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भारतीय अर्थव्यवस्था का विरोधाभास: घटती निर्धनता और उभरता असुरक्षित मध्यम वर्ग

संदर्भ 

  • वैश्विक भू-आर्थिक अस्थिरता और बढ़ती घरेलू असमानताओं के बीच भारत का व्यापक आर्थिक (Macroeconomic) प्रदर्शन आज भी विकास के एक सशक्त उदाहरण के रूप में देखा जाता है। हालिया वर्षों के विकास मॉडल को निर्धनता उन्मूलन में प्रभावी माना गया है, और पारंपरिक सांख्यिकीय मानकों पर यह दावा काफी हद तक तर्कसंगत भी प्रतीत होता है।  
  • पिछले दशक के आंकड़े दर्शाते हैं कि विश्व बैंक की निम्न-मध्यम आय गरीबी रेखा के नीचे रहने वाली भारतीय जनसंख्या 50% से घटकर लगभग 30% पर आ गई है। प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT), रियायती खाद्यान्न और व्यापक वित्तीय समावेशन जैसी कल्याणकारी नीतियों ने करोड़ों लोगों को अत्यधिक गरीबी के चक्र से बाहर निकाला है। 

कल्याण का नया आयाम: एक निरंतरता (Spectrum) के रूप में 

  • इस वैचारिक शून्यता को भरने के लिए विश्व बैंक ने एक नया नीतिगत दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। यह मॉडल केवल निर्धन लोगों की संख्या नहीं गिनता, बल्कि यह मापता है कि जनसंख्या एक गरिमापूर्ण जीवन स्तर से कितनी दूर है। 
  • यह दृष्टिकोण विकास को केवल सांख्यिकीय बदलाव के रूप में नहीं, बल्कि मानवीय प्रगति के एक स्पेक्ट्रम के रूप में देखता है। यह इस कड़वे सच की ओर संकेत करता है कि गरीबी दर में गिरावट के बावजूद, विकास का लाभ व्यापक जनमानस तक स्थायी आर्थिक सुदृढ़ता के रूप में नहीं पहुँच सका है।  

विकास का पुनर्मूल्यांकन  

  • इस नवीन नजरिए से भारत की आर्थिक प्रगति कुछ चुनौतियां पेश करती है। यद्यपि भारत विश्व की तीव्रतम विकास दर वाली अर्थव्यवस्थाओं में शुमार है, किंतु बढ़ती असमानता और स्थिर वेतन (Wage Stagnation) चिंता का विषय हैं। समस्या विकास की कमी नहीं, बल्कि विकास के साथ आर्थिक गतिशीलता (Economic Mobility) का अभाव है। 
  • गरीबी रेखा को पार कर लेना अनिवार्य रूप से स्थिरता का परिचायक नहीं है। वर्तमान में एक सुरक्षित मध्यम वर्ग के स्थान पर एक असुरक्षित मध्यम वर्ग (Vulnerable Middle Class) आकार ले रहा है, जिसकी आय अनिश्चित है और जो किसी भी छोटे आर्थिक झटके से पुनः निर्धनता में गिर सकता है। 

संरचनात्मक अवरोध और रोजगार की प्रकृति 

भारत में विकास का मुख्य आधार पूंजी-प्रधान क्षेत्र रहे हैं, जो बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन में अपेक्षित सफलता नहीं पा सके। श्रम बाजार का विश्लेषण करें तो : 

  • अनौपचारिक क्षेत्र की अधिकता : 90 प्रतिशत से अधिक श्रमिक अनौपचारिक क्षेत्र में हैं। e-Shram पोर्टल के अनुसार, लगभग 94 प्रतिशत श्रमिकों की मासिक आय 10,000 से भी कम है। 
  • उत्पादकता बनाम वेतन : उत्पादकता में वृद्धि के बावजूद वास्तविक वेतन में ठहराव आया है, जिससे विकास और व्यक्तिगत आय का संबंध कमजोर हुआ है। 
  • कृषि पर निर्भरता : विनिर्माण (Manufacturing) क्षेत्र में रोजगार के अवसर कम होने के कारण बड़ी संख्या में श्रमिक वापस कृषि की ओर लौटे हैं। वर्तमान में 46% जनसंख्या कृषि पर निर्भर है, जबकि सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में इस क्षेत्र का योगदान मात्र 18% है। 

बढ़ती खाई और सामाजिक प्रभाव 

एक ओर जहाँ शीर्ष 1% जनसंख्या देश की 22% आय पर नियंत्रण रखती है और अरबपतियों की संपत्ति में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है, वहीं दूसरी ओर आम नागरिकों के जीवन स्तर में निम्नलिखित चुनौतियां स्पष्ट दिखती हैं:

  • बेरोजगारी : युवाओं में बेरोजगारी दर लगभग 45% और स्नातकों में 29% होना एक गंभीर संकट है। 
  • बचत में गिरावट और कर्ज : घरेलू बचत जीडीपी के 5% तक गिर गई है। अब कर्ज का उपयोग संपत्तियां बनाने के बजाय दैनिक उपभोग की जरूरतों को पूरा करने के लिए किया जा रहा है।  
  • मानव विकास : बाल कुपोषण (Wasting 18.7%) और अवरुद्ध विकास (Stunting 35.5%) के आंकड़े बताते हैं कि हमारी भविष्य की पूंजी (मानव संसाधन) आज भी बुनियादी अभावों से जूझ रही है। 

भविष्य की राह 

  • भारत के लिए अब मुख्य चुनौती केवल लोगों को गरीबी रेखा से बाहर निकालना नहीं है, बल्कि उन्हें स्थायी समृद्धि की ओर ले जाना है। सफलता का नया पैमाना यह होना चाहिए कि क्या हमारी नीतियां वास्तविक सामाजिक-आर्थिक उत्थान पैदा कर रही हैं या केवल एक ऐसा वर्ग खड़ा कर रही हैं जो आर्थिक रूप से अधर में लटका है। 

नीतिगत प्राथमिकताएं 

  • उच्च उत्पादकता वाले क्षेत्रों में व्यापक रोजगार सृजन।
  • श्रमिकों के कौशल विकास और उचित पारिश्रमिक के बीच संतुलन।
  • विकास के लाभों का अधिक न्यायसंगत वितरण। 

निष्कर्षतः, भारत की विकास यात्रा एक ऐसे जटिल मोड़ पर है जहाँ केवल जीडीपी के आंकड़े पर्याप्त नहीं होंगे; वास्तविक सफलता तभी मानी जाएगी जब विकास का अर्थ हर नागरिक के लिए बेहतर जीवन और सुरक्षित भविष्य होगा।

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