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स्वास्थ्य बीमा का भ्रम और बढ़ता आर्थिक बोझ

संदर्भ 

  • हाल ही में जारी घरेलू सामाजिक उपभोग: स्वास्थ्य विषय पर आधारित राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (NSS) के 80वें दौर (जनवरी-दिसंबर 2025) के आंकड़ों ने भारतीय स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की एक विरोधाभासी तस्वीर पेश की है। जहाँ एक ओर सरकारी प्रयासों से स्वास्थ्य बीमा के दायरे में अभूतपूर्व विस्तार हुआ है, वहीं दूसरी ओर आम आदमी की जेब पर स्वास्थ्य खर्च (Out-of-pocket expenditure) का बोझ कम होने के बजाय और बढ़ गया है। वस्तुतः यह डेटा सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC) के वर्तमान बीमा-आधारित मॉडल की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।  

कवरेज में वृद्धि बावजूद सेवाओं में कमी 

  • आंकड़ों के अनुसार, ग्रामीण भारत के 47.4% और शहरी भारत के 44.3% परिवार अब स्वास्थ्य बीमा के अंतर्गत आते हैं। 
  • वर्ष 2017-18 की तुलना में यह वृद्धि लगभग ढाई गुना है, जिसका श्रेय मुख्य रूप से प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PMJAY) और स्वास्थ्य साथी जैसी सरकारी वित्तपोषित स्वास्थ्य बीमा योजनाओं (GFHI) को जाता है। 
  • यद्यपि चौंकाने वाला तथ्य यह है कि बीमा कवरेज बढ़ने के बावजूद अस्पतालों में भर्ती होने की दर में अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई है। शहरी क्षेत्रों में यह दर 2014 के स्तर से भी नीचे बनी हुई है, जो यह दर्शाता है कि कवरेज का अर्थ अनिवार्य रूप से देखभाल तक पहुँच नहीं है। 

निजी क्षेत्र का प्रभुत्व और आम जन की जेब पर भारी बोझ  

सर्वेक्षण से पता चलता है कि भारतीय आबादी अब सार्वजनिक संस्थानों की तुलना में निजी अस्पतालों की ओर अधिक रुख कर रही है। यह बदलाव चिंताजनक है क्योंकि:

  • दोगुना हुआ खर्च : 2017-18 और 2025 के बीच अस्पताल में भर्ती होने पर होने वाला प्रत्यक्ष खर्च दोगुने से अधिक हो गया है।
  • निजी अस्पतालों की लागत : निजी क्षेत्र में इलाज का औसत खर्च ग्रामीण क्षेत्रों में 70% और शहरी क्षेत्रों में 80% बढ़ा है। 
  • सरकारी अस्पतालों की स्थिति : सरकारी अस्पतालों में भी दवाओं और डायग्नोस्टिक सेवाओं की कमी के कारण मरीजों को परिवहन और अन्य गैर-चिकित्सा मदों पर भारी खर्च करना पड़ रहा है।  

मुफ्त इलाज के दावे और जमीनी हकीकत 

  • पीएमजेएवाई (PMJAY) जैसी योजनाओं का मुख्य आकर्षण निजी अस्पतालों में मुफ्त इलाज है। लेकिन वास्तविकता यह है कि जीएफएच आई (GFHI) के तहत नामांकित 57% लोगों ने निजी अस्पतालों का विकल्प चुना और उनमें से बहुत कम को वास्तव में कैशलेस सुविधा मिली। 
  • प्रसव को छोड़कर, अस्पताल में भर्ती होने का औसत ओओपी (OOP) खर्च ग्रामीण क्षेत्रों में 31,250 और शहरी क्षेत्रों में 34,259 दर्ज किया गया है। यह स्पष्ट करता है कि बीमा होने के बावजूद मरीज अतिरिक्त शुल्क देने को मजबूर हैं।

लक्षित आबादी और वित्तीय दबाव 

  • आंकड़ों का एक और विवादास्पद पहलू यह है कि इन योजनाओं का लाभ असमान है। शहरी क्षेत्रों में इन योजनाओं का लाभ उठाने वालों में सबसे गरीब वर्ग की हिस्सेदारी केवल 13% है।
  • हरियाणा और पश्चिम बंगाल जैसे राज्य अपने स्वास्थ्य बजट का लगभग 15% इन बीमा योजनाओं पर खर्च कर रहे हैं।
  • आलोचकों का तर्क है कि ये योजनाएं सार्वजनिक कर (Tax) के पैसे का उपयोग निजी क्षेत्र को सब्सिडी देने के लिए कर रही हैं, जिससे उन बाजारों में निजी प्रदाताओं की पहुँच बन रही है जहाँ पहले उनकी पहुँच नहीं थी।  

निष्कर्ष: पुनर्विचार की आवश्यकता 

  • एनएसएस के 80वें दौर के निष्कर्षों से यह स्पष्ट है कि केवल बीमा कार्ड बांट देने से स्वास्थ्य सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होती। निजी क्षेत्र, जो लाभ के सिद्धांत पर कार्य करता है, वर्तमान में अनियमित है और अक्सर सरकारी प्रतिपूर्ति दरों के बावजूद मरीजों से अतिरिक्त वसूली करता है।  
  • अब समय आ गया है कि भारत बीमा-आधारित मॉडल के बजाय सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित करे। आयुष्मान आरोग्य मंदिर (AAM) जैसे प्राथमिक देखभाल केंद्रों को यदि राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत पर्याप्त वित्तीय पोषण मिले, तो वे एक सशक्त विकल्प बन सकते हैं। जब तक बुनियादी सार्वजनिक ढांचा मजबूत नहीं होगा, तब तक स्वास्थ्य योजनाएं अमीरों की, लाभ के लिए और गरीबों के कर द्वारा संचालित होती रहेंगी। 
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