण अलग दिखाई दिए।
- ईरान लंबे समय से हमास और अन्य प्रतिरोधी समूहों के प्रति सहानुभूति रखता रहा है, जबकि यूएई ने हाल के वर्षों में इज़राइल के साथ संबंध सामान्य करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। ऐसे में गाजा के प्रशासन को हमास से हटाकर फिलिस्तीनी प्राधिकरण को सौंपने के प्रस्ताव पर मतभेद स्वाभाविक थे।
- ईरानी विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची द्वारा बिना नाम लिए यूएई पर इज़राइल और अमेरिका को सहयोग देने का आरोप लगाना इस तनाव की गंभीरता को दर्शाता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि पश्चिम एशिया की राजनीति अब केवल इज़राइल-फिलिस्तीन संघर्ष तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि क्षेत्रीय शक्तियों के प्रभाव-संतुलन का भी केंद्र बन चुकी है।
समुद्री भू-राजनीति और होर्मुज विवाद
बैठक में केवल फिलिस्तीन ही नहीं, बल्कि समुद्री व्यापार और सामरिक जलमार्गों को लेकर भी असहमति उभरकर सामने आई।
- होर्मुज जलडमरूमध्य विश्व ऊर्जा आपूर्ति की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि वैश्विक तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। ब्रिक्स दस्तावेज़ में अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों में निर्बाध समुद्री व्यापार की बात कही गई, लेकिन ईरान ने इसे स्वीकार नहीं किया।
- ईरान का कहना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य पूरी तरह ईरान और ओमान के क्षेत्रीय जलक्षेत्र में आता है, इसलिए इसका प्रबंधन केवल इन दोनों देशों के अधिकार क्षेत्र में होना चाहिए। यह रुख अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून की उस व्याख्या से अलग है, जिसमें ऐसे रणनीतिक जलमार्गों को वैश्विक व्यापार के लिए खुला माना जाता है।
- इसी प्रकार बाब-अल-मंडाब जलडमरूमध्य और लाल सागर में हाउथी विद्रोहियों की गतिविधियों को लेकर भी ईरान और अन्य देशों के बीच मतभेद दिखाई दिए। इससे यह स्पष्ट होता है कि ब्रिक्स देशों के बीच पश्चिम एशिया की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर साझा दृष्टिकोण अभी विकसित नहीं हो पाया है।
अमेरिका-ईरान संबंध और वैश्विक शक्ति संतुलन
- बैठक में अमेरिका और ईरान के बीच रुकी हुई वार्ता को पुनः शुरू करने पर भी जोर देना यह संकेत देता है कि ब्रिक्स देश पश्चिम एशिया में सैन्य तनाव के बजाय कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता देना चाहते हैं।
- हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा ईरान के प्रस्तावों को खारिज किए जाने के बाद दोनों देशों के बीच अविश्वास और बढ़ा है। यदि यह तनाव जारी रहता है, तो इसका प्रभाव वैश्विक ऊर्जा बाजार, समुद्री व्यापार और क्षेत्रीय स्थिरता पर पड़ सकता है।
भारत के लिए रणनीतिक महत्व
- बैठक में ईरान द्वारा चाबहार बंदरगाह को भारत के लिए स्वर्ण द्वार बताना विशेष महत्व रखता है। चाबहार बंदरगाह भारत को मध्य एशिया, काकेशस और यूरोप तक पहुँच प्रदान करता है। यह परियोजना पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए भारत की क्षेत्रीय कनेक्टिविटी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
- साथ ही, रूस द्वारा भारत को ऊर्जा आपूर्ति जारी रखने का आश्वासन भी भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। सर्गेई लावरोव ने उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC), राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार और परमाणु ऊर्जा सहयोग को आगे बढ़ाने पर जोर दिया।
- यह भारत के लिए बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था (Multipolar World Order) में अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने का अवसर भी है, जहां वह पश्चिमी देशों, रूस और पश्चिम एशियाई शक्तियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है।
निष्कर्ष
- ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की यह बैठक एक महत्वपूर्ण संदेश देती है। एक ओर, ब्रिक्स समूह वैश्विक दक्षिण की आवाज़ के रूप में फिलिस्तीन जैसे मुद्दों पर सामूहिक रुख अपनाने की क्षमता दिखाता है; दूसरी ओर, सदस्य देशों के क्षेत्रीय हित और वैचारिक मतभेद इसकी आंतरिक एकता को चुनौती देते हैं।
- फिलिस्तीन, गाजा, होर्मुज जलडमरूमध्य और पश्चिम एशिया की राजनीति से जुड़े मुद्दों पर उभरे मतभेद यह संकेत देते हैं कि ब्रिक्स अभी एक पूर्ण राजनीतिक गठबंधन नहीं बन पाया है। फिर भी, वैश्विक शक्ति संतुलन में इसका बढ़ता प्रभाव यह दर्शाता है कि आने वाले समय में यह मंच अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में और अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।