संदर्भ
- वैश्विक भू-राजनीति में पश्चिम एशिया (Middle East) का रणनीतिक महत्व किसी से छिपा नहीं है। लेकिन अप्रैल 2026 में सामने आई यूएनडीपी की रिपोर्ट मिलिट्री एस्केलेशन इन द मिडल ईस्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सुदूर क्षेत्र में होने वाला सैन्य तनाव केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहता। यह संघर्ष भारत जैसे देशों में गरीबी उन्मूलन के लिए दशकों से किए जा रहे प्रयासों को गंभीर रूप से पीछे धकेल सकता है।
रिपोर्ट से संबंधित प्रमुख बिंदु
गरीबी का नया चक्र: 25 लाख लोगों पर मंडराता खतरा
- रिपोर्ट का सबसे भयावह पहलू गरीबी पर इसका सीधा प्रहार है। आंकड़ों के अनुसार, यदि सैन्य तनाव चरम पर पहुँचता है, तो भारत में 25 लाख (2.46 मिलियन) अतिरिक्त लोग गरीबी रेखा के नीचे धकेले जा सकते हैं।
- भारत की गरीबी दर 23.9% से बढ़कर 24.2% होने का अनुमान है।
- दक्षिण एशिया इस संकट का केंद्र बनता दिख रहा है, जहाँ कुल 80 लाख से अधिक लोग गरीबी के जाल में फंस सकते हैं। चीन जैसे देशों में यह प्रभाव जनसंख्या के अनुपात में काफी कम रहने वाला है।
मानव विकास की गति पर ब्रेक (एचडीआई इम्पैक्ट)
- किसी भी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति उसके मानव विकास सूचकांक (HDI) से मापी जाती है। यूएनडीपी के सिमुलेशन बताते हैं कि इस संघर्ष के कारण भारत अपनी मानव विकास यात्रा में 0.03 से 0.12 वर्ष पीछे जा सकता है।
- यद्यपि यह संख्या छोटी लग सकती है, लेकिन स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर के संदर्भ में यह लाखों लोगों के भविष्य को प्रभावित करने वाली गिरावट है।
ऊर्जा और कृषि की रीढ़ पर प्रहार
- भारत की निर्भरता पश्चिम एशिया पर इतनी गहरी है कि वहां की कोई भी हलचल यहाँ की रसोई और खेतों तक पहुँचती है।
- भारत अपनी तेल जरूरतों का 90% और एलपीजी का भी 90% आयात करता है। आपूर्ति बाधित होने से परिवहन और उत्पादन लागत का बढ़ना तय है।
- कृषि के लिए 45% उर्वरक आयात और 85% यूरिया उत्पादन के लिए आवश्यक एलएनजी (LNG) इसी क्षेत्र से आती है। खरीफ सीजन (जून) के मुहाने पर खड़ा भारत इस व्यवधान को लंबे समय तक झेलने की स्थिति में नहीं है।
व्यापारिक घाटा और एमएसएमई (MSME) की चुनौतियां
- पश्चिम एशिया केवल ऊर्जा का स्रोत नहीं, बल्कि भारतीय उत्पादों का एक बड़ा बाजार भी है।
- 48 अरब डॉलर का गैर-तेल निर्यात (चावल, चाय, आभूषण) सीधे तौर पर प्रभावित हो सकता है।
- भारत का 90% रोजगार अनौपचारिक है। रत्न-आभूषण, स्टील और खाद्य प्रसंस्करण जैसे छोटे उद्योग लागत बढ़ने और ऑर्डर रद्द होने के कारण बंद हो सकते हैं, जिससे बड़े पैमाने पर बेरोजगारी की स्थिति पैदा हो सकती है।
प्रवासियों का संकट और रेमिटेंस का अभाव
- लगभग 93.7 लाख भारतीय खाड़ी (GCC) देशों में काम करते हैं और देश के कुल रेमिटेंस का लगभग 40% भेजते हैं। संघर्ष के कारण यदि वहां आर्थिक गतिविधि मंद पड़ती है या कामगारों को वापस लौटना पड़ता है, तो विदेशी मुद्रा भंडार और लाखों परिवारों की आय पर सीधा प्रहार होगा।
स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त बोझ
- संघर्ष का असर केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मानवीय भी है। चिकित्सा उपकरणों के कच्चे माल की लागत में 50% की संभावित वृद्धि और दवाओं के थोक भाव में 10-15% का उछाल भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के लिए एक बड़ी चुनौती पेश करेगा।
भारतीय नीतिगत प्रतिक्रियाएँ/अनुमान
- केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड (Central Board of Indirect Taxes and Customs) के अनुसार, पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद शुल्क में कटौती से सरकार को हर पखवाड़े ₹7,000 करोड़ का नुकसान हो रहा है, जबकि विमानन ईंधन पर निर्यात कर से ₹1,500 करोड़ की भरपाई होती है। इस तरह शुद्ध घाटा ₹5,500 करोड़ प्रति पखवाड़ा है, जो सालाना लगभग ₹1.32 लाख करोड़ तक पहुंच सकता है।
- खाद्य, उर्वरक और पेट्रोलियम सब्सिडी के 2026-27 के बजट अनुमान से अधिक होने की संभावना है। साथ ही, ऊंची कच्चे तेल की कीमतों के चलते खुदरा कीमतों में वृद्धि को पूरी तरह रोका जाना मुश्किल है।
- रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के आकलन के अनुसार, कच्चे तेल की कीमत में हर 10% वृद्धि से जीडीपी वृद्धि दर लगभग 15 आधार अंक घट सकती है, जबकि मुद्रास्फीति में करीब 30 आधार अंकों की बढ़ोतरी संभव है।
अवसर और भविष्य की राह
यूएनडीपी की क्षेत्रीय निदेशक कनी विग्नराजा के अनुसार, यह संकट केवल समस्याओं का पिटारा नहीं है, बल्कि एक वेक-अप कॉल भी है। भारत के लिए यह अपनी अर्थव्यवस्था को लचीला (Resilient) बनाने का अवसर है:
- विविधीकरण : ऊर्जा के लिए कोयला या पारंपरिक स्रोतों के बजाय अक्षय ऊर्जा और खाद्य स्रोतों में विविधता लाना।
- स्थानीय सप्लाई चेन : आयात पर निर्भरता कम करने के लिए क्षेत्रीय और स्थानीय मूल्य श्रृंखलाओं को मजबूत करना।
- सामाजिक सुरक्षा : गरीबी के जोखिम वाले परिवारों के लिए एडेप्टिव सोशल प्रोटेक्शन जैसी योजनाओं को और सुदृढ़ करना।