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फारस की खाड़ी: युद्ध से प्रभावित एक संवेदनशील पारिस्थितिकी

संदर्भ

  • ऐतिहासिक रूप से मोतियों और मछलियों के व्यापार के लिए जानी जाने वाली फारस की खाड़ी (Persian Gulf) आज वैश्विक मानचित्र पर 'तेल टैंकरों और युद्धपोतों' के पर्याय के रूप में उभरी है। किंतु इस भू-राजनीतिक शोर के पीछे एक अत्यंत संवेदनशील और अनूठा पारिस्थितिकी तंत्र है, जो औद्योगिक आक्रामकता और जलवायु परिवर्तन के कारण विनाश की कगार पर खड़ा है। 

भौगोलिक एवं जल-वैज्ञानिक विशिष्टता 

  • लगभग 2,26,000 वर्ग किमी में विस्तृत यह अर्ध-संलग्न (Semi-enclosed) जलराशि भू-गर्भीय रूप से काफी नवीन है। 
  • अत्यधिक लवणता और तापमान : औसत गहराई मात्र 30 मीटर होने और अरब सागर से सीमित जल विनिमय के कारण यहाँ ग्रीष्मकाल में तापमान 35°C से ऊपर चला जाता है। वाष्पीकरण की उच्च दर के कारण इसकी लवणता (44-70 ppt) खुले समुद्र की तुलना में दोगुनी है। 
  • पारिस्थितिक लचीलापन : इन चरम स्थितियों के बावजूद, यह क्षेत्र जैव विविधता का केंद्र है, जहाँ जीव विज्ञान की सीमाओं को चुनौती देने वाली प्रजातियां पाई जाती हैं। 

जैव विविधता के स्तंभ: संकट में जीवन 

वस्तुतः  खाड़ी का पारिस्थितिकी तंत्र तीन मुख्य स्तंभों पर टिका है, जो वर्तमान में गंभीर संकट में हैं : 

  • सीग्रास और डुगोंग : यहाँ ऑस्ट्रेलिया के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी डुगोंग (Dugong) आबादी (5,000-6,000) रहती है। ये पूरी तरह से 'सीग्रास' के मैदानों पर निर्भर हैं, जो भूमि पुनर्प्राप्ति (Land Reclamation) के कारण नष्ट हो रहे हैं। 
  • मैन्ग्रोव और कोरल रीफ : यहाँ के प्रवाल भित्तियाँ (Coral Reefs) गोवा के क्षेत्रफल के बराबर हैं। ये 'एक्सट्रीम वेदर' में जीवित रहने की अद्भुत क्षमता रखते हैं, लेकिन बार-बार होने वाली 'ब्लीचिंग' (Bleaching) इनकी सहनशक्ति को खत्म कर रही है।
  • समुद्री कछुए : दुनिया की 7 में से 5 प्रजातियां यहाँ पाई जाती हैं, जिनमें 'हॉक्सबिल कछुआ' (Hawksbill Turtle) गंभीर रूप से संकटग्रस्त है। 

आर्थिक रूपांतरण और शहरीकरण का दबाव 

  • 20वीं सदी की शुरुआत तक 'बासरा मोतियों' (80% वैश्विक आपूर्ति) पर टिकी अर्थव्यवस्था 'तेल' की खोज के बाद पूरी तरह बदल गई।
  • औद्योगिक सघनता : आज यह क्षेत्र दुनिया का एक-तिहाई तेल उत्पादित करता है, जिसमें 800 ऑफशोर प्लेटफॉर्म और प्रतिवर्ष 25,000 टैंकरों का आवागमन होता है।
  • तटीय आक्रामकता : पिछले 40 वर्षों में जनसंख्या तीन गुना बढ़ गई है। 'पाम जुमेराह' जैसी कृत्रिम द्वीप परियोजनाओं ने समुद्री धाराओं और तलछट प्रवाह (Sediment Flow) को बाधित कर प्राकृतिक तटरेखाओं को स्थायी क्षति पहुंचाई है। 

पर्यावरणीय और सुरक्षा चुनौतियां 

  • डीसैलिनेशन का दुष्प्रभाव : ताजे पानी की आपूर्ति के लिए यहाँ 200 से अधिक संयंत्र हैं। इनसे निकलने वाला गर्म, अत्यधिक लवणीय और रसायनों युक्त पानी (Brine) समुद्र के 'खाद्य जाल' (Food Web) के आधार, यानी प्लांकटन को नष्ट कर रहा है।
  • युद्ध का घाव : 1991 के खाड़ी युद्ध के दौरान हुआ तेल रिसाव इतिहास की सबसे बड़ी पर्यावरणीय आपदाओं में से एक था। वर्तमान में भी, तेल बुनियादी ढांचे पर ड्रोन और मिसाइल हमले इस पारिस्थितिकी तंत्र के लिए निरंतर खतरा बने हुए हैं।
  • लुप्तप्राय वन्यजीव : शिकार और निरंतर संघर्षों के कारण अरब ओरिक्स, एशियाई चीता और अरबियाई तेंदुए की संख्या में भारी गिरावट आई है। 

संरक्षण की पहल और भावी राह 

  • यद्यपि स्थिति चिंताजनक है, किंतु हाल के वर्षों में कुछ सकारात्मक कदम उठाए गए हैं :
  • नियामक उपाय : यूएई, सऊदी अरब और कतर द्वारा झींगा पकड़ने पर प्रतिबंध और मैन्ग्रोव पुनर्रोपण के प्रयास सराहनीय हैं। 
  • केंद्रीकृत शासन का लाभ : विशेषज्ञों का मानना है कि इस क्षेत्र का केंद्रीकृत राजनीतिक ढांचा पर्यावरणीय नीतियों को तेजी से लागू करने में सहायक हो सकता है। 

निष्कर्ष 

  • वस्तुतः फारस की खाड़ी आज विकास और विनाश के चौराहे पर खड़ी है। यदि समय रहते इको-सिस्टम आधारित प्रबंधन नहीं अपनाया गया, तो यहाँ की अनूठी जैव विविधता और तटीय संसाधन हमेशा के लिए लुप्त हो सकते हैं। यद्यपि ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरणीय सुरक्षा के बीच संतुलन साधना अब एक विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्य आवश्यकता है।

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