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जलवायु परिवर्तन का विरोधाभास

संदर्भ 

  • हाल ही में इनवायरमेंट रिसर्च : क्लाइमेट (Environmental Research: Climate) पत्रिका में प्रकाशित एक नवीनतम शोध के अनुसार, यदि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन की वर्तमान प्रवृत्ति जारी रहती है, तो सदी के अंत (वर्ष 2100) तक भारत के वनों की कार्बन सोखने की क्षमता में लगभग दो गुनी वृद्धि हो सकती है। 

भारत के वनों में कार्बन भंडारण: 2100 तक का भविष्योन्मुखी अनुमान 

  • भारतीय शोधकर्ताओं द्वारा संचालित यह अध्ययन क्लाइमेट मॉडलिंग पर आधारित है। इसका मूल उद्देश्य यह विश्लेषण करना है कि 21वीं सदी के समापन तक भारत की वनस्पतियों में संचित कार्बन की मात्रा किस प्रकार परिवर्तित होगी। शोध में उत्सर्जन के तीन स्तरों - न्यूनतम, मध्यम और उच्च के आधार पर भविष्य के वन बायोमास का तुलनात्मक आकलन किया गया है। 

शोध के प्रमुख परिणाम 

1. कार्बन सिंक में अभूतपूर्व बढ़ोत्तरी 

अनुमान है कि 2100 तक वनस्पति कार्बन बायोमास में उत्सर्जन परिदृश्यों के अनुसार भारी वृद्धि होगी :

  • कम उत्सर्जन : 35% की वृद्धि
  • मध्यम उत्सर्जन : 62% की वृद्धि
  • उच्च उत्सर्जन : 97% तक की संभावित वृद्धि 

2. सहायक कारक: वर्षा और कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) 

  • वर्षा के बढ़ते स्तर और वायुमंडल में CO2 की अधिक सांद्रता पौधों में प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया को तीव्र करती है। इससे नमी की उपलब्धता और जल उपयोग दक्षता में सुधार होता है, जो अंततः वनों के तेजी से विस्तार में सहायक होता है। 

3. क्षेत्रीय भिन्नता  

  • शुष्क क्षेत्रों का कायाकल्प : आश्चर्यजनक रूप से, राजस्थान, गुजरात और पश्चिमी मध्य प्रदेश जैसे अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में वनस्पति कार्बन में 60% से अधिक की वृद्धि का अनुमान है, जो पारंपरिक हरे-भरे क्षेत्रों की तुलना में अधिक है।
  • हॉटस्पॉट में स्थिरता : पश्चिमी घाट और हिमालय जैसे जैव विविधता से समृद्ध क्षेत्रों में वृद्धि दर अपेक्षाकृत धीमी रहेगी। इसका मुख्य कारण पारिस्थितिक संतृप्ति (Ecological Saturation) और स्थानीय जलवायु चुनौतियां हैं। 

निहितार्थ और चुनौतियां  

  • जलवायु लक्ष्यों में सहायक : वनों की बढ़ती कार्बन भंडारण क्षमता भारत के नेट-ज़ीरो लक्ष्य और जलवायु शमन (Mitigation) प्रयासों को एक मजबूत आधार प्रदान करेगी। 
  • जोखिम और अस्थिरता : बायोमास में वृद्धि का अर्थ यह कतई नहीं है कि जलवायु परिवर्तन पूर्णतः सकारात्मक है। बढ़ती गर्मी के कारण जंगलों में आग (Forest Fires), कीटों का हमला और अनियमित सूखा जैसे खतरे बढ़ सकते हैं, जो संचित कार्बन को पुनः वायुमंडल में छोड़कर संतुलन बिगाड़ सकते हैं।
  • एफएसआई के आंकड़ों से विरोधाभास : यह शोध भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) के पारंपरिक अनुमानों से अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, जो वनों की दीर्घकालिक निगरानी और जलवायु-लचीली (Climate-resilient) संरक्षण नीतियों की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करता है। 
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